जयपुर। राजस्थान हाई कोर्ट ने अभियुक्तों के अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी आरोपी ने शुरुआत में नार्को टेस्ट कराने के लिए अपनी सहमति दे दी है, तो भी वह बाद में इस टेस्ट को कराने से मना कर सकता है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि किसी भी आरोपी को उसकी इच्छा के विरुद्ध नार्को टेस्ट कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
सहमति वापस लेना व्यक्ति का अधिकार: जस्टिस अनूप कुमार ढंड
हाई कोर्ट के जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने यह आदेश सुभाष सैनी की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि “सहमति वापस लेना किसी भी व्यक्ति का अपना अधिकार है। जांच के नाम पर किसी को जबरन नार्को टेस्ट के लिए विवश नहीं किया जा सकता।”
क्या था पूरा मामला?
यह मामला चिड़ावा पुलिस थाने में दर्ज एक आपराधिक केस से जुड़ा है। जांच के दौरान पुलिस ने आरोपी के नार्को टेस्ट की मांग की थी।
- शुरुआती सहमति: 18 मई, 2015 को आरोपी ने ट्रायल कोर्ट में टेस्ट के लिए अपनी सहमति दे दी थी।
- सहमति वापसी का फैसला: बाद में आरोपी को लगा कि यह उसके मौलिक अधिकारों के खिलाफ है और टेस्ट के दौरान वह खुद के खिलाफ साक्ष्य देने के लिए मजबूर हो सकता है। इस आधार पर उसने अपनी सहमति वापस लेने का निर्णय लिया।
- ट्रायल कोर्ट बनाम हाई कोर्ट: ट्रायल कोर्ट ने आरोपी की सहमति वापस लेने की याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद मामले ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहाँ हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए आरोपी के पक्ष में निर्णय दिया।
कोर्ट की महत्वपूर्ण दलील: ‘अर्द्ध बेहोशी’ में नियंत्रण नहीं
हाई कोर्ट ने फैसले में नार्को टेस्ट की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि:
“नार्को टेस्ट के दौरान व्यक्ति अर्द्ध बेहोशी (Semi-conscious) की स्थिति में होता है। उस वक्त उसकी इच्छा शक्ति पर उसका अपना नियंत्रण नहीं रहता। ऐसी स्थिति में व्यक्ति खुद के खिलाफ बयान दे सकता है, जो कि कानूनन उसे मजबूर करने जैसा है। किसी भी व्यक्ति को स्वयं के खिलाफ साक्ष्य देने के लिए बाध्य करना असंवैधानिक है।”
इस फैसले के बाद अब यह साफ हो गया है कि नार्को टेस्ट के लिए केवल शुरुआती सहमति काफी नहीं है; टेस्ट होने तक आरोपी की इच्छा सर्वोपरि रहेगी।
