जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के चुनाव लड़ने को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी अपनी इच्छा से नौकरी छोड़कर चुनाव लड़ता है और चुनाव हार जाता है, तो उसे दोबारा सरकारी सेवा में वापस नहीं लिया जा सकता। जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने नीरज बिश्नोई की याचिका को खारिज करते हुए सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT), जयपुर के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल चुनाव हार जाना और पेंशन व रिटायरमेंट बेनिफिट्स का नुकसान सामने आना, इस्तीफा वापस लेने के लिए कोई कानूनी रूप से बाध्यकारी कारण या परिस्थितियों में हुआ बड़ा बदलाव नहीं माना जा सकता।
2. क्या है पूरा मामला?
- इस्तीफा और चुनाव: नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे में सीनियर ऑडिटर के पद पर कार्यरत नीरज बिश्नोई ने राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 लड़ने के लिए 10 अक्टूबर 2023 को इस्तीफा दिया था। रेलवे विभाग ने 1 नवंबर 2023 से उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया था।
- BSP के टिकट पर लड़े चुनाव: याचिकाकर्ता ने चूरू जिले की रतनगढ़ विधानसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी (BSP) के टिकट पर चुनाव लड़ा था, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
- बहाली की मांग: चुनाव परिणाम आने के बाद 1 जनवरी 2024 को उन्होंने 90 दिन की समय सीमा के भीतर अपना इस्तीफा वापस लेने और सेवा में बहाली के लिए आवेदन किया, जिसे विभाग ने 29 जनवरी 2024 को खारिज कर दिया था।
3. कोर्ट में दोनों पक्षों के तर्क और अदालत की टिप्पणी
- याचिकाकर्ता का पक्ष: याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि उन्होंने नियमों के तहत 90 दिन के भीतर आवेदन किया था। उन्हें इस्तीफा देते समय यह जानकारी नहीं थी कि इससे उनके पेंशन और अन्य रिटायरमेंट फायदों पर असर पड़ेगा, इसलिए इसे परिस्थितियों में बदलाव माना जाए।
- विभाग का विरोध: सरकारी विभाग ने विरोध जताते हुए कहा कि कर्मचारी ने पूरी तरह सोच-समझकर और अपनी मर्जी से नौकरी छोड़ी थी। राजनीतिक मैदान में उतरने और हारने के बाद वह अपने फैसले से पीछे नहीं हट सकता।
- हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: अदालत ने कहा कि स्वैच्छिक रूप से राजनीति में उतरने का जोखिम उठाने के बाद केवल हार मिलने पर नौकरी में वापसी का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।