-600 गांवों में लगाई गई एटीएम मशीनों से लगाने के बाद आज दिनांक तक कोई ट्रांजेक्शन ही नहीं हुआ, और मेंटीनेंस पर हर महिने लाखों रूपए खर्च कर दिए
-बिना उपयोगिता और वास्तविक मांग के खरीदी गई 3500 से अधिक मशीनें सरकारी दफ्तरों में बनीं ‘कबाड़’
-हाई एंड सर्वर, बायोमेट्रिक स्कैनर और डिजिटल कियोस्क धूल फांक रहे, ‘डिजिटल क्रांति’ के नाम पर सरकारी खजाने को लगाई गई चपत
-इस्तेमाल ‘शून्य’, फिर भी एनुअल मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट (AMC) के नाम पर हर साल जारी हो रहा 45 करोड़ का भारी-भरकम बजट
जयपुर। सरकारी तंत्र में ‘डिजिटलाइजेशन’ और ‘पारदर्शिता’ के बड़े-बड़े दावों के पीछे सरकारी खजाने से आम जनता के टैक्स के पैसों की कैसी बंदरबांट होती है, इसका एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। ‘Expose Now’ को मिले विश्वसनीय प्रशासनिक दस्तावेजों और विभागीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, राज्य के प्रमुख विभागों में डिजिटलाइजेशन के नाम पर बिना किसी ठोस आवश्यकता के 350 करोड़ से अधिक की लागत से 3500 से ज्यादा उपकरण खरीद लिए गए। इस पूरी खरीद प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य प्रशासनिक दक्षता बढ़ाना नहीं, बल्कि टेंडर शर्तों को तोड़-मरोड़कर चुनिंदा चहेती कंपनियों को करोड़ों रुपये का सीधा मुनाफा पहुंचाना था। आलम यह है कि पिछले कुछ वर्षों में खरीदी गई करोड़ों रुपये की ये मशीनें आज अलग-अलग सरकारी दफ्तरों के स्टोर रूम में अनपैक्ड (डिब्बों में बंद) स्थिति में कबाड़ बन रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि जो उपकरण एक दिन भी चालू नहीं हुए, उनके रखरखाव (AMC) के नाम पर हर साल सरकारी तिजोरी से करोड़ों रुपये का बजट उन्हीं कंपनियों को ट्रांसफर किया जा रहा है।
खरीद का पूरा ब्योरा: कितनी मशीनें, कितनी राशि और कौन-कौन से उपकरण?
विश्वसनीय विभागीय रिकॉर्ड्स के अनुसार, डिजिटलाइजेशन के नाम पर खरीदी गई जिन मशीनों को बिना इस्तेमाल के कबाड़ में तब्दील कर दिया गया, उनके आंकड़ों और वित्तीय ब्योरे का पूरा लेखा-जोखा इस प्रकार है:
| उपकरण | अनुमानित संख्या | अनुमानित खरीद राशि | कथित वर्तमान स्थिति |
|---|
| हाई-एंड एंटरप्राइज सर्वर | 250 | 65 करोड़ | स्टोर में बंद/उपयोग नहीं |
| स्मार्ट टच-स्क्रीन डिजिटल कियोस्क | 1,200 | 50 करोड़ | बिजली/इंटरनेट कनेक्शन का अभाव |
| बायोमेट्रिक व फेस रिकग्निशन सिस्टम | 1,500 | 30 करोड़ | सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन नहीं |
| डॉक्यूमेंट स्कैनर व डिजिटल प्रिंटर | 400 | 60 करोड़ | ऑपरेटर/ट्रेनिंग का अभाव |
| नेटवर्किंग स्विच व डेटा सिक्योरिटी फायरवॉल | 300 | 145 करोड़ | उपयोग नहीं होने का दावा |
| कुल | 3,650+ | 350 करोड़ | बड़ी संख्या में उपकरण निष्क्रिय होने का दावा |
इस्तेमाल ‘शून्य’, लेकिन मेंटेनेंस के नाम पर हर साल 45 करोड़ की लूट:-
इस पूरे खेल का सबसे हैरान करने वाला वित्तीय पहलू इसका ‘एनुअल मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट’ (AMC) है। नियमों के मुताबिक, एएमसी का भुगतान मशीनों के सुचारू संचालन और सर्विस रिपोर्ट के आधार पर होना चाहिए। लेकिन विश्वसनीय वित्तीय दस्तावेजों के अनुसार, जो 3,000 से अधिक मशीनें एक दिन भी चालू नहीं हुईं, उनके रखरखाव (AMC) के नाम पर हर साल कुल खरीद राशि का लगभग 12% से 15% (यानी 45 करोड़ वार्षिक) का बजट जारी किया जा रहा है। पिछले 3 सालों में ही बंद पड़ी मशीनों के मेंटेनेंस के नाम पर चहेती कंपनियों के खातों में 135 करोड़ से अधिक का अवैध भुगतान किया जा चुका है।

फाइल-दर-फाइल खुलासे, 5 प्रमुख बिंदुओं में समझिए पूरे खेल का स्ट्रक्चर:-
विश्वसनीय विभागीय रिकॉर्ड्स और आंतरिक पत्राचार के विश्लेषण से यह साफ होता है कि यह एक योजनाबद्ध वित्तीय अनियमितता है:
- शून्य उपयोगिता और फर्जी मांग का खाका: दस्तावेजों की पड़ताल से पता चलता है कि जिन विभागों में ये सर्वर, कियोस्क और स्कैनर्स सप्लाई किए गए, वहां फील्ड अधिकारियों ने कभी इनकी मांग ही नहीं भेजी थी। बिना किसी सर्वे के सिर्फ 350 करोड़ का बजट खपाने के लिए खरीद को मंजूरी दी गई।
- चहेती कंपनियों के लिए ‘टेलर-मेड’ टेंडर प्रक्रिया: टेंडर दस्तावेजों के सूक्ष्म परीक्षण से स्पष्ट होता है कि शर्तों को इस प्रकार तैयार किया गया कि प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाए। बाजार दर से 150% से 200% अधिक कीमत पर सौदे तय किए गए।
- 80% से अधिक मशीनें पूरी तरह ठप: विभागीय आंतरिक निरीक्षण रिपोर्ट के आंकड़े गवाही देते हैं कि सप्लाई किए गए 3,650 उपकरणों में से 80 प्रतिशत से अधिक कभी चालू ही नहीं हुए और सीलबंद बक्सों में पड़े-पड़े खराब हो चुके हैं।
- मेंटेनेंस (AMC) का अनवरत डाका: बंद पड़े उपकरणों के लिए भी ‘वार्षिक रखरखाव अनुबंध’ (AMC) के तहत हर साल 45 करोड़ की राशि बिना किसी भौतिक सत्यापन या सर्विस रिपोर्ट के आंखें मूंदकर जारी की जा रही है।
- विभागीय लीपापोती और सिंडिकेट का संरक्षण: आंतरिक आपत्तियों के बावजूद, प्रशासनिक तंत्र ने दोषियों पर शिकंजा कसने के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। न तो आपूर्ति करने वाली कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किया गया और न ही अफसरों की जवाबदेही तय हुई।
साक्ष्यों से बेनकाब होता प्रशासनिक ढांचा:-
-आंतरिक पत्राचार साबित करता है कि स्थानीय इकाइयों ने इन मशीनों के उपयोग में असमर्थता जताई थी, फिर भी जबरन आपूर्ति की गई।
-बाजार दरों और स्वीकृत टेंडर दरों का तुलनात्मक अध्ययन दिखाता है कि 350 करोड़ की खरीद में सीधे तौर पर 120 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय भार डाला गया।
-स्टॉक रजिस्टर दर्शाते हैं कि कागजों में फर्जी इंस्टॉलेशन दिखाकर भुगतान जारी किया गया।
-भुगतान वाउचर सबूत हैं कि बिना सर्विस रिपोर्ट के 45 करोड़ सालाना जारी किए जा रहे हैं।
-जांच समितियों की टिप्पणियां दर्शाती हैं कि कैसे अफसरों ने एक-दूसरे को बचाते हुए फाइल दबा दी।
सवाल जो मांगते हैं जवाब:
-बिना मांग के 350 करोड़ के उपकरण खरीदने की स्वीकृति देने वाले उच्च अधिकारियों पर के खिलाफ कार्रवाई कब होगी?
-मेंटेनेंस के 45 करोड़ क्यों? जो मशीनें कबाड़ बन चुकी हैं, उनके मेंटेनेंस के नाम पर हर साल 45 करोड़ का भुगतान तुरंत किस आधार पर जारी किया जा रहा है?
-रिकवरी कब? कंपनियों को बांटे गए 350 करोड़ और मेंटेनेंस के 135 करोड़ की वसूली कर दोषी फर्मों को ब्लैकलिस्ट कब किया जाएगा?
‘डिजिटल क्रांति’ के आवरण में हुआ यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सार्वजनिक खजाने की सुव्यवस्थित लूट का एक आदर्श उदाहरण है। जब तक नीतिगत फैसलों की आड़ में किए जाने वाले ऐसे सौदों पर कड़ी कानूनी और आपराधिक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक विकास के नाम पर सरकारी खजाना इसी तरह खाली होता रहेगा।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now
