Expose Now स्पेशल रिपोर्ट: 36 कौम के साथ बड़ा धोखा, प्रदेश में 36 बोर्ड बनाए, लेकिन 34 में आज तक नियुक्ति ही नहीं!

-राजस्थान की ’36 कौम’ को साधने के लिए बिछाई गई थी 36 बोर्डों की सियासी बिसात, क्या सिर्फ वोट बैंक थी 36 कौम?

-चुनाव खत्म होते ही ‘कौम’ और ‘बोर्ड’ दोनों को भूली सरकार, खुशियां मनाने वाले 34 समाजों के हाथ खाली

जयपुर। राजस्थान की माटी और यहाँ की राजनीति में हमेशा से ’36 कौम’ (सभी 36 बिरादरियों) को साथ लेकर चलने का दावा किया जाता रहा है। हर नेता, हर राजनीतिक दल अपने भाषणों में ’36 कौम’ के विकास की कसमें खाता है। लेकिन ‘Expose Now’ की इस स्पेशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में आज हम 36 कौम के साथ हुए उस सबसे बड़े राजनीतिक छल का पर्दाफाश करने जा रहे हैं, जिसने प्रदेश के सामाजिक ताने-बाने को सिर्फ एक ‘वोट बैंक’ की तरह इस्तेमाल किया। राजनीति में जनता को लुभाने, जातियों को साधने और वोट बैंक को पक्का करने के लिए किस तरह के सियासी प्रपंच रचे जाते हैं, इसका एक बेहद शर्मनाक और जीता-जागता उदाहरण प्रदेश में देखने को मिला है। राजनीतिक दलों के लिए आम जनता और विभिन्न समाज केवल एक ‘वोट की पर्ची’ से ज्यादा कुछ नहीं हैं। प्रदेश में पिछले कुछ सालों में एक ऐसा सियासी छलावा किया गया, जिसमें हर समाज, हर जाति और हर वर्ग को खुश करने के लिए थोक के भाव में बोर्ड और आयोगों का गठन कर दिया गया। कागजों की बाजीगरी दिखाते हुए एक के बाद एक 36 नए कल्याण बोर्ड और आयोग बना दिए गए।

जब इन आयोगों और बोर्डों के गठन की घोषणाएं हुईं, तो संबंधित समाजों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। समाज के भोले-भाले लोगों को लगा कि दशकों बाद ही सही, लेकिन अब उनके दिन फिरने वाले हैं। उन्हें लगा कि अब उनका सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक उत्थान होगा। तत्कालीन मुख्यमंत्री का बड़ी संख्या में लोगों ने राजधानी पहुंचकर ढोल-नगाड़ों, डीजे और फूल-मालाओं के साथ भव्य स्वागत किया था। समाज के नेताओं ने मिठाइयां बांटीं और ऐसा माहौल बनाया गया मानो रातों-रात इन समाजों की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल जाएंगी।

लेकिन ‘Expose Now’ की इस स्पेशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में आज हम जो सच आपके सामने रखने जा रहे हैं, वह न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि प्रदेश की भोली-भाली जनता के साथ हुए एक बहुत बड़े राजनीतिक धोखे की पोल खोलता है। कड़वा सच यह है कि 36 बोर्ड और आयोग बना तो दिए गए, लेकिन इनमें से नियुक्ति सिर्फ 2 में ही हुई! बाकी 34 बोर्ड और आयोग आज भी पूरी तरह से खाली पड़े हैं। 2 से 3 साल बीत जाने के बाद भी इन 34 बोर्ड/आयोगों में आज तक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या सदस्यों की नियुक्ति ही नहीं की गई है।

36 कौम के नाम पर सिर्फ सियासी छलावा:-

राजस्थान का सामाजिक ढांचा बहुत मजबूत है। यहाँ गाड़िया लौहार, तेली, रजक, माली, कुमावत, ब्राह्मण, राजपूत, वाल्मीकि, मेघवाल से लेकर कीर और बावरी तक, हर कौम की अपनी एक पहचान और जरूरत है। जब चुनाव नजदीक आए, तो तत्कालीन सरकार ने इन सभी कौमों को साधने का एक नायाब लेकिन खोखला तरीका निकाला।

हर कौम के बड़े नेताओं को बुलाया गया और उनके समाज (कौम) के नाम पर एक कल्याण बोर्ड बनाने की घोषणा कर दी गई। ब्राह्मणों के लिए विप्र कल्याण बोर्ड, माली-सैनी कौम के लिए महात्मा ज्योतिबा फुले बोर्ड, रावणा राजपूतों के लिए मेजर दलपत सिंह बोर्ड, कुमावत कौम के लिए स्थापत्य कला बोर्ड, और इसी तरह वीर तेजाजी, देवनारायण, गुरु गोरखनाथ, लव-कुश, और अहिल्याबाई होल्कर जैसे महापुरुषों और लोक देवताओं के नाम पर पूरे 36 बोर्ड और आयोगों की अधिसूचनाएं जारी कर दी गईं।

बिना मुखिया के कैसे होगा कल्याण:-

किसी भी समाज के कल्याण के लिए जब कोई बोर्ड या आयोग बनाया जाता है, तो उसका मुख्य उद्देश्य उस विशेष वर्ग की समस्याओं का अध्ययन करना, उनके लिए योजनाएं बनाना, रोजगार के अवसर पैदा करना और उन्हें सरकार से वित्तीय सहायता दिलवाना होता है। लेकिन क्या कोई भी संस्था बिना मुखिया, बिना सदस्य और बिना बजट के चल सकती है? इसका सीधा सा जवाब है- बिल्कुल नहीं।

जब हम इन बोर्डों और आयोगों के गठन की तारीखों पर गौर करते हैं, तो पूरी कहानी खुद-ब-खुद आईने की तरह साफ हो जाती है। इनमें से अधिकांश बोर्डों के गठन के आदेश चुनाव से ठीक पहले यानी साल 2022 के अंत और 2023 के मध्य में धड़ाधड़ जारी किए गए थे। लोकतंत्र में नीतियां जनता के भले के लिए बनाई जानी चाहिए, लेकिन यहां नीतियों की जगह सिर्फ “लॉलीपॉप” बांटे गए। हर जाति के नाम पर एक बोर्ड बना दिया गया ताकि उस जाति का वोट बैंक पक्का किया जा सके।

जब तत्कालीन सरकार को पता था कि चुनाव सिर पर हैं और आचार संहिता लगने वाली है, तब रातों-रात आदेश निकाले गए। क्या सरकार की मंशा वास्तव में इन समाजों का विकास करने की थी? अगर मंशा वाकई साफ होती, तो क्या गठन के साथ ही उनमें नियुक्तियां नहीं की जातीं? उनके लिए दफ्तर नहीं खोले जाते? बजट का आवंटन नहीं किया जाता? यह पूरी तरह से वोट बैंक की राजनीति का एक वीभत्स चेहरा है। समाजों के नेताओं को खुश करने और चुनाव में उनका थोकबंद समर्थन हासिल करने के लिए यह एक सोची-समझी और मक्कारी भरी राजनीतिक चाल थी। तत्कालीन सरकार ने यह तो दिखा दिया कि हम आपके समाज के कितने बड़े हितैषी हैं, लेकिन हकीकत में उन्हें एक खाली डिब्बा थमा दिया गया, जिसमें हवा के सिवा कुछ नहीं था।

ठंडे बस्ते में धूल फांक रही हैं फाइलें:-

राजनीति का सबसे क्रूर सच यह है कि इसमें पीसती हमेशा आम जनता ही है। चुनाव खत्म हुए, बड़े-बड़े वादे हवा हो गए, प्रदेश में सत्ता का परिवर्तन हो गया, लेकिन इन 34 बोर्डों और आयोगों की बदकिस्मती नहीं बदली। नई सरकार के आते ही पुरानी सरकार द्वारा बनाए गए ये तमाम बोर्ड और आयोग पूरी तरह से ठंडे बस्ते में डाल दिए गए हैं। सत्ता के गलियारों में अब इन बोर्डों की कोई फाइल नहीं घूमती, कोई इनकी चर्चा नहीं करता।

जिन समाजों ने कभी ढोल-नगाड़े बजाकर इन घोषणाओं का स्वागत किया था, आज वे खून के आंसू रो रहे हैं और खुद को बुरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। प्रशासन का रटा-रटाया जवाब होता है कि ‘शेष आयोगों और बोर्डों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं सदस्यों का मनोनयन होने के पश्चात आवश्यकता अनुसार बजट का प्रावधान करवाया जाएगा।’ लेकिन यह “मनोनयन” आखिर होगा कब? दो से तीन साल का लंबा समय बीत चुका है।

क्या नई सरकार भी अब अगले चुनावों का इंतजार कर रही है? क्या अगले चुनाव से ठीक पहले फिर से इन खाली पड़े पदों पर राजनीतिक रेवड़ियां बांटी जाएंगी? यह एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें प्रदेश का हर वह समाज फंस गया है जिसने इन बोर्डों के नाम पर अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य का सपना देखा था। युवाओं को उम्मीद थी कि बोर्ड के माध्यम से उन्हें स्वरोजगार के लिए ऋण मिलेगा, उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति मिलेगी और उनके पारंपरिक व्यवसायों को आधुनिक बनाने के लिए सरकारी सहायता मिलेगी। लेकिन बिना बजट और बिना अधिकारियों के ये बोर्ड सिर्फ कागजी शेर साबित हुए हैं।

हवा-हवाई साबित हुए 36 बोर्ड और आयोग:-

जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाले इस सरकारी तंत्र ने सिर्फ घोषणाओं की राजनीति को बढ़ावा दिया है। अगर सरकार को वास्तव में इन समाजों की फिक्र होती, तो वह 36 की जगह सिर्फ 5 या 10 प्रभावी बोर्ड बनाती, लेकिन उन्हें पूरी ताकत के साथ काम करने देती। सिर्फ संख्या बल दिखाने और अखबारों में सुर्खियां बटोरने के लिए नीचे दिए गए 36 बोर्ड बना देना एक भद्दा मजाक है।

यहाँ उन सभी 36 बोर्डों और आयोगों की सूची है, जिन्हें सिर्फ कागजों पर जिन्दा रखा गया है। ध्यान दें कि इनमें से सिर्फ देवनारायण बोर्ड और अनुसूचित जाति वित्त विकास आयोग में ही नियुक्ति हुई है, बाकी सब अनाथ हैं:

क्र.सं.खाली पड़े 34 बोर्ड/आयोग (बिना नियुक्ति)
1राजस्थान राज्य आर्थिक पिछडा वर्ग बोर्ड
2राजस्थान राज्य विप्र कल्याण बोर्ड
3राजस्थान राज्य महात्मा ज्योतिबा फुले बोर्ड
4राजस्थान राज्य रजक कल्याण बोर्ड
5राजस्थान राज्य गाड़िया लौहार कल्याण बोर्ड
6राजस्थान राज्य वीर तेजाजी किसान कल्याण बोर्ड
7राजस्थान राज्य स्वर्ण रजत कला विकास बोर्ड
8राजस्थान राज्य मेजर दलपत सिंह (हाइफा स्मृति) कल्याण बोर्ड
9राजस्थान राज्य तेली घाणी विकास बोर्ड
10राजथान राज्य अवन्ति बाई लोधी बोर्ड
11राजस्थान राज्य श्री कृष्ण बोर्ड
12राजस्थान राज्य लव-कुश बोर्ड
13राजस्थान राज्य अहिल्याबाई होल्कर बोर्ड
14राजस्थान राज्य स्थापत्य कला बोर्ड
15राजस्थान राज्य गुरु गोरखनाथ बोर्ड
16राजस्थान राज्य बालिनाथ बोर्ड
17राजस्थान राज्य सरदार पटेल कल्याण बोर्ड
18राजस्थान राज्य मिरासी समुदाय कल्याण बोर्ड
19राजस्थान राज्य श्रमण संस्कृति बोर्ड
20राजस्थान राज्य धरणीधर कल्याण बोर्ड
21राजस्थान राज्य संत दुर्बलनाथ बोर्ड
22राजस्थान राज्य अग्रसेन कल्याण बोर्ड
23राजस्थान राज्य राजा बली कल्याण बोर्ड
24राजस्थान राज्य पुजारी कल्याण बोर्ड
25राजस्थान राज्य वाल्मिकी कल्याण बोर्ड
26राजस्थान राज्य धाणका कल्याण बोर्ड
27राजस्थान राज्य चित्रगुप्त कायस्थ कल्याण बोर्ड
28राजस्थान राज्य जाटव कल्याण बोर्ड
29राजस्थान राज्य मेघवाल कल्याण बोर्ड
30राजस्थान राज्य केवट कल्याण (मां पूरी बाई कीर) बोर्ड
31राजस्थान राज्य आई माता कल्याण बोर्ड
32राजस्थान राज्य स्वामी श्री दयालनाथ बावरी कल्याण बोर्ड
33राजस्थान राज्य अन्य पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास आयोग
34राजस्थान राज्य समाज कल्याण बोर्ड

35. राजस्थान राज्य अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास आयोग (नियुक्ति हुई)

36. देवनारायण बोर्ड (नियुक्ति हुई)

आखिर कब तक समाज के नेता बोर्ड/आयोग का झुनझुना लेकर घूमेंगे:-

‘Expose Now’ की इस जमीनी पड़ताल से यह बिल्कुल साफ है कि प्रदेश में कल्याणकारी राजनीति के नाम पर सिर्फ और सिर्फ जातियों को बांटने, उन्हें उलझाए रखने और वोट बटोरने का गंदा खेल खेला गया है। नाम के बोर्ड-आयोग बनाकर समाजों को ऐसा झुनझुना पकड़ा दिया गया है, जिसकी न कोई आवाज है और न ही कोई वजूद। अब वक्त आ गया है कि जनता और ये सभी ठगे गए समाज अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएं और सरकार से सीधा सवाल पूछें। क्या राजनीतिक दल सिर्फ चुनाव के वक्त ही उन्हें एक वोट बैंक के रूप में देखते हैं? जब तक जनता जागरूक होकर इन खोखली घोषणाओं और राजनीतिक मक्कारी के खिलाफ खड़ी नहीं होगी, तब तक राजनीतिक दल इसी तरह बोर्ड और आयोगों का फर्जी चारा डालकर उनके वोट का शिकार करते रहेंगे। एक्सपोज नाउ आगे भी सत्ता के गलियारों में चल रहे ऐसे ही छलावों की पोल खोलता रहेगा।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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