जयपुर | राजधानी में सरकारी संसाधनों और प्राकृतिक जल प्रवाह क्षेत्रों को अपनी जागीर समझने वाले भूमाफियाओं का दुस्साहस अब सीमा पार कर चुका है। शहर के बीचों-बीच करोड़ों रुपये की सरकारी भूमि और द्रव्यवती नदी के कैचमेंट एरिया पर कब्जा कर न केवल सरकार को करोड़ों के राजस्व की चपत लगाई जा रही है, बल्कि भविष्य में शहर को डुबाने की पूरी पटकथा भी लिखी जा रही है।
नदी का गला घोंटा: 900 फीट का बहाव क्षेत्र सिर्फ 300 फीट में सिमटा
द्रव्यवती रिवर प्रोजेक्ट की जड़ों में मट्ठा डालने का खेल अम्बाबाड़ी क्षेत्र में धड़ल्ले से चल रहा है। जिस नदी का प्राकृतिक बहाव क्षेत्र कभी 900 फीट हुआ करता था, उसे मिट्टी भराव और अवैध निर्माणों के जरिए सिकोड़कर मात्र 300 फीट का नाला बना दिया गया है।
- अवैध पार्किंग का खेल: स्थानीय स्तर पर साठगांठ कर बेसन की बाड़ी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में मिट्टी पाटी गई और वहां धड़ल्ले से कमर्शियल पार्किंग विकसित कर दी गई।
- जलभराव का संकट: इस अतिक्रमण के कारण झोटवाड़ा पुलिया और अम्बाबाड़ी ढेहर के बालाजी से आने वाले बरसाती पानी का रास्ता पूरी तरह अवरुद्ध हो गया है, जिससे पूरे इलाके पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है।
खसरा नंबर 53-54: काश्तकारी की आड़ में ‘अवैध फैक्ट्री’ का साम्राज्य
आरपीएस से विद्याधर नगर को जोड़ने वाली मुख्य सड़क के पास स्थित करोड़ों की बेशकीमती भूमि पर माफियाओं ने सरकारी नियमों को ठेंगे पर रख दिया है।
- बिना कन्वर्जन चल रहा कारोबार: खसरा संख्या 53-54 की काश्तकारी भूमि पर बिना किसी लैंड यूज चेंज (LUC) या विभाग की अनुमति के फैक्ट्री का संचालन किया जा रहा है।
- जेडीए को लाखों का चूना: इसी स्थान पर अवैध रूप से प्राइवेट बसों की पार्किंग भी संचालित है, जिससे सरकार को मिलने वाले लाखों रुपये के राजस्व की हर महीने चोरी की जा रही है।
सिस्टम की ‘मौन’ सहमति या अधिकारियों की लापरवाही?
हैरानी की बात यह है कि जेडीए के जोन अधिकारियों और प्रवर्तन शाखा (Enforcement Wing) की नाक के नीचे ये अवैध गतिविधियां महीनों से चल रही हैं। अम्बाबाड़ी में जिस तरह 10 साल पहले चिह्नित वाटर बॉडीज को सुरक्षा नहीं दी गई, उससे साफ है कि कहीं न कहीं विभागीय मिलीभगत ने भूमाफियाओं के हौसले बुलंद किए हैं।
अब कोर्ट की शरण में प्रशासन
हालिया दबाव के बाद जेडीए जोन-बी और जयपुर तहसीलदार ने अब सक्रियता दिखाई है। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धारा 177 के तहत एसडीएम कोर्ट में दावा पेश कर संबंधित विवादित जमीनों को ‘सरकारी भूमि’ घोषित कराने की मांग की गई है।
Expose Now का सवाल: जब ये क्षेत्र पहले से ही डिमार्केशन में चिह्नित थे, तो इतने वर्षों तक प्रशासन ने इन्हें माफियाओं के हवाले क्यों छोड़ रखा था? क्या सिर्फ कोर्ट के आदेशों का इंतजार करना ही अधिकारियों की जिम्मेदारी है?
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now
