Expose Now एक्सक्लुसिव रिपोर्ट: भ्रष्टाचारियों के लिए ‘सुरक्षा कवच’ बने विभाग प्रमुख, ACB ने रंगे हाथों दबोचा, पर 357 मामलों में सालों से दबाए बैठे हैं अभियोजन स्वीकृति!

-मुख्यमंत्री के जीरो टॉलरेंस पर अफसरों का पलीता: सीएम दे रहे तत्काल मंजूरी के निर्देश, इधर विभागों के मुखिया 357 फाइलों पर कुंडली मारकर बैठे!

-कार्मिक विभाग के 4 माह के फरमान की उड़ी धज्जियां: ACB ने रंगे हाथों दबोचा, फिर भी सालों से दागी अफसरों को ‘सुरक्षा कवच’ दे रहे विभाग प्रमुख!

-एसडीएम से लेकर चीफ इंजीनियर तक को अभयदान: ‘परीक्षण’ के नाम पर फाइलों को दबाने का खेल, क्या सीधे तौर पर भ्रष्टाचारियों से मिलीभगत नहीं?

जयपुर। राजस्थान में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग को लेकर प्रशासनिक स्तर पर एक चौंकाने वाला विरोधाभास सामने आया है। एक तरफ प्रदेश के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा जीरो टॉलरेंस की नीति पर सख्ती से काम कर रहे हैं और उनके स्तर पर पहुंच रहे घूसखोरी व वित्तीय घपलों के प्रकरणों में बिना किसी देरी के तत्काल अभियोजन स्वीकृति (Prosecution Sanction) जारी करने के कड़े निर्देश दिए जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, विभिन्न सरकारी विभागों के आला हुक्मरान और विभागाध्यक्ष मुख्यमंत्री के इस भ्रष्टाचार-मुक्त संकल्प को पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। एसीबी द्वारा ट्रैप किए गए और रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़े गए भ्रष्ट अधिकारियों व कर्मचारियों की अभियोजन स्वीकृति की फाइलों पर संबंधित विभाग प्रमुख सालों से कुंडली मारकर बैठे हैं। कानून, नियम और प्रशासनिक आदेशों को ताक पर रखकर भ्रष्ट तंत्र को सुरक्षा कवच देने का यह खेल खुलकर सामने आ चुका है, जहां 357 मामलों में अभियोजन स्वीकृति के प्रस्ताव सालों से ठंडे बस्ते में पड़े हैं।

जहां एक्शन होना चाहिए, वहां फाइलों पर लगाई जा रही अड़ंगेबाजी:-

प्रदेश के मुखिया भजनलाल शर्मा ने सत्ता संभालते ही साफ संदेश दिया था कि घूसखोरों और जनता के हक पर डाका डालने वालों के लिए व्यवस्था में कोई जगह नहीं होगी। सीएम स्तर पर भेजे जाने वाले मामलों में तेजी से फैसले लिए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मंत्रालयों और निदेशालयों में बैठे विभाग प्रमुख इस मुहिम के बिल्कुल उलट चल रहे हैं। जो भ्रष्टाचारी एसीबी के जाल में सबूतों के साथ पकड़े गए, उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भेजने और कोर्ट में चार्जशीट पेश करने के बजाय विभाग प्रमुख उनकी फाइलों को ‘परीक्षण’ और ‘तकनीकी खामियों’ के नाम पर लटका रहे हैं। मुख्यमंत्री के संकल्प के विपरीत नौकरशाही का यह रवैया साफ दिखाता है कि दागी अफसरों को बचाने के लिए भीतरखाने कैसी सांठगांठ चल रही है।

कार्मिक विभाग का 4 माह का फरमान रद्दी की टोकरी में, सालों से दबाए बैठे हैं ट्रैप के पुख्ता केस:-

कार्मिक विभाग ने 13 अप्रैल 2012 को बाकायदा परिपत्र जारी कर सख्त हिदायत दी थी कि एसीबी से अभियोजन स्वीकृति का प्रस्ताव मिलने के बाद अधिकतम 4 माह के भीतर सक्षम प्राधिकारी को फैसला लेना अनिवार्य होगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और कानून के तहत भी 3+1 माह की स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित है। लेकिन फाइलों का सच यह है कि साल 2009, 2010, 2011 और 2012 के दशक पुराने घूसखोरी के मामलों तक में आज तक अभियोजन स्वीकृति जारी नहीं की गई। जिन अफसरों को 120 दिन में कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए था, उन्हें विभाग प्रमुखों ने सालों-साल की खुली छूट दे रखी है। यह न सिर्फ नियमों का खुला उल्लंघन है, बल्कि कानून के राज का सरेआम मजाक उड़ाना है।

‘परीक्षण’ के नाम पर समानांतर अदालत:-

जब भी इन फाइलों के अटकने की वजह पूछी जाती है, तो विभागों की ओर से घिसा-पिटा तर्क दिया जाता है कि एसीबी की जांच से असहमति है या मामला विभागीय स्तर पर परीक्षणाधीन है। सवाल उठता है कि जब एसीबी ने स्वतंत्र गवाहों, वॉयस रिकॉर्डिंग और रंगे हाथों केमिकल टेस्ट में घूस लेते हुए आरोपियों को दबोचा है, तो विभाग प्रमुख किस हैसियत से एसीबी की जांच को नकारने का खेल खेल रहे हैं? एसीबी के जांच अधिकारियों को बार-बार विचार-विमर्श के नाम पर तलब कर महीनों का वक्त बर्बाद किया जाता है। इस गैर-जरूरी देरी का सीधा फायदा भ्रष्ट अधिकारियों को मिलता है—वे या तो कोर्ट से स्टे ले आते हैं, या फिर प्रमोशन और रिटायरमेंट के तमाम लाभ लेकर मजे से निकल जाते हैं।

एसडीएम, तहसीलदार से लेकर चीफ इंजीनियर तक… रसूखदारों को बचाने के लिए पूरा सिस्टम लामबंद:-

लंबित 357 प्रकरणों की सूची बताती है कि यह मेहरबानी सिर्फ छोटे बाबुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राजस्व, नगरीय विकास (UDH), पंचायती राज, ऊर्जा, लोक निर्माण (PWD) और चिकित्सा विभाग के बड़े-बड़े ‘मगरमच्छ’ शामिल हैं। एसडीएम, तहसीलदार, यूडीएच कमिश्नर, चीफ इंजीनियर और डॉक्टर जैसे राजपत्रित अफसरों के खिलाफ एसीबी की जांच पूरी हो चुकी है, लेकिन विभाग प्रमुख उनकी चार्जशीट पर दस्तखत करने से बच रहे हैं। सवाल यह है कि जब प्रदेश के मुख्यमंत्री सीधे तौर पर भ्रष्टाचार पर प्रहार कर रहे हैं, तो इन विभागों के प्रमुख किसके इशारे पर और किसके दबाव में इन भ्रष्ट चेहरों के लिए ढाल बनकर खड़े हैं?

जब रक्षक ही भक्षक के पैरोकार बन जाएं:-

यह केवल 357 फाइलों के अटकने का तकनीकी मामला नहीं है, बल्कि यह उन ईमानदार नागरिकों और एजेंसियों के हौसलों पर प्रहार है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते हैं। एसीबी जब अपनी जान जोखिम में डालकर घूसखोरों को रंगे हाथों पकड़ती है, महीनों साक्ष्य जुटाती है और चालान पेश करने की तैयारी करती है—तब किसी विभाग प्रमुख की टेबल पर वह फाइल वर्षों तक धूल फांकती रह जाए, तो इसे सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि अपराध में मूक सहमति माना जाना चाहिए। 13 अप्रैल 2012 के परिपत्र की धज्जियां उड़ाकर 4 महीने की समय-सीमा को 10-15 साल में तब्दील कर देना सीधे तौर पर कानून के राज को खुली चुनौती है।

अब गेंद सरकार और शीर्ष नेतृत्व के पाले में:-

यह पूरा घटनाक्रम साफ करता है कि जब तक दागी अधिकारियों को ढाल मुहैया कराने वाले विभाग प्रमुखों पर सख्त कानूनी गाज नहीं गिरेगी, तब तक ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति धरातल पर पूरी तरह प्रभावी नहीं हो सकती।

-क्या मुख्यमंत्री सचिवालय उन विभागाध्यक्षों की सूची तलब करेगा जिन्होंने 120 दिन की तय मियाद पार करने के बाद भी फाइलों पर निर्णय नहीं लिया?

-क्या समय पर अभियोजन स्वीकृति न देकर आरोपियों को कोर्ट से स्टे या रिटायरमेंट का सेफ-पैसेज दिलाने वाले अफसरों पर आपराधिक षड्यंत्र की धाराएं लागू होंगी?

जब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा जीरो टॉलरेंस पर अडिग हैं, तो विभाग प्रमुखों की इस मनमानी पर अब तक गाज क्यों नहीं गिरी?13 अप्रैल 2012 के आदेशों की धज्जियां उड़ाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही कब तय होगी? क्या भ्रष्टाचारियों को 4 महीने की जगह 10-12 साल तक अभयदान देने वाले विभागाध्यक्षों के खिलाफ जांच नहीं बैठाई जानी चाहिए?

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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