जयपुर, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) 2026 के ‘सूर्यमहल’ प्रांगण में आयोजित ‘एपिक वीमन’ सत्र के दौरान पौराणिक महाकाव्यों में महिलाओं के सशक्त चरित्र, उनकी इच्छाओं और निर्णयों पर गहन मंथन हुआ। इस सत्र में ‘भीमाज़ वाइफ’ (Bhima’s Wife) की लेखिका कविता काने, तेलुगु नारीवादी लेखिका वोलगा और मशहूर लेखक आनंद नीलकंठन ने हिस्सा लिया। चर्चा का मुख्य केंद्र यह रहा कि कैसे पुरुष प्रधान समाज द्वारा लिखे गए इतिहास में महिलाओं की स्वायत्तता और उनके राजनीतिक कौशल को नजरअंदाज किया गया।
हिडिम्बा: शर्तों पर जीने वाली पहली ‘सिंगल मदर’
प्रसिद्ध लेखिका कविता काने, जिन्होंने भीम की पहली पत्नी हिडिम्बा पर केंद्रित अपनी नई पुस्तक लिखी है, ने कहा कि हिडिम्बा को अक्सर केवल एक ‘राक्षसी’ के रूप में देखा गया, लेकिन वह वास्तव में एक क्रांतिकारी महिला थीं।
- स्वतंत्र निर्णय: कविता ने बताया, “हिडिम्बा पहली ऐसी महिला थीं जिन्होंने अपने समुदाय से बाहर विवाह करने का साहसी कदम उठाया। उन्होंने जानते हुए भी भीम को चुना कि यह विवाह केवल संतान प्राप्ति तक ही सीमित रहेगा।” * राजनीतिक कौशल: उन्होंने जोर देकर कहा कि प्राचीन काल में महिलाएं राजनीतिक रूप से बहुत सशक्त थीं। राजा दशरथ भी कैकेयी से सलाह लेकर निर्णय लेते थे, लेकिन बाद के लेखकों ने उनकी आत्मनिर्भरता और बौद्धिक क्षमता को दरकिनार कर केवल पुरुषों के शौर्य को महिमामंडन किया।
दक्षिण भारतीय रामायण: जहाँ सीता ने राम से माँगी अग्निपरीक्षा
लेखक आनंद नीलकंठन ने रामायण के विभिन्न क्षेत्रीय संस्करणों पर बात करते हुए चौंकाने वाले तथ्य साझा किए। उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत की कुछ रामायण परंपराओं में कथा का नजरिया बिल्कुल अलग है।
“आम तौर पर हम जानते हैं कि सीता को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी थी, लेकिन दक्षिण की कुछ लोक कथाओं में सीता राम से कहती हैं कि वे अपना पुरुषार्थ प्रमाणित करने के लिए अग्निपरीक्षा दें। वहाँ सीता ने महल के द्वार तब तक नहीं खोले, जब तक लक्ष्मण ने राम की पवित्रता और पुरुषार्थ की गवाही नहीं दी।” — आनंद नीलकंठन
शबरी और कैकेयी: दो पन्नों में सिमटा महान इतिहास
तेलुगु लेखिका वोलगा ने महाकाव्यों में महिला पात्रों के साथ हुए ‘साहित्यिक अन्याय’ पर प्रहार किया। उन्होंने कहा कि रामायण में शबरी जैसे महान और दार्शनिक चरित्र को सिर्फ दो पन्नों में समेट दिया गया। वोलगा के अनुसार, शबरी की जीवन यात्रा और उनकी तपस्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा गायब कर दिया गया। इसी तरह कैकेयी के चरित्र को भी केवल नकारात्मक चश्मे से देखा गया, जबकि वह एक महान योद्धा और रणनीतिकार थीं।
निष्कर्ष: सत्र के अंत में सभी वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि अब समय आ गया है जब महाकाव्यों को ‘महिलाओं के नजरिए’ से दोबारा पढ़ा और लिखा जाए, ताकि उन पात्रों को न्याय मिल सके जिन्हें इतिहास ने हाशिए पर रखा।
