भोपाल/जयपुर: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की सेंट्रल जोन बेंच, भोपाल ने राजस्थान सरकार द्वारा फरवरी 2025 में जारी ‘भूजल विनियमन दिशानिर्देशों’ को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य डॉ.अफरोज अहमद की पीठ ने ताहिर हुसैन बनाम राजस्थान राज्य मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के नियम केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (CGWA) के कड़े मानदंडों के खिलाफ नहीं हो सकते।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील राजस्थान सरकार द्वारा 5 फरवरी 2025 को जारी उस अधिसूचना के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें राज्य ने भूजल दोहन के लिए अपनी अलग गाइडलाइंस बनाई थीं। अपीलकर्ता का तर्क था कि ये दिशानिर्देश केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय और CGWA द्वारा 2020 में जारी अधिसूचनाओं का उल्लंघन करते हैं। विशेष रूप से, राज्य सरकार ने ‘सरकारी पेयजल आपूर्ति योजनाओं’ को NOC और शुल्क से छूट दे दी थी, जबकि केंद्रीय नियमों के अनुसार उन्हें भी भूजल निष्कर्षण शुल्क देना अनिवार्य है।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
ट्रिब्यूनल ने सुनवाई के दौरान पाया कि भारत में भूजल की स्थिति चिंताजनक है:
- राष्ट्रीय संकट: भारत जल गुणवत्ता सूचकांक में 122 देशों में 120वें स्थान पर है । देश के 54% भूजल कुओं का स्तर लगातार गिर रहा है।
- राज्यों की विफलता: राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में भूजल प्रबंधन के लिए प्रभावी विनियामक ढांचे की कमी है, जो खाद्य सुरक्षा के लिए भी खतरा है।
- कानूनी सर्वोच्चता: एनजीटी ने दोहराया कि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत CGWA का गठन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर किया गया है और इसका अधिदेश (Mandate) किसी भी राज्य कानून से ऊपर है।
राज्य सरकार का पक्ष और फैसला
CGWA ने ट्रिब्यूनल को बताया कि राजस्थान सरकार ने यह गाइडलाइंस जारी करने से पहले उनसे कोई परामर्श नहीं किया था। हालांकि, सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार की ओर से पेश हलफनामे में स्वीकार किया गया कि केंद्रीय हस्तक्षेप के बाद उन्होंने विवादित अधिसूचना को वापस ले लिया है।
इसे संज्ञान में लेते हुए, एनजीटी ने अपील को स्वीकार कर लिया और राज्य की अधिसूचना को इस आधार पर खारिज कर दिया कि यह केंद्रीय मानदंडों के अनुरूप नहीं थी।
नियमों का उल्लंघन पड़ेगा भारी
एनजीटी ने स्पष्ट किया कि अवैध भूजल दोहन एक आपराधिक अपराध है। अदालत ने निर्देश दिए कि:
- बिना वैध NOC के व्यावसायिक उपयोग के लिए पानी निकालना अवैध माना जाएगा।
- उल्लंघन करने वालों पर ‘Polluter Pays’ (प्रदूषक भुगतान) सिद्धांत के तहत भारी पर्यावरण मुआवजा (Environmental Compensation) लगाया जाएगा।
- पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर इकाइयों के लिए ‘अति-दोहन’ (Over-exploited) क्षेत्रों में मुआवजा दर $120~Rs./m^{3}$ तक हो सकती है, जिसकी न्यूनतम राशि 1 लाख रुपये होगी।
