सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामला: बॉम्बे हाई कोर्ट ने बरकरार रखा निचली अदालत का फैसला, सभी 22 आरोपी बरी

मुंबई: बॉम्बे हाई कोर्ट ने बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति के कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में गुरुवार को अपना अहम फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखाड की खंडपीठ ने मामले के सभी 22 आरोपियों को बरी करने के विशेष अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली अपीलों को खारिज कर दिया है।

अपील और सुनवाई का आधार

यह अपीलें सोहराबुद्दीन के भाइयों, रुबाबुद्दीन और नयाबुद्दीन द्वारा दायर की गई थीं। उन्होंने ट्रायल कोर्ट (स्पेशल कोर्ट) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें गुजरात और राजस्थान पुलिस के 22 कर्मियों को ठोस सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था। सुनवाई के दौरान केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने स्पष्ट किया कि उसने विशेष अदालत के फैसले को स्वीकार कर लिया है और वह बरी किए जाने के खिलाफ अपील नहीं कर रही है।

केस की पृष्ठभूमि और गवाहों का मुकरना

यह मामला नवंबर 2005 का है, जब आरोप लगा था कि गुजरात और राजस्थान पुलिस ने सोहराबुद्दीन शेख और उनकी पत्नी का अपहरण कर फर्जी मुठभेड़ में उनकी हत्या कर दी। इसके एक साल बाद मुख्य गवाह तुलसीराम प्रजापति की भी हत्या कर दी गई थी। ट्रायल के दौरान कुल 210 गवाहों में से 92 गवाह अपने बयानों से मुकर गए (Hostile), जिससे अभियोजन का पक्ष कमजोर हो गया।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा

मामले की जांच के दौरान CBI ने वर्तमान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को आरोपी बनाया था। हालांकि, दिसंबर 2014 में अमित शाह को मामले से रिहा कर दिया गया था। कुल 38 आरोपियों में से 16 को पहले ही विभिन्न चरणों में डिस्चार्ज कर दिया गया था, जबकि ट्रायल का सामना करने वाले शेष 22 पुलिस कर्मियों को अब हाई कोर्ट से भी राहत मिल गई है।

न्याय प्रक्रिया पर अविश्वास

सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि तुलसीराम प्रजापति की मां और सोहराबुद्दीन के भाइयों ने बयान देने से इनकार कर दिया था। उनका तर्क था कि चूंकि मुख्य आरोपियों को पहले ही राहत मिल चुकी है, इसलिए उन्हें अब न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा नहीं रहा।

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