-राजएसएसपी (RajSSP) पोर्टल के ‘बिना मानवीय हस्तक्षेप’ वाले दावों की उड़ी धज्जियां, विभागीय लापरवाही से सरकारी खजाने में लगी करोड़ों की सेंध
-वसूली के नाम पर महज 6.96 करोड़ का दिखावा, बाकी 51 करोड़ गायब, जयपुर में हुआ सबसे बड़ा 4.21 करोड़ का फर्जीवाड़ा
-असली दोषी कौन? क्या ग्रामीण और अनजान पेंशनर गुनहगार हैं या वातानुकूलित कमरों में बैठकर खोखली नीतियां बनाने वाले अफसर?
जयपुर। राजस्थान में सामाजिक सुरक्षा के नाम पर एक ऐसा महाघोटाला पनप रहा है, जिसने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था और सरकारी मॉनिटरिंग की पोल खोल कर रख दी है। प्रदेश में एक-दो नहीं, बल्कि पूरे 91,272 मामले ऐसे सामने आए हैं, जहां मृतकों और पुनर्विवाहित महिलाओं के नाम पर पेंशन का पैसा उठाया जाता रहा। सरकारी खजाने से कुल 58.63 करोड़ रुपये की फर्जी पेंशन का भुगतान कर दिया गया, लेकिन जब बात इस सरकारी पैसे की वसूली की आई, तो सिस्टम ने केवल 6.96 करोड़ रुपये वसूल कर अपने कागजों की खानापूर्ति कर ली। यह आंकड़े केवल एक विभागीय लापरवाही का पुलिंदा नहीं हैं, बल्कि यह सवाल खड़े करते हैं कि आखिर इस अंधेरगर्दी के लिए असली दोषी कौन है— वह अनजान पेंशनर या वातानुकूलित कमरों में बैठकर ‘बिना मानवीय हस्तक्षेप’ के नीतियां बनाने वाला सिस्टम?
मुर्दों और पुनर्विवाहित महिलाओं के नाम पर सरकारी खजाने में सेंध:-
राजस्थान विधानसभा के पंचम सत्र में उठी इस गूंज ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। सरकार की ओर से पेश किए गए आधिकारिक जवाब के अनुसार, प्रदेश में सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना का संचालन जनआधार मेटा-डेटा पर आधारित है। दावा किया गया था कि यह प्रणाली ‘बिना मानवीय हस्तक्षेप के’ ऑन-लाईन राजएसएसपी (RajSSP) पोर्टल के माध्यम से काम करती है। लेकिन इसी अति-आधुनिक तकनीकी तंत्र ने भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का सबसे बड़ा रास्ता खोल दिया।
लाभार्थियों की मृत्यु होने के बाद मृत्यु प्रमाण पत्र जारी न होने या पुर्नविवाह के समय पोर्टल पर सूचना अपडेट न होने के कारण यह फर्जीवाड़ा पनपा। महीनों और सालों तक मृतकों के बैंक खातों में पेंशन गिरती रही और सरकार सोती रही। विडंबना यह है कि जब इस अनियमित भुगतान की पोल खुली, तो संबंधित अधिकारियों ने मात्र चालान काटकर राजकोष में कुछ राशि जमा करवा दी और अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली।
दोषी कौन? अनजान पेंशनर या वातानुकूलित कमरों में बैठा सिस्टम:-
इस पूरे फर्जीवाड़े का एक सबसे बड़ा मानवीय पहलू है, जिसे सरकारी फाइलों में अक्सर दबा दिया जाता है। आखिर इस 58 करोड़ के फर्जीवाड़े का असली गुनहगार कौन है? क्या वह ग्रामीण, अनपढ़ या गरीब परिवार दोषी है जिसने अपने परिजन को खोने के दुख में मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने या उसे पोर्टल पर अपलोड करने में देरी कर दी? या फिर वह विधवा महिला दोषी है जिसने पुनर्विवाह किया लेकिन उसे तकनीकी पोर्टल के नियम-कायदों की कोई जानकारी नहीं थी?
असली दोषी वह सिस्टम है जिसने कागजी घोड़ों पर सवार होकर बिना जमीनी हकीकत जाने योजनाएं थोप दीं। जब विभाग को पता है कि ग्रामीण परिवेश में मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने और जनआधार में डेटा अद्यतन करवाने की प्रक्रिया कितनी जटिल है, तो फिर भौतिक सत्यापन (Physical Verification) को दरकिनार क्यों किया गया? ग्राम और वार्ड सभाओं, और ग्रामीण/शहरी क्षेत्र में फील्ड कार्मिकों की रिपोर्टिंग प्रणाली इतनी सुस्त क्यों रही कि 91 हजार से ज्यादा अपात्र लोग पेंशन उठाते रहे? सरकार अब कह रही है कि पहचान पोर्टल का पेंशन पोर्टल से संयोजन किया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि यह ‘तकनीकी तंत्र’ 58 करोड़ रुपये लुटने के बाद ही क्यों याद आया?
जिलेवार आंकड़े, कैसे हुई सरकारी पैसों की ‘बंदरबांट’:-
इस महाघोटाले की जड़ें राजस्थान के हर जिले तक फैली हैं। विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों (परिशिष्ठ-अ और ब) का विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि प्रदेश का कोई भी कोना इस फर्जीवाड़े से अछूता नहीं है। सबसे चौंकाने वाले आंकड़े राजधानी जयपुर से ही हैं, जहां प्रशासन की नाक के नीचे सबसे बड़ा खेल हुआ। आइए नजर डालते हैं जिलेवार आंकड़ों पर कि कहां कितने फर्जी पेंशनर मिले और कितनी वसूली हुई:
| -जयपुर: | राजधानी में सबसे ज्यादा 6,030 फर्जी पेंशनर पाए गए, जिन्होंने 4,21,42,150 रुपये (करीब 4.21 करोड़) डकारे। वसूली मात्र 57,54,150 रुपये हुई। |
| -राजसमंद: | 4,948 मामलों में 3,91,64,600 रुपये की वसूली निकाली गई, लेकिन वसूले गए सिर्फ 7,06,150 रुपये। |
| -सीकर: | 4,097 फर्जी प्रकरणों में 2,49,99,800 रुपये का फर्जीवाड़ा हुआ, जिसमें से 47,77,800 रुपये वसूले जा सके। |
| -जोधपुर: | 4,062 पेंशनरों ने 3,21,33,050 रुपये उठाए, वसूली केवल 46,28,600 रुपये हुई। |
| -उदयपुर: | 4,053 फर्जी मामलों में 3,08,55,000 रुपये का घोटाला सामने आया, जिसमें 29,22,650 रुपये की वसूली हुई। |
| -भीलवाड़ा: | 3,963 मामलों में 2,29,76,750 रुपये गए, रिकवरी 36,61,850 रुपये रही। |
| -पाली: | 3,849 फर्जी पेंशनरों ने 2,58,08,750 रुपये की चपत लगाई, प्रशासन 41,42,750 रुपये ही निकाल पाया। |
| -चूरू: | 3,197 मामलों में 1,97,51,150 रुपये के फर्जीवाड़े पर 35,63,800 रुपये की वसूली हुई। |
| -अजमेर: | 3,119 मामलों में 1,79,05,150 रुपये की रिकवरी निकाली गई, लेकिन मिले मात्र 8,39,750 रुपये। |
| -झुंझुनूं: | 2,708 मामलों में 1,51,71,050 रुपये की फर्जी पेंशन उठी, वसूली 21,84,300 रुपये हुई। |
| -जालोर: | 2,619 पेंशनरों ने 1,37,16,150 रुपये का चूना लगाया, 30,04,950 रुपये वसूले गए। |
| -चित्तौड़गढ़: | 2,498 फर्जी केसों में 1,45,09,100 रुपये गए, रिकवरी 18,39,200 रुपये हुई। |
| -बीकानेर: | 2,446 मामलों में 1,64,60,300 रुपये की फर्जी निकासी, 26,66,300 रुपये की वसूली। |
| -डीडवाना-कुचामन: | 2,333 मामलों में 1,41,62,250 रुपये का घोटाला, 15,37,450 रुपये वसूले गए। |
| -हनुमानगढ़: | 2,287 मामलों में 1,12,91,000 रुपये गए, रिकवरी 26,03,100 रुपये रही। |
| -कोटा: | 2,276 मामलों में 1,30,01,800 रुपये के मुकाबले मात्र 8,36,100 रुपये वसूले गए। |
| -भरतपुर: | 2,244 मामलों में 1,55,90,150 रुपये उठे, रिकवरी 14,05,500 रुपये हुई। |
| -बूंदी: | 2,186 मामलों में 1,72,72,000 रुपये गए, 17,69,700 रुपये वापस आए। |
| -नागौर: | 2,104 मामलों में 1,17,63,250 रुपये की फर्जी पेंशन, 21,88,200 रुपये वसूले गए। |
| -सवाई माधोपुर: | 2,094 मामलों में 1,89,22,850 रुपये का फर्जीवाड़ा, 18,37,500 रुपये वसूली। |
| -गंगानगर: | 2,062 फर्जी प्रकरणों में 1,22,20,550 रुपये की निकासी, 23,63,400 रुपये रिकवरी। |
| -टोंक: | 2,027 पेंशनरों ने 1,24,61,750 रुपये डकारे, 14,10,400 रुपये वसूले गए। |
| -बालोतरा: | 1,749 मामलों में 93,83,050 रुपये की चपत, मात्र 3,73,550 रुपये की रिकवरी। |
| -ब्यावर: | 1,681 मामलों में 72,03,800 रुपये गए, रिकवरी सिर्फ 4,12,900 रुपये। |
| -बाड़मेर: | 1,618 मामलों में 84,94,200 रुपये का फर्जीवाड़ा, सबसे कम मात्र 2,40,300 रुपये वसूले गए। |
| -सिरोही: | 1,567 मामलों में 1,02,42,350 रुपये उठे, 13,70,700 रुपये वापस लिए गए। |
| -दौसा: | 1,566 मामलों में 82,08,700 रुपये की फर्जी निकासी, 12,61,700 रुपये रिकवर। |
| -अलवर: | 1,557 मामलों में 95,10,100 रुपये गए, रिकवरी 7,41,600 रुपये रही। |
| -कोटपूतली-बहरोड़: | 1,549 मामलों में 1,02,09,900 रुपये का घोटाला, 12,11,700 रुपये वसूले गए। |
| -बांसवाड़ा: | 1,481 मामलों में 93,82,200 रुपये उठे, रिकवरी मात्र 5,90,750 रुपये। |
| -करौली: | 1,421 फर्जी पेंशनरों ने 81,46,600 रुपये लिए, 6,80,100 रुपये ही वसूले जा सके। |
| -बारां: | 1,419 मामलों में 92,88,450 रुपये के फर्जीवाड़े पर 12,87,000 रुपये वसूली। |
| -डूंगरपुर: | 1,312 मामलों में 90,82,750 रुपये गए, 8,80,750 रुपये की रिकवरी। |
| -झालावाड़: | 1,260 मामलों में 60,46,300 रुपये उठे, 16,77,400 रुपये वसूले गए। |
| -सलूंबर: | 1,039 मामलों में 83,95,350 रुपये गए, रिकवरी 4,04,850 रुपये। |
| -जैसलमेर: | 966 मामलों में 63,28,250 रुपये का फर्जीवाड़ा, 4,92,450 रुपये की वसूली। |
| -प्रतापगढ़: | 941 मामलों में 60,20,900 रुपये उठे, 1,76,650 रुपये रिकवर। |
| -फलौदी: | 903 मामलों में 73,47,450 रुपये गए, 5,03,650 रुपये की वसूली। |
| -डीग: | 786 मामलों में 46,20,450 रुपये की निकासी, 3,92,750 रुपये वसूले गए। |
| -धौलपुर: | 776 मामलों में 40,56,050 रुपये गए, सबसे कम वसूली वालों में शामिल, मात्र 1,52,200 रुपये मिले। |
| -खैरथल-तिजारा: | 479 मामलों में 20,53,000 रुपये का फर्जीवाड़ा, 1,45,050 रुपये की रिकवरी। |
वसूली के नाम पर सिर्फ 6.96 करोड़ का दिखावा, बाकी 51 करोड़ कहां:-
सिस्टम की नाकामी का सबसे बड़ा प्रमाण इन आंकड़ों की अंत्येष्टि में छिपा है। कुल 58,62,98,450 (58.63 करोड़) रुपये की वसूली की जानी थी, लेकिन विभाग के हाथ अब तक केवल 6,96,39,650 (6.96 करोड़) रुपये ही लगे हैं। बाकी बचे 51 करोड़ रुपये से अधिक की राशि आखिर कहां गई? क्या प्रशासन ने मान लिया है कि यह पैसा अब कभी वापस नहीं आएगा? जब एक आम आदमी बैंक से छोटा सा लोन लेता है, तो बैंक वसूली के लिए उसके घर के बर्तन तक नीलाम करवा देता है, लेकिन यहां सरकारी खजाने से 51 करोड़ गायब हैं और विभाग केवल नोटिस जारी करने और चालान काटने का खेल खेल रहा है।
यह एक स्पष्ट प्रशासनिक विफलता है जहां टेंडर, ऑडिट और मॉनिटरिंग के नाम पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर जवाबदेही (Accountability) शून्य है। यदि समय रहते फील्ड स्तर पर ग्राम पंचायतों और अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई होती, तो यह आंकड़ा कभी 91 हजार को पार नहीं करता।अब सरकार का दावा है कि वह मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करवाने और जनआधार में इसे अद्यतन करवाने की सख्त मॉनिटरिंग कर रही है, लेकिन सवाल यह है कि जनता के टैक्स के जो 58 करोड़ रुपये लुट गए, उसकी भरपाई कौन करेगा? क्या किसी अधिकारी पर गाज गिरेगी या फिर हमेशा की तरह इसे भी “तकनीकी खामी” बताकर फाइलों में दफन कर दिया जाएगा? जनहित में यह आवश्यक है कि इस पूरी प्रक्रिया की एक उच्च-स्तरीय जांच हो और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर सख्त कार्रवाई की जाए।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now