नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया को पूरी तरह से वैध और संवैधानिक करार देते हुए भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को एक बड़ी राहत दी है। अदालत ने बिहार चुनाव या अन्य राज्य चुनावों से पहले मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR नोटिफिकेशन) को चुनौती देने वाली सभी जनहित याचिकाओं (PILs) को खारिज कर दिया है।
(नोट: अदालत की बेंच में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल थे। याचिका में ‘सीजेआई सूर्यकांत’ का उल्लेख एक तथ्यात्मक त्रुटि प्रतीत होती है, क्योंकि वह सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश हैं, मुख्य न्यायाधीश नहीं।)
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग को SIR के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाने का अधिकार है और विशेष परिस्थितियों में कानून के दायरे में रहते हुए अलग प्रक्रिया अपनाना संविधान का अपमान नहीं है।
संविधान के तहत चुनाव आयोग के अधिकार
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का हवाला देते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों की पुष्टि की:
- संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के तहत निर्वाचन आयोग को वोटर लिस्ट की जांच, संशोधन और सत्यापन करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
- लोकतंत्र की मजबूती के लिए एक साफ, पारदर्शी और अपडेटेड मतदाता सूची का होना बेहद आवश्यक है।
- SIR प्रक्रिया चुनाव सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक कदम है।
नाम हटने का अर्थ नागरिकता समाप्त होना नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता और मतदाता सूची के संबंध में एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) से किसी व्यक्ति का नाम हट जाने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि वह अपनी नागरिकता खो चुका है।
- अदालत के अनुसार, “यदि किसी नागरिक का नाम मतदाता सूची में नहीं है, तो यह साबित नहीं करता कि वह विदेशी है या अपनी नागरिकता साबित करने में असमर्थ है। यह केवल चुनाव आयोग की उस समय नागरिकता सत्यापित करने की असमर्थता को दर्शाता है।”
- कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि 2003 में आयोजित SIR के दौरान जिन लोगों के नाम हटा दिए गए थे, उनकी नागरिकता की स्थिति के सत्यापन के लिए मामलों को उचित न्यायाधिकरणों (ट्रिब्यूनल) के पास भेजा जाए।
11 दस्तावेजों की सूची और आधार (Aadhaar) पर कोर्ट का रुख
याचिकाकर्ता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने फैसले से जुड़े कई अहम बिंदुओं को स्पष्ट किया:
- चुनाव आयोग द्वारा सत्यापन के लिए निर्धारित किए गए 11 दस्तावेजों के समूह को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह से उपयुक्त माना है।
- ये दस्तावेज किसी भी नियम या कानून का उल्लंघन नहीं करते हैं।
- आधार कार्ड को लेकर अदालत ने कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की। इसे न तो अनिवार्य घोषित किया गया और न ही खारिज किया गया। आगे की कार्यप्रणाली तय करने का अधिकार चुनाव आयोग पर छोड़ दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें और निष्कर्ष
वकील अश्विनी उपाध्याय ने बताया कि विपक्ष और अन्य पक्षों द्वारा दायर 20 से अधिक जनहित याचिकाओं में चुनाव आयोग की निष्पक्षता और अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया है।
कोर्ट ने माना कि चुनाव आयोग ने SIR की पूरी प्रक्रिया को स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से संचालित किया है। स्वतंत्र और पारदर्शी चुनावों के लिए यह अनिवार्य है कि मतदाता सूची में किसी भी अयोग्य व्यक्ति का नाम शामिल न हो। यह फैसला देश में चुनाव प्रक्रिया को और अधिक मजबूत तथा विश्वसनीय बनाने में मील का पत्थर साबित होगा।