सिंधी संस्कृति एवं परंपरा पर राष्ट्रीय संगोष्ठी: “संस्कृत के सर्वाधिक निकट है सिंधी भाषा” — राज्यपाल हरिभाऊ बागडे

कोटा/जयपुर, कोटा विश्वविद्यालय के नागार्जुन सभागार में गुरुवार को सिंधी संस्कृति, अध्ययन एवं परम्परा विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। राष्ट्रीय सिंधी भाषा परिषद और सिंधु अध्ययन शोध पीठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में राजस्थान के राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे और विधानसभा अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी ने शिरकत की।

सिंधी और संस्कृत का गहरा संबंध

राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि आधुनिक भारतीय भाषाओं में सिंधी भाषा संस्कृत के सबसे निकट है, जिसके लगभग 70 प्रतिशत शब्द संस्कृत से मेल खाते हैं। राज्यपाल ने सिंधु घाटी सभ्यता को विश्व की सबसे परिष्कृत प्राचीन सभ्यता बताते हुए सिंधी समाज की व्यापारिक कुशलता और विभाजन के बाद उनके संघर्ष व पुनरुत्थान की सराहना की।

मैकाले की शिक्षा पद्धति पर प्रहार

अपने संबोधन में राज्यपाल ने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 1835 से पहले भारत एक नैतिक और समृद्ध राष्ट्र था। अंग्रेजों ने भारतीयों को मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए लॉर्ड मैकाले के जरिए अंग्रेजी शिक्षा पद्धति थोपी और स्वदेशी गुरुकुल व उद्योगों को नष्ट कर दिया।

सिंधी भाषा: पहचान का प्रमाण

विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने सिंधी और हिंदी दोनों भाषाओं में अपने विचार रखे। उन्होंने डॉ. अर्नेस्ट ट्रम्प के कथन का हवाला देते हुए कहा कि सिंधी, संस्कृत की शुद्धतम संतान है। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि:

  • प्रत्येक सिंधी परिवार घर में प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा सिंधी भाषा में बात करे।
  • आने वाली पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने के लिए भाषा और खान-पान को बढ़ावा दें।

महत्वपूर्ण घोषणाएं और तथ्य

  • शिक्षा: पाठ्यक्रम में सिंधी संतों और महान बलिदानी हेमू कालानी का पाठ जोड़ा जाएगा।
  • पर्यटन व श्रद्धा: अजमेर की फॉय सागर झील का नाम बदलकर ‘वरुण सागर’ रखा जाएगा, जहाँ वरुण देवता की 15 फीट ऊँची मूर्ति स्थापित होगी।
  • अर्थव्यवस्था: देश के कुल आयकर में सिंधी समाज का 24 प्रतिशत योगदान है।

देवनानी ने कहा कि 2047 तक ‘विकसित भारत’ के सपने को साकार करने में सिंधी समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। कार्यक्रम में सिंधी टोपी और अजपाक के कपड़े को सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक बताया गया।

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