Expose Now का बड़ा-खुलासा: राजस्थान में मिलावटी ‘माफियाओं का राज’, हर चौथा फूड सैंपल जांच में फेल, न दूध सुरक्षित, न घी-मसाले, 15 हजार गुनाहों पर सिर्फ एक FIR!

-खौफनाक आंकड़े — 4 साल में 69,287 सैंपलों की जांच, 15,644 खाद्य उत्पाद निकले अमानक व खतरनाक

-अमृत कहे जाने वाले दूध में घुला ‘सॉर्बिटोल’ और रसायन, बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर सीधा वार

-जयपुर, अलवर, कोटा और जोधपुर बने मिलावट के सबसे बड़े गढ़, दूर-दराज तक फैला सिंडिकेट

-लचर कानून और नाममात्र की सजा — 15 हजार से ज्यादा मामलों में सिर्फ 9 को जेल और 1 FIR

जयपुर। राजस्थान में आम जनता की सेहत के साथ खुलेआम खिलवाड़ का एक भयावह और दिल दहला देने वाला सच सामने आया है। ‘Expose Now’ की विशेष पड़ताल में राज्य के खाद्य सुरक्षा तंत्र और बाजारों में बिकने वाले रोजमर्रा के खान-पान की वस्तुएं पूरी तरह संदेह के घेरे में आ गई हैं। आधिकारिक आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह सनसनीखेज हकीकत सामने आई है कि राज्य में हर चौथा खाद्य पदार्थ का सैंपल गुणवत्ता जांच में ‘फेल’ साबित हो रहा है। जनवरी 2022 से लेकर जनवरी 2026 तक की चार वर्षों की अवधि के दौरान पूरे राजस्थान से कुल 69,287 खाद्य पदार्थों के नमूने संग्रहित किए गए थे। जब इन नमूनों की प्रयोगशालाओं में रासायनिक और भौतिक जांच करवाई गई, तो परिणाम स्तब्ध कर देने वाले निकले। इनमें से 15,644 नमूने सुरक्षा और गुणवत्ता के निर्धारित कानूनी मानकों पर पूरी तरह विफल (फेल) पाए गए। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि प्रदेश की आम जनता अपनी गाढ़ी कमाई खर्च करके जो आटा, तेल, मसाले, घी, पनीर और मिठाइयां खरीद रही है, उनमें से लगभग 22.5 से 25 प्रतिशत उत्पाद या तो घटिया दर्जे के हैं या फिर उनमें मानव शरीर को धीरे-धीरे खोखला करने वाले तत्वों की मिलावट है।

लैब रिपोर्ट के गहन वर्गीकरण से यह तथ्य उजागर हुआ है कि फेल हुए कुल 15,644 नमूनों में से सर्वाधिक 12,379 नमूने ‘सब-स्टैंडर्ड’ यानी घटिया और अमानक स्तर के थे। इसके अलावा 2,104 नमूने ‘मिसब्रांडेड’ पाए गए, जिनमें भ्रामक लेबलिंग और झूठे दावों के जरिए उपभोक्ताओं की आंखों में धूल झोंकी जा रही थी। सबसे चिंताजनक बात यह है कि 1,215 नमूने सीधे तौर पर ‘अनसेफ’ (असुरक्षित) श्रेणी में पाए गए। यह ‘अनसेफ’ खाना वह है, जिसका नियमित सेवन कैंसर, किडनी फेलियर, लिवर सिरोसिस और आंतों के अल्सर जैसी गंभीर व जानलेवा बीमारियों का कारण बनता है।

अमृत कहे जाने वाले दूध में घुला ‘सॉर्बिटोल’ और रसायन, बच्चों की सेहत पर सीधा प्रहार:-

दूध को संपूर्ण आहार और जीवनदायिनी अमृत माना जाता है, जो हर घर में नवजात शिशुओं, बच्चों और बुजुर्गों की दैनिक खुराक का अनिवार्य हिस्सा है। लेकिन ‘Expose Now’ की इस खास इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट में जो खुलासा हुआ है, वह हर माता-पिता की रूह कंपा देने वाला है। राजस्थान में दूध भी सुरक्षित नहीं बचा है। जांच के दौरान प्रदेशभर से दूध के कुल 6,496 नमूने प्रयोगशाला भेजे गए थे। इनमें से 1,374 से अधिक सैंपल मानकों पर फेल साबित हुए। मिलावटखोरों का दुस्साहस इस हद तक बढ़ चुका है कि वे दूध में गाढ़ापन, कृत्रिम चिकनाई, प्रोटीन की झूठी रीडिंग और लंबी शेल्फ-लाइफ दिखाने के लिए प्रतिबंधित रासायनिक तत्वों और औद्योगिक सॉल्वैंट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। जांच में विशेष रूप से हनुमानगढ़ जिले से लिए गए पैक्ड और लूज दूध के नमूनों में ‘सॉर्बिटोल’ (Sorbitol) पॉजिटिव पाया गया। खाद्य सुरक्षा मानकों के तहत दूध में सॉर्बिटोल की मौजूदगी पूरी तरह शून्य (Negative) होनी चाहिए।

पैक्ड दूध के ब्रांडेड सैंपल (जैसे सत्यम ब्रांड डबल टोंड मिल्क) तक में अवांछित तत्वों का पाया जाना यह साबित करता है कि संगठित डेयरी सिंडिकेट किस कदर जहरीले फॉर्मूलों का प्रयोग कर रहा है। डेयरी विशेषज्ञ बताते हैं कि दूध में यूरिया, न्यूट्रलाइजर, डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा, रिफाइंड तेल और सिंथेटिक स्वीटनर जैसे सॉर्बिटोल का मिश्रण कर कृत्रिम सिंथेटिक दूध तैयार किया जाता है। जब कोई मासूम बच्चा ऐसा केमिकल युक्त दूध पीता है, तो उसके पाचन तंत्र, गुर्दे और प्रतिरक्षा प्रणाली पर अपरिवर्तनीय दुष्प्रभाव पड़ता है। मिलावटखोरों ने चंद रुपयों के मुनाफे के लिए मासूम जिंदगियों को दांव पर लगा दिया है।

जयपुर, अलवर, जोधपुर और कोटा में मिलावट का सबसे बड़ा मकड़जाल:-

‘Expose Now’ की पड़ताल में जब जिलों की स्थिति का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया, तो प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक और शहरी केंद्र मिलावट के सबसे बड़े हॉटस्पॉट बनकर उभरे। राजधानी जयपुर की स्थिति सबसे ज्यादा डराने वाली है।

-जयपुर (प्रथम व द्वितीय): राजधानी जयपुर में कुल मिलाकर 6,465 नमूने लिए गए, जिनमें से 1,683 सैंपल फेल पाए गए (जयपुर प्रथम में 983 और जयपुर द्वितीय में 700 नमूने फेल)। यानी राजधानी में ही प्रतिदिन लाखों नागरिक दूषित व घटिया खाद्य सामग्री का उपभोग करने को मजबूर हैं।

-अलवर: दिल्ली-एनसीआर से सटे अलवर जिले में स्थिति बेहद भयावह है। यहां 3,695 नमूनों की जांच की गई, जिनमें से रिकॉर्ड 1,028 सैंपल फेल साबित हुए। इनमें 888 सब-स्टैंडर्ड, 52 मिसब्रांड और 88 सीधे अनसेफ थे।

-जोधपुर और कोटा: सूर्य नगरी जोधपुर में 2,873 में से 620 सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे। वहीं कोचिंग सिटी कहे जाने वाले कोटा में, जहां देश भर से लाखों छात्र आते हैं, 2,582 नमूनों में से 722 सैंपल फेल हुए, जिनमें 62 अनसेफ श्रेणी के थे।

-भीलवाड़ा, अजमेर और बीकानेर: भीलवाड़ा में 435, अजमेर में 531 और बीकानेर में 390 सैंपल जांच में फेल दर्ज किए गए।

-सीमावर्ती और ग्रामीण जिलों में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। बाड़मेर में 419, हनुमानगढ़ में 682, सीकर में 577 और टोंक में 540 सैंपल फेल मिले। यह स्पष्ट करता है कि मिलावट का यह नेटवर्क केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि राजस्थान के दूर-दराज के कस्बों और गांवों तक अपनी जड़ें जमा चुका है।

लचर कानून और नाममात्र की सजा — 15 हजार से ज्यादा मामलों में सिर्फ 1 FIR:-

जब अपराध इतना बड़ा हो और मामला सीधे लाखों लोगों की जिंदगी से जुड़ा हो, तो कड़ी कार्रवाई की उम्मीद की जाती है। लेकिन ‘Expose Now’ के इस खुलासे का सबसे स्याह पहलू वह प्रशासनिक व कानूनी विफलता है, जो मिलावटखोरों के हौसलों को लगातार बढ़ा रही है। आंकड़ों के मुताबिक, 15,644 सैंपल फेल होने के बावजूद पूरे चार साल में राज्य के भीतर मात्र 1 एफआईआर (FIR) दर्ज करवाई गई। यह अकेली FIR डीडवाना-कुचामन क्षेत्र में दर्ज की गई। क्या 1,215 अनसेफ और जानलेवा मिलावट के मामलों में आपराधिक षड्यंत्र और गैर-इरादतन हत्या के प्रयास की धाराएं नहीं लगनी चाहिए थीं?

-न्यायिक प्रक्रिया की बात करें तो 13,679 मामलों में संबंधित न्यायालयों और न्यायनिर्णयन अधिकारियों के समक्ष परिवाद दायर किए गए। इन मामलों में अब तक कुल 21 करोड़ 36 लाख 96 हजार 681 रुपये का जुर्माना तो ठोका गया, लेकिन सजा के नाम पर नतीजा लगभग ‘शून्य’ रहा।

-हजारों गुना मुनाफा कमाने वाले माफियाओं के लिए कुछ लाख रुपयों का जुर्माना महज एक कारोबारी खर्च बनकर रह जाता है। कारावास की सजा की बात करें तो चार वर्षों में केवल 09 प्रकरणों में सजा सुनाई गई। यानी 15 हजार से अधिक गंभीर उल्लंघनों में जेल जाने वालों की संख्या दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू पाई।

-कार्रवाई के नाम पर लाइसेंस रद्द करने का नाटक भी किसी छलावे से कम नहीं है। चार साल में पूरे प्रदेश में मात्र 03 प्रतिष्ठानों के लाइसेंस निरस्त या निलंबित किए गए। इनमें से भी बीकानेर की मेसर्स प्रेम मिष्ठान भण्डार का लाइसेंस “नियमों की पालना” का हवाला देकर पुनः बहाल कर दिया गया, जबकि अजमेर की मेसर्स शिवांश पिज्जा चीज और जयपुर की मेसर्स रिद्धी सिद्धी इण्डस्ट्रीज का कारोबार बंद होना दर्शाया गया है। बाकी हजारों मिलावटखोर आज भी धड़ल्ले से बाजार में अपनी दुकानें और फैक्ट्रियां चला रहे हैं।

मुनाफे की मंडी में बिकती जिंदगियां, आखिर कब टूटेगा मिलावट माफिया और लचर सिस्टम का यह गठजोड़:-

राजस्थान के कोने-कोने से सामने आए ये आंकड़े केवल कागजी दस्तावेज नहीं, बल्कि हर उस परिवार की चीख हैं जो शुद्ध समझकर अपने बच्चों को जहर पिला रहा है। जब तक चार साल में 15 हजार से ज्यादा सैंपल फेल होने पर केवल 9 लोगों को जेल भेजा जाएगा और 21 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाकर फाइलों को दफ्न कर दिया जाएगा, तब तक मिलावटखोरों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। करोड़ों का मुनाफा कमाने वाले इस सिंडिकेट के लिए यह मामूली जुर्माना धंधे की महज एक ‘लागत’ बनकर रह गया है। ‘Expose Now’ का यह महा-खुलासा सीधे सत्ता और सिस्टम की जवाबदेही पर कड़ा प्रहार करता है। मासूमों के दूध में केमिकल घोलने वालों को केवल अर्थदंड देकर छोड़ देना, इस जानलेवा अपराध में मूक सहमति देने जैसा है। जनता अब केवल छापों की औपचारिकता और आंकड़ों की बाजीगरी नहीं, बल्कि मिलावटखोरों पर गैर-इरादतन हत्या की धाराओं में मुकदमे, संपत्तियों की जब्ती और उन्हें सीधे सलाखों के पीछे पहुंचाने वाली निर्णायक कार्रवाई चाहती है।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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