ऐतिहासिक फैसला: 6 साल की कानूनी लड़ाई के बाद अकेले घर खरीदार ने 11 दिग्गज बिल्डरों को झुकाया

मुंबई, न्याय की लड़ाई में कभी-कभी एक अकेला व्यक्ति भी बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स पर भारी पड़ सकता है। मुंबई की एक फ्लैट खरीदार, स्तुति गलिया ने इसे सच कर दिखाया है। स्तुति ने 6 साल तक चली लंबी कानूनी जंग के बाद महाराष्ट्र रियल एस्टेट अपीलेट ट्रिब्यूनल (MahaREAT) में 11 दिग्गज बिल्डरों के खिलाफ ऐतिहासिक जीत हासिल की है।

क्या था पूरा मामला?

स्तुति गलिया ने मुंबई के विद्याविहार स्थित ‘नीलकंठ किंगडम’ (Neelkanth Kingdom) प्रोजेक्ट में फ्लैट बुक किया था। इस प्रोजेक्ट में 11 डेवलपर्स शामिल थे, जिनमें से कई बड़े कॉरपोरेट घराने थे।

  • मुख्य समस्या: प्रोजेक्ट वर्षों से अधूरा था। आज तक इमारतों को न तो कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC) मिला और न ही ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC)। इसके अलावा क्लब हाउस और स्विमिंग पूल जैसी बुनियादी सुविधाएं भी कागजों तक ही सीमित थीं।
  • बिल्डरों का तर्क: बिल्डरों का दावा था कि चूंकि प्रोजेक्ट रेरा (RERA) कानून लागू होने से पहले शुरू हुआ था और कुछ हिस्सों पर कब्जा दे दिया गया था, इसलिए वे रेरा के दायरे में नहीं आते।

ऐतिहासिक फैसला: 60 दिनों का अल्टीमेटम

अदालत में स्तुति का मुकाबला उन बड़ी लॉ फर्मों और वकीलों की टीम से था, जो इन 11 बिल्डरों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। हालांकि, स्तुति के अटूट साहस और कानूनी तथ्यों के आगे उनकी एक न चली।

MahaREAT के फैसले की मुख्य बातें:

  1. रेरा के तहत अनिवार्य पंजीकरण: ट्रिब्यूनल ने सभी 11 डेवलपर्स को निर्देश दिया है कि वे 60 दिनों के भीतर पूरे प्रोजेक्ट को रेरा के तहत पंजीकृत (Register) करें।
  2. जवाबदेही तय: अदालत ने स्पष्ट किया कि डेवलपर्स सिर्फ इसलिए जिम्मेदारी से नहीं बच सकते कि प्रोजेक्ट पुराना है। जब तक OC और CC नहीं मिल जाता, प्रोजेक्ट रेरा के दायरे में रहेगा।
  3. सुविधाओं की पूर्ति: बिल्डरों को अब क्लब हाउस और स्विमिंग पूल जैसी अधूरी सुविधाओं को पूरा करना होगा।

क्यों खास है यह जीत?

यह फैसला महाराष्ट्र भर के उन हजारों ‘प्री-रेरा’ प्रोजेक्ट्स के लिए एक मिसाल बनेगा जो सालों से अधूरे पड़े हैं। स्तुति गलिया ने साबित कर दिया कि यदि एक मध्यमवर्गीय परिवार साहस दिखाए, तो कानून की ताकत से बड़े से बड़े बिल्डर को जवाबदेह बनाया जा सकता है।

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