Big Expose: PHED की घटिया ‘इंजीनियरिंग’? ‘लापरवाही’ ने छीना 190 गांवों का पानी, जल जीवन मिशन में PHED का एक और बड़ा ‘कांड’ उजागर !

-205 करोड़ के धौलपुर-राजाखेड़ा पेयजल प्रोजेक्ट का 4 साल बाद भी टेंडर ही फाइनल नहीं कर पाए PHED इंजीनियर

-जनवरी 2025 में आमंत्रित टेंडर मई 2026 में 16 महिने बाद निरस्त, लापरवाही के लिए PHED में कोई जिम्मेदार नहीं !

जयपुर। सरकारें योजनाएं बनाती हैं, बजट जारी करती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बैठे PHED (जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग) के आला अधिकारियों की लापरवाही और कछुआ चाल के कारण वे योजनाएं कैसे दम तोड़ देती हैं, इसका एक जीता-जागता और शर्मनाक नमूना सामने आया है। जल जीवन मिशन (JJM) के तहत धौलपुर और राजाखेड़ा ब्लॉक के 190 गांवों को मीठा पानी पहुंचाने की एक बड़ी लिफ्ट सिंचाई सह पेयजल परियोजना भ्रष्टाचार, सुस्ती और लालफीताशाही की भेंट चढ़कर निरस्त (Annulled) हो चुकी है।

करोड़ों रुपये की इस योजना के रद्द होने के पीछे किसी प्राकृतिक आपदा या बजट की कमी का हाथ नहीं है, बल्कि इसके पीछे सीधे तौर पर PHED के इंजीनियर्स की घोर लापरवाही है।

लापरवाही का पूरा खेल: कैसे समय गंवाते रहे अधिकारी?

इस पूरे मामले की क्रोनोलॉजी को देखें तो समझ आता है कि जनता की प्यास से ज्यादा अधिकारियों को फाइलों को दबाए रखने में दिलचस्पी थी:

-फरवरी 2025 में खुली थीं तकनीकी बोलियां: NIT संख्या 02/2024-25 के तहत इस ₹205.20 करोड़ के प्रोजेक्ट के लिए तकनीकी बिड्स 11 फरवरी 2025 को ही खोल दी गई थीं।

-प्राइस बिड खोलने में लगाए 4 महीने: तकनीकी रूप से योग्य कंपनियों की फाइनेंशियल बिड खोलने में ही विभाग ने जून के आखिरी (30.06.2025) तक का समय बर्बाद कर दिया।

-जुलाई 2025 में मिली मंजूरी, फिर सो गया विभाग: जुलाई 2025 में फाइनेंस कमेटी (FC-904) ने सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी (M/s श्री हरि इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स) को मंजूरी दे दी थी। चूंकि बिड तय लागत से 11.52% ज्यादा थी, इसलिए नियमानुसार इसे वित्त विभाग (Finance Department) को भेजा गया।

-फाइल भेजी और भूल गए: 24 जुलाई 2025 को ई-फाइल वित्त विभाग को भेजी गई। इसके बाद PHED के मुख्य अभियंता (CE-SP) और उनकी टीम हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। न तो समय पर पैरवी की गई और न ही मंजूरी के लिए कोई गंभीर प्रयास किए गए।

बड़ा सवाल: जब एक-एक कर खत्म हो रही थी ‘बिड वैलिडिटी’, तब क्या सो रहे थे इंजीनियर्स?

इस खेल का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि निविदा में शामिल कंपनियों की बिड वैलिडिटी (निविदा की वैधता अवधि) एक-एक कर समाप्त होती रही, लेकिन इंजीनियर्स ने आँखें मूंद रखी थीं:

-दो कंपनियों की वैलिडिटी 11 जुलाई 2025 को खत्म हुई।

-तीसरी कंपनी की वैलिडिटी 31 अगस्त 2025 को खत्म हो गई।

-L1 (न्यूनतम बोलीदाता) कंपनी की वैलिडिटी 14 मार्च 2026 तक थी। लेकिन विभाग की सुस्ती से तंग आकर उस कंपनी ने भी अपनी वैलिडिटी आगे बढ़ाने से साफ मना कर दिया।

-परिणाम: आखिरकार RTPP नियम 2013 के नियम 72 के तहत इस पूरी निविदा प्रक्रिया को ही निरस्त (Annul) करना पड़ा और अब नए सिरे से टेंडर बुलाए जाएंगे।

‘Expose Now’ के तीखे सवाल:

-क्या यही है PHED इंजीनियर्स की इंजीनियरिंग?

जब आपको पता था कि करोड़ों रुपये के टेंडर की वैलिडिटी खत्म हो रही है, तो वित्त विभाग से समय पर मंजूरी लाने के लिए व्यक्तिगत पैरवी क्यों नहीं की गई? क्या अधिकारियों की सैलरी इस तरह फाइलों को लटकाने के लिए दी जा रही है?

-जनता की प्यास से किसी को कोई लेना-देना क्यों नहीं?

धौलपुर और राजाखेड़ा के 190 गांवों के हजारों परिवार पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। उनकी प्यास बुझाने वाले प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डालकर इंजीनियर्स किस ‘महान कार्य’ में व्यस्त थे? अब जब नए सिरे से बिड बुलाई जाएगी, तो प्रोजेक्ट की लागत और बढ़ेगी और जनता को पानी मिलने में सालों की देरी होगी। क्या इस वित्तीय और सामाजिक नुकसान की भरपाई लापरवाह इंजीनियर्स की जेब से होगी?

-कमेटी ने जताई कड़ी नाराजगी, माँगा जवाब

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए हाल ही में हुई FC-917 की बैठक में कमेटी ने इस निरस्तीकरण पर घोर अप्रसन्नता (Displeasure) व्यक्त की है। कमेटी ने मुख्य अभियंता (CE-SP) को कड़ी फटकार लगाते हुए निर्देश दिए हैं कि भविष्य में ऐसे मामलों में समय पर पैरवी सुनिश्चित की जाए। प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति (A&F Sanction) से लेकर टेंडर निरस्त होने तक की पूरी टाइमलाइन और देरी के पुख्ता कारणों की रिपोर्ट सौंपी जाए। लेकिन अब सवाल उठता है कि जनता की प्यास से जुड़े मामले में इतनी गंभीर लापरवाही बरतने वाले इंजीनियर्स को फटकार लगाकर मामले को रफादफा कर दिया गया। इस मामले में लापरवाही बरतने वाले इंजीनियर्स को सस्पेंड करने के साथ ही भविष्य में प्रोजेक्ट लागत में बढ़ी हुई दरों की वसूली इन्हीं लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदार इंजीनियर्स से करने का निर्णय लिया जाता तो इंजीनियर्स अपने कार्य और जिम्मेदारी से बचकर नहीं भागते।

साफ है कि यह मामला सिर्फ एक टेंडर रद्द होने का नहीं है, बल्कि यह सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा उदाहरण है। ‘Expose Now’ मांग करता है कि इस मामले में दोषी अधिकारियों पर केवल कागजी कार्रवाई न होकर, सख्त प्रशासनिक और दंडात्मक कार्रवाई की जाए ताकि राजस्थान की जनता की प्यास के साथ ऐसा क्रूर मजाक दोबारा न हो।

Expose Now ब्यूरो रिपोर्ट, जयपुर

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