जयपुर। राजस्थान के 33 जिला मुख्यालयों की PHED (जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग) लैब्स को हाईटेक बनाने और पानी की शुद्धता जांचने के लिए ‘माइक्रोबायोलॉजिकल क्लीन रूम’ स्थापित करने का काम पिछले 14 महीनों से सरकारी फाइलों में हिचकोलें खा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि विभाग के आलाधिकारी जनता के पैसे की बचत करने के बजाय, उसे निजी हाथों में सौंपने (आउटसोर्सिंग) पर अड़े हुए हैं। पूरा मामला मुख्यमंत्री की बजट घोषणा और वित्तीय स्वीकृतियों के बावजूद अफसरों की “विशेष रुचि” के कारण अटक गया है।

14 महीने से फाइलों के चक्कर काट रही बजट घोषणा:-
इस पूरे प्रोजेक्ट की शुरुआत मार्च 2025 में वित्त विभाग की वित्तीय सहमति (1637.46 लाख रुपये) और अप्रैल 2025 में मिली प्रशासनिक मंजूरी के साथ हुई थी। काम की गंभीरता को देखते हुए मई 2025 में ही क्षेत्रवार (Region-wise) काम शुरू करने की तकनीकी स्वीकृति भी जारी हो चुकी थी। लेकिन मार्च 2025 से लेकर आज (मई 2026) तक, यानी पूरे 14 महीनों से यह काम सिर्फ बैठकों के एजेंडे और ‘डेफर’ (स्थगित) करने के खेल में उलझा हुआ है।
खुद की लैब सस्ती, फिर भी प्राइवेट कंपनियों पर मेहरबानी क्यों?:-

विभाग की खुद की रिपोर्ट में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे अफसरों की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं:
-निजी लैब का खर्च: यदि पानी की जांच (टोटल कोलीफॉर्म और ई. कोली बैक्टीरिया) बाहर की प्राइवेट NABL लैब्स से कराई जाती है, तो प्रति सैंपल न्यूनतम खर्च 500 रुपये आता है।
-PHED की खुद की लैब का खर्च: यदि विभाग खुद की 33 लैब्स को अपग्रेड करके जांच करता है, तो कैपिटल और रिकरिंग कॉस्ट मिलाकर अगले 7 वर्षों का औसत खर्च मात्र 431 रुपये प्रति सैंपल आता है।
-सीधा गणित: सरकारी लैब में जांच कराना प्रति सैंपल 69 रुपये सस्ता है। इसके बावजूद आलाधिकारी ‘मानवीय दखल’ (Manual Intervention) कम करने का बहाना बनाकर इस पूरे काम को प्राइवेट पार्टियों को आउटसोर्स करने पर जोर दे रहे हैं।
महंगी और अनुपयुक्त तकनीकों का दिया जा रहा है हवाला:-
अधिकारियों ने पानी की जांच में इंसानी दखल कम करने के लिए विदेशों में चलने वाली ‘IDEXX Tecta™’ और ‘सॉलिड-फेज साइटोमेट्री’ जैसी ऑटोमेटेड तकनीकों का अध्ययन करवाया। रिपोर्ट में साफ हो गया कि ये तकनीकें भारत में आसानी से उपलब्ध नहीं हैं और इनके उपकरण बेहद महंगे हैं। विभाग के विशेषज्ञों ने माना कि वर्तमान में ‘मेम्ब्रेन फिल्ट्रेशन तकनीक’ (MFT) ही सबसे व्यावहारिक, सस्ती और सुरक्षित है। लेकिन अफसरों को यह मंजूर नहीं है, वे इस काम को आगे बढ़ाने के बजाय बार-बार समीक्षा के नाम पर टाल रहे हैं।

तमाम तकनीकी और वित्तीय दलीलों को दरकिनार करते हुए, इस प्रस्ताव को एक बार फिर PHED फायनेंस कमेटी की बैठक में स्थगित (Defer) कर दिया गया है। अब निर्देश दिए गए हैं कि इस मामले को EPC के सामने ले जाया जाए और ‘कम्प्लीट आउटसोर्सिंग’ के विकल्पों पर दोबारा विचार किया जाए। साफ है कि जब तक अफसरों की आउटसोर्सिंग वाली फाइल पर सहमति नहीं बनेगी, तब तक राजस्थान की 33 लैब्स का हाईटेक होने का सपना अधूरा ही रहेगा और जनता को दूषित पानी के खतरे से जूझना पड़ेगा।
Expose Now, ब्यूरो रिपोर्ट, जयपुर