Expose Now स्पेशल इन्वेस्टिगेशन: एक-दो-तीन-चार (1234), भ्रष्टाचार की जय-जयकार, राजस्थान में घूसखोरों पर ‘सिस्टम’ मेहरबान, एक भी मामले में 4 माह की निर्धारित अवधि में नहीं मिली अभियोजन स्वीकृति, फाइलों में दफन हुआ इंसाफ!

-3 साल, 1234 प्रस्ताव और शून्य सख्ती: सरकारी विभागों की चौखट पर दम तोड़ती एसीबी की अभियोजन स्वीकृति

-4 महीने की मियाद कचरे की टोकरी में: 2012 के सरकारी फरमान और सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग की खुलेआम उड़ रही है धज्जियां

-सरकारी सिस्टम में टेबल-टू-टेबल पेंडेंसी का शातिर खेल: फाइलों को सालों तक अटकाकर भ्रष्टाचारियों को कोर्ट से बरी कराने की संगठित ‘साजिश’

जयपुर। राजस्थान के प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का दावा पूरी तरह खोखला साबित हो रहा है। व्यवस्था के भीतर बैठे आला हाकिमों और हुक्मरानों ने ऐसा अभेद्य सुरक्षा कवच तैयार कर लिया है, जहां रिश्वतखोर रंगे हाथों पकड़े जाने के बाद भी पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं। ‘Expose Now’ की इस विशेष इनवेस्टिगेशन में यह चौंकाने वाला सच उजागर हुआ है कि जनवरी 2023 से जनवरी 2026 के बीच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) द्वारा विभिन्न विभागों को भेजे गए कुल 1234 अभियोजन स्वीकृति के प्रस्ताव प्रशासनिक शिथिलता और लीपापोती की गहरी खाई में समा चुके हैं।

नियमों की धज्जियां उड़ाने का आलम यह है कि जिस अभियोजन स्वीकृति को अधिकतम चार महीने के भीतर तय करना अनिवार्य है, वहां 1234 मामलों में से एक भी ऐसा केस नहीं है, जिसमें शासन-प्रशासन ने तय समय सीमा के भीतर स्वीकृति देकर अदालत में भ्रष्टाचारियों के खिलाफ चालान पेश करने का रास्ता साफ किया हो! फाइलों को सालों तक दबाकर बैठना और फिर मौका मिलते ही उन्हें खारिज करना या तारीखों के मकड़जाल में उलझाए रखना इस पूरे सिस्टम की कार्यशैली बन चुका है।

‘1234’ का सनसनीखेज रिपोर्ट कार्ड: कितनों को अभयदान, कितनों पर चुप्पी:-

एसीबी द्वारा तीन वर्षों (जनवरी 2023 से जनवरी 2026) के दौरान भेजे गए 1234 प्रस्तावों के बारीक विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सरकारी मशीनरी किस कदर घूसखोरों की ढाल बनी बैठी है:

-कुल प्रेषित अभियोजन स्वीकृति प्रस्ताव: 1234

-अभियोजन स्वीकृति: इन प्रस्तावों में से लगभग 680 से अधिक मामलों में ही विभागों ने निर्णय लेते हुए अभियोजन स्वीकृति के आदेश एसीबी को लौटाए हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश स्वीकृतियां 1 से 3 साल से अधिक समय तक फाइलों में सड़ने के बाद जारी की गईं।

-खारिज या स्वीकृति से इनकार (PS Denial): आधिकारिक आंकड़ों में करीब 10 मामलों में विभागों ने सीधे तौर पर अभियोजन स्वीकृति देने से इनकार कर दिया अथवा प्रस्ताव को खारिज कर दिया (जैसे सहकारिता, शिक्षा, ऊर्जा, पुलिस और यूडीएच के चुनिंदा मामलों में विभागों ने सक्षम प्राधिकारी स्तर से सीधे इंकारनामा थमा दिया)।

-दफ्तरों में धूल फांकती पेंडेंसी: सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि 540 से अधिक मामलों में विभागों ने आज तक कोई अंतिम फैसला ही नहीं लिया। ये फाइलें सक्षम प्राधिकारियों की मेजों पर आज भी सिर्फ इसलिए पेंडिंग पड़ी हैं ताकि समय बीतने के साथ केस की धार कुंद की जा सके।

13 अप्रैल 2012 का सरकारी परिपत्र, विभागों की रद्दी की टोकरी में स्वाहा:-

कार्मिक विभाग (क-3/शिका) द्वारा 13 अप्रैल 2012 को जारी परिपत्र (क्रमांक प. 2(157) कार्मिक/क-3/शिका/97) में बहुत स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। यह परिपत्र माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या 1193/2012 (डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम डॉ. मनमोहन सिंह एवं अन्य) में दिए गए ऐतिहासिक फैसले के अनुपालन में जारी हुआ था।

सरकारी आदेश की अनिवार्य शर्तें थीं:

-सक्षम प्राधिकारी को एसीबी से पूर्ण प्रस्ताव मिलने के अधिकतम 4 माह के भीतर अभियोजन स्वीकृति के बिंदु पर अंतिम निस्तारण करना अनिवार्य है।

-यदि विभाग को एसीबी से किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता हो, तो वह पूरी स्पष्टीकरण प्रक्रिया भी उसी 4 माह की अवधि के भीतर पूरी करनी होगी।

-किसी भी परिस्थिति में प्राइवेट एजेंसी से समानांतर जांच कराकर मामले को भटकाया नहीं जाएगा।

लेकिन हकीकत यह है कि 1234 मामलों में से किसी एक प्रकरण में भी इस परिपत्र की पालना नहीं की गई। 4 महीने की मियाद बीत जाने के बाद न तो किसी विभागाध्यक्ष से जवाब मांगा जाता है और न ही मुख्य सचिव स्तर पर इन लंबित फाइलों की जवाबदेही तय होती है। प्रशासनिक अमले के लिए सरकार का यह परिपत्र मात्र एक औपचारिकता बनकर रह गया है, जो विभागों में पहुंचते ही कूड़ेदान में डाल दिया जाता है।

सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार वाले विभागों का लेखा-जोखा: कहां कितने घूसखोर:-

1234 मामलों के विभागवार वर्गीकरण के आधार पर:

क्र. सं.विभाग का नामएसीबी द्वारा प्रेषित कुल मामले (प्रस्ताव)स्वीकृत मामले (देरी से)अभी भी पेंडिंग / खारिजमुख्य पद जिन पर गिरी गाज
1राजस्व विभाग (Revenue)~252~148~104पटवारी, गिरदावर, तहसीलदार, SDM (RAS)
2पुलिस विभाग (Police)~214~142~72कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल, SI, CI, ASP
3स्वायत्त शासन व UDH~146~58~88चेयरमैन, आयुक्त, EO, JEN, XEN, पार्षद
4पंचायती राज विभाग~144~74~70सरपंच, ग्राम विकास अधिकारी (VDO), JTA, BDO
5ऊर्जा विभाग (डिस्कॉम)~78~48~30JEN, AEN, XEN, लाइनमैन, तकनीकी सहायक
6चिकित्सा एवं स्वास्थ्य~44~28~16डॉक्टर, BCMO, नर्सिंग ऑफिसर, औषधि नियंत्रक
7शिक्षा विभाग~34~18~16शिक्षक, संस्था प्रधान, DEO, प्रोफेसर
8जल संसाधन / PHED~30~14~16मुख्य अभियंता (CE), अधीक्षण अभियंता, AEN

एसीबी की रेड से लेकर कोर्ट तक का ‘सेटिंग और स्लो-पॉइजन’ खेल:-

अक्सर जनता यह देखकर खुश होती है कि एसीबी ने घूसखोर तहसीलदार, इंजीनियर या पुलिस अफसर को रिश्वत लेते रंगे हाथों दबोच लिया। तस्वीरें छपती हैं, वाहवाही लूटी जाती है। लेकिन असली खेल इस ट्रैप के बाद शुरू होता है:

-सालों तक अनुसंधान और ड्राफ्टिंग: एसीबी की जांच टीम प्रारंभिक अनुसंधान पूरा करके विभाग को अभियोजन स्वीकृति का प्रस्ताव भेजने में ही महीनों लगा देती है।

-विभागों की जानबूझकर की गई लेटलतीफी: विभाग में फाइल पहुंचते ही बाबू से लेकर सक्षम प्राधिकारी तक आरोपी के हमदर्द बन जाते हैं। कभी फाइल ‘विधि राय’ के नाम पर तो कभी ‘एसीबी से स्पष्टीकरण’ मांगने के नाम पर घुमाई जाती है।

-गवाहों का मुकरना और सबूतों का नष्ट होना: जब अभियोजन स्वीकृति में 2 से 4 साल का विलंब हो जाता है, तब तक परिवादी थक-हार जाता है। विभागीय गवाहों का तबादला हो जाता है या उन्हें लालच देकर मैनेज कर लिया जाता है।

-कोर्ट में केस का दम तोड़ना: जब तक मामला विशेष अदालत तक पहुंचता है, केस की तकनीकी कड़ियां कमजोर पड़ चुकी होती हैं। केस डायरी के अहम साक्ष्य गायब हो जाते हैं और अदालत के सामने मजबूत कानूनी आधार न होने के कारण आरोपी कर्मचारी/अधिकारी अंततः बाइज्जत बरी हो जाते हैं। बरी होते ही उन्हें बहाल कर पूरा एरियर और प्रमोशन तक दे दिया जाता है।

कौन-से विभाग बने भ्रष्टाचारियों की सबसे सुरक्षित शरणगाह:-

एसीबी के आंकड़ों की पड़ताल करने पर राज्य के प्रमुख विभागों का चौंकाने वाला चेहरा सामने आता है:

-राजस्व विभाग (Revenue): पटवारी, गिरदावर, नायब तहसीलदार और आरएएस स्तर के एसडीएम तक के मामलों में सबसे ज्यादा पेंडेंसी इसी विभाग में है। जमीन के नामांतरण और पैमाइश के नाम पर पकड़े गए दर्जनों राजस्व कर्मियों की फाइलें सचिवालय और राजस्व मंडल में वर्षों से दबाकर रखी गई हैं।

-पुलिस महकमा (Police): कानून के रखवाले जब खुद रिश्वत लेते पकड़े जाते हैं, तो गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय उनकी अभियोजन स्वीकृति पर कुंडली मारकर बैठ जाता है। कांस्टेबल से लेकर एएसपी स्तर के अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति के प्रस्तावों को साल-दर-साल अटकाया जाता है।

-स्वायत्त शासन व यूडीएच (UDH/LSG): नगर निगमों, नगर परिषदों और जेडीए/यूआईटी के चेयरमैन, कमिश्नर, अधिशाषी अधिकारी (EO) और अभियंताओं के खिलाफ मामले ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं ताकि निर्माण व टेंडर के सिंडिकेट पर आंच न आए।

-पंचायती राज और शिक्षा विभाग: सरपंच, वीडीओ, पंचायत प्रसार अधिकारी और जिला शिक्षा अधिकारियों की अभियोजन स्वीकृति के प्रस्तावों पर महीनों तक कोई निर्णय नहीं लिया जाता, जिससे ग्रामीण विकास और शिक्षा के फंड में हुआ गबन फाइलों में ही दफन हो जाता है।

-ऊर्जा व जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी (PHED & Energy): डिस्कॉम के अधीक्षण अभियंता, अधिशाषी अभियंता (XEN) और तकनीकी सहायकों के मामलों में ‘विभागीय क्षति’ की दलीलें देकर फाइलें रोक ली जाती हैं।

सरकारी सिस्टम में क्या यही है जीरो टॉलरेंस:-

-पहला सवाल: जब 13 अप्रैल 2012 के परिपत्र में स्पष्ट रूप से 4 महीने की सीमा तय है, तो 1234 में से एक भी मामले में समय पर निर्णय न लेने वाले दोषी विभागाध्यक्षों पर आज तक कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

-दूसरा सवाल: क्या एसीबी के ट्रैप सिर्फ जनता की आंखों में धूल झोंकने और मीडिया में सुर्खियां बटोरने के लिए किए जाते हैं, जबकि पर्दे के पीछे भ्रष्ट अफसरों को बचाने का सुरक्षित रास्ता पहले से तय होता है?

-तीसरा सवाल: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 के तहत निर्धारित वैधानिक समय-सीमा का उल्लंघन करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को अदालत की अवमानना का दोषी क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

राजस्थान का यह प्रशासनिक ढर्रा चीख-चीख कर कह रहा है कि राज्य में भ्रष्टाचार पर वार सिर्फ कागजी है। जब तक अभियोजन स्वीकृति में देरी करने वाले सक्षम प्राधिकारियों को सह-अभियुक्त बनाने का कानून नहीं बनेगा, तब तक ‘एक-दो-तीन-चार’ के आंकड़े यूं ही बढ़ते रहेंगे और भ्रष्टाचार की जय-जयकार होती रहेगी।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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