उदयपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने उदयपुर में आयोजित ‘राष्ट्र चेतना संकल्प सभा’ में इतिहास और उससे जुड़े विभिन्न विमर्शों पर अपनी बात रखते हुए कहा कि हल्दीघाटी के युद्ध में विजय केवल महाराणा प्रताप की हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि इतिहासकारों ने इस युद्ध को लेकर एक विशेष नैरेटिव गढ़ा, जो उपलब्ध तथ्यों से मेल नहीं खाता।
महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती और हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर गांधी ग्राउंड में आयोजित तीन दिवसीय कार्यक्रम के मुख्य सत्र को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि मुगल इतिहासकारों के विवरणों में भी उल्लेख मिलता है कि युद्ध के दौरान मुगल सेना को पीछे हटना पड़ा था।
उन्होंने कहा, “जब मुगल सेना युद्धक्षेत्र छोड़कर पीछे हट गई और उन्हें केवल एक हाथी हाथ लगा, तो फिर विजय किसकी हुई? इतिहासकारों ने उपलब्ध तथ्यों के विपरीत जाकर इतिहास लिखा है।”

“महाराणा प्रताप नहीं, पूरा समाज लड़ा था”
सरसंघचालक ने कहा कि हल्दीघाटी का युद्ध केवल महाराणा प्रताप और उनकी सेना का संघर्ष नहीं था, बल्कि उस समय का पूरा समाज एकजुट होकर लड़ा था। उन्होंने कहा कि भले ही सैन्य शक्ति और संसाधनों के मामले में मुगल शासक अकबर का पक्ष मजबूत था, लेकिन महाराणा प्रताप के नेतृत्व में समाज ने कभी मानसिक गुलामी स्वीकार नहीं की।
भागवत ने कहा, “आज देशभर में महाराणा प्रताप की जयंती गर्व के साथ मनाई जाती है, लेकिन क्या कभी किसी ने अकबर की जयंती मनाते हुए सुना है?”

“भारत का इतिहास संघर्ष और स्वाभिमान का इतिहास”
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास गुलामी का नहीं, बल्कि विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ निरंतर संघर्ष का इतिहास है। उन्होंने कहा कि जब भी किसी आक्रांता ने भारत की भूमि पर कदम रखा, उसी समय से उसे खदेड़ने के प्रयास शुरू हो गए।
भागवत ने बप्पा रावल और ललितादित्य जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन वीरों ने विदेशी आक्रमणकारियों को भारत की सीमाओं के भीतर पैर जमाने से रोका।
समाज को एकजुट रहने का संदेश
कार्यक्रम में निम्बार्क पीठ के पीठाधीश्वर ने भी समाज को संबोधित किया। उन्होंने सामाजिक एकजुटता और राष्ट्रभक्ति पर जोर देते हुए कहा कि समाज को विभाजनकारी प्रवृत्तियों से दूर रहना चाहिए।
उन्होंने कहा, “हमें ऐसी दिशा में आगे बढ़ना है, जहां चुनौतियों और विषमताओं के बीच भी राष्ट्रभक्ति का कमल खिल सके। इसके लिए पूरे समाज को एक सूत्र में पिरोना आवश्यक है।”
गौरतलब है कि हल्दीघाटी का युद्ध वर्ष 1576 में महाराणा प्रताप और मुगल सेना के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध के परिणाम को लेकर इतिहासकारों के बीच लंबे समय से अलग-अलग मत रहे हैं। कुछ इतिहासकार इसे सामरिक रूप से अनिर्णायक मानते हैं, जबकि कई इतिहासकारों का मानना है कि युद्ध के बाद भी महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के बड़े हिस्से पर अपना प्रभाव बनाए रखा और संघर्ष जारी रखा।