बाड़मेर में अवैध कॉलोनियों का बड़ा खेल, 440 कॉलोनियां रिकॉर्ड में फिर भी कार्रवाई नहीं

बाड़मेर। राजस्थान के सीमावर्ती जिले बाड़मेर में अवैध कॉलोनियों का कारोबार लगातार बढ़ता जा रहा है। शहर के आसपास कृषि भूमि को बिना भूमि उपयोग परिवर्तन (कन्वर्जन) की अनुमति लिए आवासीय कॉलोनियों में तब्दील किया जा रहा है। कॉलोनाइजर खेतों को समतल कर, कच्ची और ग्रेवल सड़कें बनाकर स्टांप पेपर के जरिए भूखंड बेच रहे हैं, जबकि जिम्मेदार एजेंसियां अब तक प्रभावी कार्रवाई करने में नाकाम रही हैं।

स्थिति यह है कि शहरी सुधार न्यास (यूआईटी) और नगर परिषद क्षेत्र में वर्षों से अवैध बसावट का सिलसिला जारी है। सर्वे और नोटिस जारी करने के बावजूद अवैध प्लॉटिंग का कारोबार खुलेआम चल रहा है और हजारों बीघा कृषि भूमि कॉलोनियों में बदल चुकी है।

शहर के चारों ओर फैल रहा अवैध कॉलोनियों का जाल

बाड़मेर शहर से जुड़े कई इलाकों में अवैध कॉलोनियों का तेजी से विस्तार हुआ है। शिवकर रोड, महाबार रोड, गडरारोड, उत्तरलाई रोड, दानजी की होदी, बाड़मेर मगरा, जालीपा, हापों की ढाणी रोड, गेहूं रोड और बीदासर सहित कई क्षेत्रों में बड़ी संख्या में बिना स्वीकृति कॉलोनियां विकसित हो चुकी हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो इन क्षेत्रों में भी बलदेव नगर, दानजी की होदी और विष्णु कॉलोनी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं, जहां मूलभूत सुविधाओं का गंभीर संकट बना हुआ है।

500 से अधिक कॉलोनियां विकसित, रिकॉर्ड में 440 अवैध

यूआईटी और नगर परिषद क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों के दौरान 500 से अधिक कॉलोनियां बिना अनुमति विकसित होने का अनुमान है। इनमें भूखंडों की खरीद-फरोख्त लगातार जारी है, लेकिन अधिकांश मामलों में न तो भूमि का वैधानिक कन्वर्जन कराया गया और न ही नियमानुसार आधारभूत सुविधाएं विकसित की गईं।

यूआईटी के रिकॉर्ड के अनुसार, दो वर्ष पहले किए गए सर्वे में 440 से अधिक अवैध कॉलोनियां चिन्हित की गई थीं। इसके बावजूद अब तक केवल 25 कॉलोनियों का ही कन्वर्जन हो सका है। इससे स्पष्ट है कि अवैध कॉलोनियों की संख्या लगातार बढ़ती रही, जबकि नियमितीकरण और कार्रवाई की प्रक्रिया बेहद धीमी रही।

सेटेलाइट सर्वे में भी सामने आई हकीकत

यूआईटी ने अवैध कॉलोनियों की पहचान के लिए सेटेलाइट सर्वे भी कराया था। सर्वे में बड़ी संख्या में ऐसी कॉलोनियां सामने आईं, जहां कृषि भूमि को नियमों की अनदेखी कर आवासीय उपयोग में लाया गया था।

हालांकि सर्वे के बाद भी जमीनी स्तर पर स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। कई कॉलोनियों में निर्माण कार्य जारी है और नए प्लॉटों की बिक्री भी लगातार हो रही है।

नियमों की अनदेखी, नहीं छोड़ी गई सार्वजनिक सुविधाओं की जमीन

अवैध कॉलोनियों में सबसे बड़ी समस्या बुनियादी सुविधाओं की कमी है। कई स्थानों पर मात्र 20 फीट चौड़ी सड़कें छोड़कर प्लॉट काट दिए गए हैं। पार्क, अस्पताल, सामुदायिक भवन, पानी की टंकी, मंदिर और अन्य सार्वजनिक उपयोग की सुविधाओं के लिए आवश्यक भूमि आरक्षित नहीं की गई।

नियमों के अनुसार किसी भी कॉलोनी विकास में 60:40 का अनुपात लागू होता है। इसके तहत 60 प्रतिशत भूमि पर ही प्लॉटिंग की जा सकती है, जबकि 40 प्रतिशत भूमि सार्वजनिक सुविधाओं और अधोसंरचना विकास के लिए सुरक्षित रखना अनिवार्य होता है। लेकिन अधिकांश अवैध कॉलोनियों में इन नियमों का पालन नहीं किया गया।

2024 में 72 कॉलोनियों को जारी किए गए थे अंतिम नोटिस

यूआईटी ने वर्ष 2024 में विशेष सर्वे कर 72 कॉलोनियों को चिन्हित किया था। इन कॉलोनियों के कॉलोनाइजरों को अंतिम नोटिस भी जारी किए गए थे और उन्हें कन्वर्जन शुल्क जमा कराने के निर्देश दिए गए थे।

इसके बावजूद अधिकांश कॉलोनाइजरों ने शुल्क जमा नहीं कराया। वहीं यूआईटी की ओर से भी कॉलोनियों को सीज करने, अवैध निर्माण हटाने या विकास कार्य रोकने जैसी सख्त कार्रवाई नहीं की गई। परिणामस्वरूप हजारों बीघा कृषि भूमि अवैध रूप से प्लॉटिंग कर बेच दी गई।

भविष्य में बढ़ सकती हैं नागरिक समस्याएं

शहरी योजनाकारों का मानना है कि बिना योजना विकसित हो रही कॉलोनियां भविष्य में शहर के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं। इन क्षेत्रों में सड़क, सीवरेज, पेयजल, स्ट्रीट लाइट और सार्वजनिक सुविधाओं की कमी के कारण निवासियों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

इसके अलावा, अवैध कॉलोनियों के नियमितीकरण पर सरकार और स्थानीय निकायों को भविष्य में भारी वित्तीय बोझ भी उठाना पड़ सकता है।

नए यूआईटी सचिव ने दिए कार्रवाई के संकेत

यूआईटी सचिव विवेक व्यास ने कहा कि उन्होंने हाल ही में पदभार संभाला है। अवैध कॉलोनियों और कन्वर्जन से जुड़े मामलों की समीक्षा की जाएगी। यदि कहीं नियमों के विपरीत कॉलोनियां विकसित हुई हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। साथ ही पूर्व में हुए सर्वे और नोटिसों की भी जांच कराई जाएगी।

अब देखने वाली बात यह होगी कि वर्षों से फाइलों और नोटिसों में उलझा यह मामला जमीनी कार्रवाई तक पहुंचता है या नहीं।


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