JLF 2026: नफरत और गुस्से के दौर में ‘क्षमा’ ही सबसे बड़ी नैतिक शक्ति, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में बोले गोपालकृष्ण गांधी

जयपुर, पिंक सिटी के होटल क्लार्क्स आमेर में आयोजित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF 2026) के फ्रंट लॉन में विचारों की एक गंभीर धारा बही। वरिष्ठ राजनयिक, लेखक और पूर्व प्रशासक गोपालकृष्ण गांधी ने सत्र ‘दी अनडाइंग लाइट: इंडियाज फ्यूचर्स’ में भारत के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर बेबाक और संवेदनशील टिप्पणी की। सत्र का संचालन पत्रकार और लेखिका नारायणी बासु ने किया।

नफरत और बदले की राजनीति पर प्रहार

गोपालकृष्ण गांधी ने वर्तमान समय में बढ़ते गुस्से और टकराव पर चिंता जताते हुए कहा कि आज अखबारों में ‘स्लैम’ (Slam) जैसे शब्दों का बढ़ता चलन समाज की कड़वाहट को दर्शाता है। उन्होंने कहा:

“आज नफरत और बदले की भावना समाज को खोखला कर रही है। इतिहास का इस्तेमाल आज बदले और पीड़ित होने की नई कथाएं गढ़ने के लिए किया जा रहा है, जो भविष्य के लिए खतरनाक है।”

इतिहास, माफी और विनम्रता

उन्होंने अशोक, विली ब्रांट और ऑस्ट्रेलिया के ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए समझाया कि ‘माफी मांगना’ कमजोरी नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति का प्रमाण है। उन्होंने अफसोस जताया कि आज के दौर में ‘क्षमा’ सबसे दुर्लभ भावना बन गई है। उन्होंने जोर दिया कि नई पीढ़ी को ‘प्लीज’, ‘सॉरी’ और ‘थैंक यू’ जैसे शब्दों की शक्ति को फिर से समझना होगा।

विभाजन: केवल जमीन का नहीं, प्रकृति का भी बंटवारा

भारत-पाकिस्तान संबंधों और विभाजन पर बात करते हुए गांधी ने इसे सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी बताया। उन्होंने कहा कि 1947 का विभाजन केवल लोगों का नहीं था, बल्कि इसने नदियों, रेगिस्तानों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को बांट दिया। हालांकि, उन्होंने यह उम्मीद भी जताई कि दोनों देशों के बीच परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची साझा करना आज भी उम्मीद की एक मंद रोशनी बनाए हुए है।

प्रशासनिक अनुभव और टी.एन. शेषन का जिक्र

अपने प्रशासनिक जीवन को याद करते हुए उन्होंने कहा कि सिस्टम केवल नियमों से नहीं, बल्कि ‘गलत को गलत’ कहने के साहस से चलता है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि शेषन ने चुनाव आयोग को एक सशक्त संस्था बनाया, लेकिन यह भी सच है कि सत्ता और पद कभी-कभी व्यक्ति को कठोर बना देते हैं।

उम्मीद की किरण: खेल और मानवता

सत्र के समापन पर उन्होंने ओलंपिक विजेता नीरज चोपड़ा की मां और शतरंज खिलाड़ी गुकेश का उदाहरण देते हुए कहा कि खेल हमें मानवता और विनम्रता सिखाते हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि “भारत की रोशनी मंद जरूर हुई है, लेकिन बुझी नहीं है।”

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