जयपुर: जिंदगी जब हर कदम पर इम्तिहान ले और गमों का पहाड़ टूट पड़े, तब कुछ लोग हार मान लेते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो मुश्किलों को अपनी सीढ़ी बनाकर बुलंदियों को छू लेते हैं। राजस्थान के जयपुर जिले के खानिया गांव की रहने वाली सरोज कुमारी शर्मा ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। जीवन के सबसे बड़े व्यक्तिगत आघातों और पारिवारिक जिम्मेदारियों को झेलने के बावजूद सरोज ने हार नहीं मानी और महज एक साल के भीतर चार अलग-अलग सरकारी नौकरियों में चयन पाकर एक मिसाल कायम की है।
शादी के वक्त थीं महज 10वीं पास, गृहस्थी के साथ जारी रखी पढ़ाई
दौसा की मूल निवासी सरोज कुमारी शर्मा की शादी साल 2010 में सुनील कुमार शर्मा के साथ हुई थी। उस समय वह केवल दसवीं कक्षा पास थीं। ससुराल आने के बाद उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने के साथ-साथ अपनी पढ़ाई को कभी रुकने नहीं दिया। उन्होंने घर पर ही रहकर अपनी पढ़ाई जारी रखी और बारहवीं, बीए, एमए, बीएड के साथ-साथ लाइब्रेरियन की डिग्री भी हासिल कर ली। सिर्फ इतना ही नहीं, उन्होंने घर पर ही तैयारी कर दो बार प्रतिष्ठित आरएएस (RAS) प्री परीक्षा भी पास की।
जिंदगी के सबसे बड़े झटके: बेटे और पति को खोया
सरोज का जीवन आसान नहीं था। वर्ष 2015 में उनके एक साल के छोटे बेटे का निमोनिया के कारण निधन हो गया, जिसने एक माँ के दिल को झकझोर कर रख दिया। इसके बाद, अक्टूबर 2022 में उनके पति सुनील कुमार शर्मा का भी अचानक हार्ट अटैक से निधन हो गया। सुनील एक छोटी सी दुकान चलाते थे। पति के असमय जाने के बाद उनकी एक बेटी देवांशी की पूरी जिम्मेदारी सरोज के कंधों पर आ गई। इन गहरे मानसिक और पारिवारिक संकटों ने उन्हें तोड़ सकता था, लेकिन सरोज ने अपनी और अपनी बेटी की तकदीर बदलने के लिए किताबों का दामन नहीं छोड़ा।
एक साल में चार सरकारी नौकरियों में सफलता
सरोज ने अपनी अधिकांश परीक्षाओं की तैयारी बिना किसी कोचिंग के घर पर रहकर ही की। उनकी कड़ी मेहनत रंग लाई और सफलता का सिलसिला शुरू हुआ:
- अक्टूबर 2025: सरोज का चयन पशु परिचर (Animal Attendant) के पद पर हुआ और उन्हें कालवाड़ में पोस्टिंग मिली। करीब चार महीने तक सेवा देने के बाद उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया।
- साल 2026: इसके बाद उनका चयन पटवारी के पद पर हुआ और उन्हें ब्यावर में नियुक्ति मिली, जहाँ फिलहाल उनकी ट्रेनिंग चल रही है।
- अन्य चयन: इसी दौरान उनका चयन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी और लाइब्रेरियन ग्रेड थर्ड के पद पर भी हो गया। लाइब्रेरियन ग्रेड थर्ड के रूप में उन्हें ब्यावर में ही नियुक्ति मिली है।
परिवार का मिला अटूट साथ
इस कठिन सफर में सरोज अपने परिवार को अपनी ताकत मानती हैं। वह अपनी सफलता का श्रेय अपने ससुर अशोक कुमार शर्मा, सास विमला, मां गीता देवी और पिता मोहन लाल शर्मा को देती हैं। इन सभी ने हर मुश्किल मोड़ पर सरोज का हौसला बढ़ाया और उन्हें लगातार आगे बढ़ने और पढ़ने के लिए प्रेरित किया।
सरोज कुमारी शर्मा का यह सफर यह साबित करता है कि रास्ते चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, यदि हौसला बुलंद हो और लक्ष्य स्पष्ट हो, तो सफलता की मंजिल हासिल की जा सकती है। उनकी यह कहानी आज के युवाओं और खासकर उन महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है जो विपरीत परिस्थितियों में घबरा जाती हैं।