ममता शर्मसार: राजस्थान में 4 साल में 4166 मासूमों को अपनों ने ही छोड़ा, जयपुर बना ‘लावारिस’ बच्चों का सबसे बड़ा गढ़

-कुल लावारिस बच्चों में से 55% केवल राजधानी जयपुर से
-583 बच्चों को मिला नया घर, 64 मासूम सात समंदर पार (विदेश) गए

राजस्थान, जो अपनी मेहमाननवाजी और ‘अपनो’ के प्यार के लिए दुनिया भर में मशहूर है, वहां से रिश्तों को शर्मसार करने वाली एक डरावनी तस्वीर सामने आई है। पिछले 4 वर्षों के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राज्य में ममता और संरक्षण के दावों के बीच 4 हजार से ज्यादा मासूमों को उनके अपनों ने ही सड़कों, झाड़ियों और पालना गृहों में लावारिस छोड़ दिया।

प्रमुख आंकड़े: एक नजर में
पिछले 4 सालों (2022-2025) के दौरान राजस्थान में बच्चों के लावारिस मिलने और गोद लेने की स्थिति कुछ इस प्रकार रही:

कुल लावारिस छोड़े गए बच्चे: 4,166

कुल गोद लिए गए बच्चे: 583

देश के भीतर गोद लिए गए: 519

विदेशों में गोद लिए गए: 64

जयपुर में सबसे खराब स्थिति: 55% बच्चे यहीं मिले
हैरानी की बात यह है कि कुल लावारिस बच्चों में से आधे से ज्यादा यानी 55% बच्चे अकेले राजधानी जयपुर में मिले हैं। जयपुर में 2,290 बच्चों को लावारिस हालत में पाया गया, जिन्हें बाद में शिशु गृहों में भेजा गया।

शहरवार लावारिस बच्चों का विवरण:

जिला लावारिस मिले बच्चों की संख्या
जयपुर 2,290
अजमेर 945
उदयपुर 227
कोटा 129
चूरू 118

गोद लेने के मामले में जोधपुर सबसे आगे:-

जहां एक तरफ बच्चे छोड़े जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ परिवार इन मासूमों को नया जीवन भी दे रहे हैं। गोद लेने के मामले में जोधपुर संभाग ने मिसाल पेश की है।

गोद लेने का जिलावार डेटा:

जोधपुर: 80 बच्चे (71 देश में, 09 विदेश में)

उदयपुर: 73 बच्चे (57 देश में, 16 विदेश में)

जयपुर: 57 बच्चे (45 देश में, 12 विदेश में)

बाड़मेर: 45 बच्चे (सभी देश में)

विधानसभा में उठा मुद्दा: उच्च स्तरीय मॉनिटरिंग की मांग
छबड़ा विधायक प्रताप सिंह सिंघवी ने इस गंभीर मुद्दे को विधानसभा में उठाया। उन्होंने कहा कि लावारिस बच्चों की यह संख्या न केवल चिंताजनक है, बल्कि समाज की गिरती नैतिकता का प्रमाण भी है।

Expose Now की मांग:-

-सरकार को हर जिले में लावारिस बच्चों के शिक्षण और पालन-पोषण की उच्च स्तरीय मॉनिटरिंग करनी चाहिए।

-ऐसे मामलों को रोकने के लिए सामाजिक जागरूकता और काउंसलिंग केंद्रों को मजबूत करने की जरूरत है।

-पालना गृह योजना का विस्तार हो ताकि बच्चों को झाड़ियों या असुरक्षित जगहों पर न फेंका जाए।

“इन 4166 बच्चों की सिसकियां सिस्टम और समाज दोनों से सवाल पूछ रही हैं। क्या हम अपने ही भविष्य को सुरक्षित रखने में नाकाम हो रहे हैं?”

Share This Article
Leave a Comment