आज 1 मई है, जिसे पूरी दुनिया ‘अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस’ के रूप में मना रही है। यह दिन उन हाथों को समर्पित है जो पसीने से अपनी और देश की तकदीर लिखते हैं। लेकिन उत्सव और नारों के बीच, राजस्थान की सड़कों पर एक ऐसा दृश्य नजर आया जो बताता है कि असली ‘मजदूर दिवस’ संघर्ष की उस आग में है, जिसे 70 साल के बुजुर्ग तीरथदास तुलसानी रोज झेलते हैं।
हौसले के आगे उम्र भी हारी
आसमान से बरसती आग, चेहरे पर वक्त की गहरी झुर्रियां और तपती सड़क पर पिघलती चप्पलों के बीच तीरथदास का हाथ ठेला खींचना, किसी के भी रोंगटे खड़े कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस से ठीक एक दिन पहले जयपुर के पड़ाव क्षेत्र में यह दृश्य दिखा। उम्र के इस पड़ाव पर जहां लोग आराम की तलाश करते हैं, वहां तीरथदास कबाड़ ढोकर अपनी जिंदगी की गाड़ी खींच रहे हैं।
दुखों का पहाड़, पर नहीं टूटी हिम्मत
अजमेर के माली मोहल्ला में किराए के मकान में रहने वाले तीरथदास का जीवन चुनौतियों की एक लंबी दास्तान है। अपनी 65 वर्षीय पत्नी सुनीता के साथ रहने वाले तीरथदास के परिवार पर दुखों का कहर कुछ इस तरह टूटा:
- एक बेटे की बीमारी की वजह से असामयिक मृत्यु हो गई।
- दूसरा बेटा परिवार से अलग रहता है।
- तीसरा बेटा कुछ साल पहले लकवाग्रस्त (Paralyzed) हो गया, जो अब दरगाह क्षेत्र में कपड़े के थैले बेचकर अपना गुजारा करता है।
₹50 का एक चक्कर और ₹300 की दिहाड़ी
महंगाई के इस दौर में तीरथदास की कमाई ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। वे ठेले पर कबाड़ का सामान एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाते हैं। उन्होंने बताया कि एक चक्कर के उन्हें मात्र 50 रुपए मिलते हैं। पूरे दिन की कड़ी मेहनत के बाद वे मुश्किल से 200 से 300 रुपए कमा पाते हैं। इसी राशि से घर का किराया, राशन और अपनी व बीमार बेटे की जरूरतों को पूरा करना होता है।
तीरथदास कहते हैं, “महंगाई बहुत है, इतना कमाना काफी नहीं होता। लेकिन जब तक शरीर में जान है, संघर्ष तो करना ही होगा। जीवन है तो संघर्ष भी जरूरी है।”
मजदूर दिवस का असली संदेश
हर साल 1 मई को हम मजदूरों के अधिकारों और समानता की बात करते हैं। 19वीं सदी के आंदोलन से शुरू हुआ यह सफर आज भी तीरथदास जैसे लाखों मजदूरों के लिए ‘पेट की भूख’ और ‘सिर की छत’ के संघर्ष तक सीमित है। तीरथदास के माथे से टपकता पसीना केवल श्रम का प्रतीक नहीं है, बल्कि उस अदम्य साहस की मिसाल है जो हर विपरीत परिस्थिति में भी हार नहीं मानता।
