EXPOSE NOW: राजस्थान जलदाय विभाग की बड़ी लापरवाही, 1500 करोड़ के फंड पर मंडराया संकट !

Rakhi Singh
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जयपुर। केंद्र सरकार की सख्ती और 20 मार्च 2026 की आखिरी डेडलाइन बीत जाने के बाद भी राजस्थान के जलदाय विभाग (PHED) के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है। जहाँ एक ओर जल जीवन मिशन (JJM) के तहत प्रदेश को करोड़ों के बजट की दरकार है, वहीं दूसरी ओर विभाग के आला अधिकारियों और इंजीनियर्स की ‘उदासीनता’ ने राज्य के हक के पैसे को अधर में लटका दिया है। जब केंद्र ने 12 मार्च को ही MoU का ड्राफ्ट साझा कर दिया था, तो फिर राजस्थान की ओर से डिमांड भेजने में देरी क्यों हुई? क्या विभाग के अधिकारी उन योजनाओं की लिस्ट देने से डर रहे हैं जिनमें पहले से ही भ्रष्टाचार की बू आ रही है? यह राजस्थान के जलदाय विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान है। ‘Expose Now’ की इस विशेष रिपोर्ट में पढ़िए कैसे अफसरों की सुस्ती जनता की प्यास और केंद्र के बजट के बीच दीवार बन गई है।

डेडलाइन खत्म, डिमाण्ड का पता नहीं-
भारत सरकार के पेयजल और स्वच्छता विभाग ने 14 मार्च को ही पत्र लिखकर स्पष्ट कर दिया था कि 2025-26 के फंड के लिए प्रस्ताव 20 मार्च तक हर हाल में जमा कराने होंगे। लेकिन सूत्रों के अनुसार, डेडलाइन निकलने के कई दिन बाद भी राजस्थान की ओर से अभी तक केंद्र को कोई आधिकारिक डिमाण्ड नहीं भेजी गई है।

क्या दांव पर लगा है?
-1500 करोड़ का बजट: राजस्थान को मेजर प्रोजेक्ट्स और ओटीएमपी (OTMP) योजनाओं के सुचारू संचालन के लिए करीब 1500 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि की डिमाण्ड भेजनी है।

-इंजीनियर्स की लापरवाही: विभाग के भीतर चल रही चर्चाओं के अनुसार, इंजीनियर्स और तकनीकी अमले की लापरवाही के कारण डेटा और प्रस्ताव समय पर तैयार नहीं किए जा सके।

-प्यास का सौदा: फंड मिलने में देरी का सीधा असर उन लाखों परिवारों पर पड़ेगा जो ‘हर घर जल’ योजना के तहत कनेक्शन का इंतजार कर रहे हैं।

JJM 2.0: भ्रष्टाचार की फाइलें खुलने के डर से कांपे अफसर !
केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन को दिसंबर 2028 तक के लिए विस्तार तो दे दिया है, लेकिन इस बार पैसा “रेवड़ी” की तरह नहीं बंटेगा। विभाग के अंडर सेक्रेटरी सुमित झा द्वारा जारी ताजा पत्र ने स्पष्ट कर दिया है कि अब एक-एक पैसे का हिसाब ‘डिजिटल’ और ‘तकनीकी’ कसौटी पर होगा।

भ्रष्टाचार पर ‘ट्रिपल लॉक’ प्रहार-
नए आदेशों के मुताबिक, 2025-26 के बजट का लाभ उन्हीं योजनाओं को मिलेगा जो इन तीन सख्त शर्तों को पूरा करेंगी:-

Sujalam Bharat GIS ट्रैकिंग:

अब कागजों पर पाइप बिछाकर पैसा नहीं निकाला जा सकेगा। हर एसेट की GIS-linked Asset Registry में मौजूदगी अनिवार्य है। यानी जो जमीन पर दिखेगा, उसी का पैसा मिलेगा।


-CPHEEO डिजाइन नॉर्म्स: तकनीकी अनुपालन के नाम पर घटिया सामग्री और गलत डिजाइन का खेल अब खत्म होगा। राज्य सरकार को लिखित में प्रमाण देना होगा कि काम तय मानकों के अनुसार हुआ है।


-वित्तीय समाधान (Financial Reconciliation): पुरानी योजनाओं के खर्च का पूरा हिसाब और ऑडिट रिपोर्ट अनिवार्य कर दी गई है।

Expose Now का तीखा सवाल:-
जब केंद्र सरकार फंड देने को तैयार है और मिशन की अवधि दिसंबर 2028 तक बढ़ा दी गई है, तो राजस्थान के इंजीनियर्स की यह ‘सुस्ती’ क्या किसी बड़े प्रशासनिक फेल्योर की ओर इशारा नहीं करती? आखिर इस लापरवाही की कीमत राजस्थान की जनता कब तक चुकाएगी?

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