प्राचीन ज्ञान का डिजिटल कवच: जयपुर में शुरू हुआ सदियों पुराने आयुर्वेद और चिकित्सा ग्रंथों को सहेजने का महाअभियान

भारतीय ज्ञान परंपरा और सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने की दिशा में जयपुर में एक बड़ी पहल शुरू की गई है। संस्कृति मंत्रालय के एक विशेष अभियान के तहत आयोजित कार्यशाला में सैकड़ों वर्ष पुराने दुर्लभ ग्रंथों और पांडुलिपियों के वैज्ञानिक संरक्षण और डिजिटलीकरण का कार्य प्रारंभ किया गया है। इस दौरान विशेषज्ञों ने खुलासा किया है कि जयपुर में ऐसी दुर्लभ पांडुलिपियां मिली हैं, जो 16वीं और 17वीं शताब्दी के आयुर्वेद, चिकित्सा, वास्तु और विज्ञान से संबंधित हैं। इनमें से कई ग्रंथ अब तक अप्रकाशित हैं और इन्हें भारतीय चिकित्सा इतिहास के लिए एक बड़ी खोज माना जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, यह कार्य केवल कागजों का संरक्षण नहीं है, बल्कि भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक पहचान को भविष्य के लिए सुरक्षित करने का एक मिशन है।

इस कार्यशाला के दौरान ‘अमृत सागर’ और ‘सारंगधर संहिता की टीका’ जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और दुर्लभ आयुर्वेद ग्रंथ सामने आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये दस्तावेज इस बात का प्रमाण हैं कि सदियों पहले भारत में चिकित्सा विज्ञान अपनी उन्नत अवस्था में था। इन पांडुलिपियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें न केवल औषधियों का वर्णन है, बल्कि हृदय रोग के उपचार और जटिल सर्जिकल प्रक्रियाओं (सर्जरी) का भी विस्तृत उल्लेख मिला है। एक विशेष टीका में चिकित्सा विज्ञान की व्याख्या के साथ-साथ सर्जरी के चरणों को भी दर्शाया गया है। महाराजा सवाई प्रताप सिंह द्वारा रचित ‘अमृत सागर’ जैसे ग्रंथों के माध्यम से भारतीय चिकित्सा पद्धति की गहरी समझ और प्राचीन काल की जीवनशैली के महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आ रहे हैं।

वर्तमान में इन अमूल्य दस्तावेजों को आने वाले कई दशकों तक सुरक्षित रखने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है। संरक्षण की प्रक्रिया के तहत सबसे पहले पांडुलिपियों की डस्टिंग और क्लीनिंग की जाती है, जिसके बाद डैमेज हो चुके पन्नों की ‘टिशू रिपेयर’ और ‘लाइनिंग’ के जरिए मरम्मत की जाती है। इस चरण के बाद सभी ग्रंथों का डिजिटलीकरण किया जा रहा है ताकि उनका एक स्थाई डिजिटल रिकॉर्ड तैयार हो सके। इस अभियान के तहत न केवल ग्रंथों को सहेजा जा रहा है, बल्कि युवाओं को भी पांडुलिपियों की कैटलॉगिंग और वैज्ञानिक प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा की कड़ी कभी न टूटे।

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