सरहदी जिले जैसलमेर के नाचना क्षेत्र में जमीन घोटाले की परतें एक बार फिर खुलने लगी हैं। नाचना उपनिवेशन कार्यालय में करीब 5 साल पहले लगी आग की आड़ में फर्जी कागजात तैयार कर सरकारी जमीन को निजी कंपनियों को बेचने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। पांचे का तला में 9 किसानों ने मिलकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए और 1491 बीघा सरकारी जमीन को करीब 30 करोड़ रुपए में एक निजी कंपनी को बेच दिया।
₹2 लाख प्रति बीघा के हिसाब से हुई ‘बंदरबांट’
पड़ताल में सामने आया है कि इस जमीन को 2 लाख रुपए प्रति बीघा की रेट पर निजी कंपनी को बेचा गया। इस पूरे खेल में सिस्टम की मिलीभगत की भी आशंका जताई जा रही है क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड (जमाबंदी) में आज भी यह जमीन ‘आराजीगज’ यानी सरकारी दर्ज है। इसके बावजूद फर्जी गिरदावरी और खातेदारी सनद जारी कर इसे किसी व्यक्ति विशेष के नाम कर दिया गया।
रिकॉर्ड में लगी आग: हादसा या सोची-समझी साजिश?
इस घोटाले का सबसे बड़ा कारण अप्रैल 2021 में नाचना उपनिवेशन कार्यालय में लगी आग को माना जा रहा है। उस आगजनी में हजारों सरकारी रिकॉर्ड जलकर खाक हो गए थे। इसी का फायदा उठाकर जालसाजों ने फर्जी कागजात तैयार किए। फर्जीवाड़े का आलम यह है कि अधिकारियों के जाली हस्ताक्षर किए गए और रिकॉर्ड में ऐसी सफाई से हेरफेर किया गया कि बाहर से सब कुछ सामान्य दिखे।
इन 9 लोगों पर फर्जीवाड़े का आरोप
सरकारी जमीन को निजी कंपनी को बेचने के मामले में इन 9 किसानों के नाम सामने आए हैं:
- कसम खान, गुलशेर खान, अलीशेर, हनीफ, अलाबसाया, ताज मोहम्मद, फैज मोहम्मद, नबी खान और हसन खान।
इन लोगों ने कंपनी को 2001 की फर्जी खातेदारी सनद और जनवरी 2026 की फर्जी गिरदावरी पेश कर यह सौदा किया।
कैसे पकड़ा गया झूठ?
नाचना उपनिवेशन के तहसीलदार रतन भवानी के अनुसार, प्रथम दृष्टया यह मामला पूरी तरह फर्जी है। घोटाले की मुख्य कड़ियाँ यहाँ पकड़ी गईं:
- गिरदावरी संख्या का खेल: फर्जी कागजों में गिरदावरी संख्या 8648 लिखी गई है, जबकि पांचे का तला (पी-35) में आज तक कुल केवल 1100 किसानों की ही गिरदावरी हुई है। उस संख्या तक पहुँचने में 30-40 साल और लगेंगे।
- बुक नंबर गायब: सरकारी रिकॉर्ड में बुक नंबर 332 का जिक्र है, जबकि वास्तव में विभाग के पास ऐसी कोई बुक मौजूद ही नहीं है।
“प्रथम दृष्टया इस मामले में कागजात पूरी तरह से फर्जी लग रहे हैं। म्यूटेशन रजिस्टर में यह जमीन सरकारी दर्ज है। फर्जी तैयार किए गए कागजों में जो संख्याएं लिखी हैं, वह विभाग के वर्तमान डेटा से मेल नहीं खातीं।” — रतन भवानी, तहसीलदार, उपनिवेशन नाचना
