भारत आज विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है। अंतरिक्ष से लेकर तकनीक और अर्थव्यवस्था तक हर क्षेत्र में भारत अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। लेकिन एक ऐसा सवाल है जो हर माता-पिता, छात्र और जिम्मेदार नागरिक को झकझोरता है—आखिर दुनिया के अधिकांश देशों में जहां स्कूली और उच्च शिक्षा व्यवस्था छात्रों को प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त बनाती है, वहीं भारत में कोचिंग संस्थानों का इतना बड़ा साम्राज्य क्यों खड़ा हो गया?
क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर हो चुकी है कि स्कूल और कॉलेज केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं? क्या केंद्र और राज्य सरकारें कोचिंग माफियाओं के सामने बेबस हैं? और सबसे बड़ा सवाल—आखिर इस व्यवस्था की कीमत हर साल हजारों छात्रों को अपनी जान देकर क्यों चुकानी पड़ रही है?
कोचिंग राजधानी बना भारत
भारत में प्रवेश परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए हजारों कोचिंग संस्थान संचालित हो रहे हैं। विशेष रूप से राजस्थान का कोटा शहर “कोचिंग कैपिटल” के नाम से जाना जाता है, जहां हर साल लाखों छात्र डॉक्टर और इंजीनियर बनने का सपना लेकर पहुंचते हैं। लेकिन इन सपनों के शहर ने पिछले कुछ वर्षों में छात्रों की मौतों और आत्महत्याओं के कारण राष्ट्रीय चिंता का विषय बना दिया है।
कोटा में वर्ष 2023 में 26 छात्रों ने आत्महत्या की, वर्ष 2024 में 17 और वर्ष 2025 में भी 14 से अधिक मामलों की पुष्टि हुई। हालांकि, वास्तविक आंकड़े और भी अधिक हो सकते हैं, किंतु सिस्टम की खामियों ने इन आंकड़ों के साथ भी खेल खेला है। यह केवल कोटा का आंकड़ा है। देशभर में फैले कोचिंग केंद्रों, विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में होने वाली मौतों का कोई समग्र राष्ट्रीय डाटाबेस तक उपलब्ध नहीं है।
पिछले पांच वर्षों की भयावह तस्वीर
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार छात्र आत्महत्याओं के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं। हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार स्थिति इस प्रकार है:
| वर्ष | छात्र आत्महत्याओं की संख्या |
| 2020 | 12,526 |
| 2021 | 13,089 |
| 2022 | 13,044 |
| 2023 | 13,892 |
| 2024 | 14,488 |
अर्थात केवल पांच वर्षों में लगभग 67 हजार से अधिक छात्र अपनी जान गंवा चुके हैं। यह संख्या कई छोटे शहरों की कुल आबादी के बराबर है।
देश में कुल आत्महत्याओं की स्थिति (इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार):
- 2019: 1.39 लाख
- 2020: लगभग 1.53 लाख
- 2021: लगभग 1.64 लाख
- 2022: लगभग 1.70 लाख
- 2023: 1.71 लाख से अधिक
वर्ष 2023 में देश की कुल आत्महत्याओं में छात्रों की हिस्सेदारी लगभग 8.1 प्रतिशत रही।
यह केवल आत्महत्या नहीं, यह संस्थागत विफलता है
हर बार किसी छात्र की मौत होती है, तो सरकारें जांच के आदेश देती हैं। हर बार संस्थान संवेदना व्यक्त करते हैं। हर बार अधिकारियों की बैठकें होती हैं। हर बार कुछ दिशा-निर्देश जारी होते हैं और हर बार मामला कुछ दिनों बाद ठंडे बस्ते में चला जाता है।
आज तक किसी बड़े कोचिंग संस्थान की जवाबदेही तय नहीं हुई। किसी शिक्षा बोर्ड, परीक्षा एजेंसी, मंत्रालय या प्रशासनिक अधिकारी को छात्रों की मौतों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे सिस्टम में छात्र की जान की कीमत केवल एक प्रेस विज्ञप्ति और कुछ दिनों की मीडिया चर्चा तक सीमित होकर रह गई है।
आखिर छात्र मर क्यों रहे हैं? कारण स्पष्ट हैं—
- अत्यधिक प्रतिस्पर्धा
- बार-बार परीक्षा और पुनर्परीक्षा का दबाव
- कोचिंग आधारित शिक्षा मॉडल
- अभिभावकों की असीमित अपेक्षाएं
- रोजगार की अनिश्चितता
- मानसिक स्वास्थ्य सहायता का अभाव
- स्कूल शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षा पाठ्यक्रम के बीच भारी अंतर
- शिक्षा का पूरी तरह व्यवसायीकरण
जब एक छात्र को यह महसूस कराया जाता है कि उसका पूरा भविष्य केवल एक परीक्षा पर निर्भर है, तब वह असफलता को जीवन का अंत समझने लगता है।
विकसित देशों में ऐसा क्यों नहीं?
विश्व के अधिकांश विकसित देशों में स्कूल और विश्वविद्यालय ही मुख्य शिक्षा केंद्र हैं। वहां प्रवेश परीक्षाओं का दबाव अपेक्षाकृत कम है और विद्यार्थियों का मूल्यांकन केवल एक परीक्षा से नहीं होता। भारत में स्थिति इसके विपरीत है। यहां स्कूल की पढ़ाई अलग चलती है और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी अलग। परिणामस्वरूप कोचिंग उद्योग समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुका है। यह स्थिति स्वयं इस बात का प्रमाण है कि हमारी औपचारिक शिक्षा व्यवस्था छात्रों को प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं कर पा रही।
जवाबदेही तय कब होगी?
यदि किसी पुल के गिरने से लोगों की मौत होती है, तो इंजीनियर और ठेकेदार जिम्मेदार ठहराए जाते हैं। यदि किसी अस्पताल में लापरवाही से मौत होती है, तो डॉक्टरों और प्रबंधन की जवाबदेही तय होती है। लेकिन जब हजारों छात्र शिक्षा व्यवस्था की खामियों, परीक्षा तंत्र की अव्यवस्था, मानसिक दबाव और संस्थागत विफलताओं के कारण जान गंवाते हैं, तब कोई जिम्मेदार क्यों नहीं होता? यह सबसे बड़ा प्रश्न है।
संयुक्त अभिभावक संघ मांग करता है कि—
- पिछले पांच वर्षों में छात्रों की सभी आत्महत्याओं और संदिग्ध मौतों पर राष्ट्रीय स्तर पर श्वेत पत्र (White Paper) जारी किया जाए।
- छात्र मौतों की जवाबदेही तय करने हेतु राष्ट्रीय छात्र सुरक्षा आयोग का गठन हो।
- कोचिंग संस्थानों के लिए सख्त नियामक कानून लागू किया जाए।
- प्रत्येक कोचिंग और शिक्षण संस्थान में स्वतंत्र मानसिक स्वास्थ्य सहायता केंद्र अनिवार्य हो।
- शिक्षा और प्रवेश परीक्षाओं में व्यापक सुधार कर कोचिंग निर्भरता कम की जाए।
- छात्र आत्महत्या के प्रत्येक मामले की न्यायिक जांच हो तथा रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
निष्कर्ष
जब कोई छात्र मरता है तो केवल एक जीवन समाप्त नहीं होता, एक परिवार टूटता है, एक सपना बिखरता है और राष्ट्र अपनी संभावनाओं का एक हिस्सा खो देता है। यदि 21वीं सदी का भारत हर वर्ष हजारों छात्रों को खोने के बाद भी शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर पुनर्विचार नहीं करता, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि राष्ट्रीय संवेदनहीनता का प्रतीक होगा।
आज आवश्यकता नई कोचिंग बिल्डिंग बनाने की नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाने की है जहां किसी बच्चे को अपने सपनों की कीमत अपनी जान देकर न चुकानी पड़े।

✍🏻 अभिषेक जैन बिट्टू
राजस्थान प्रदेश प्रवक्ता & मीडिया प्रभारी
संयुक्त अभिभावक संघ, जयपुर
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.