Expose Now स्पेशल इन्वेस्टिगेशन: ट्रैप का ‘तमाशा’, कनविक्शन में ACB को सिर्फ ‘पासिंग मार्क’, 3 साल में 626 भ्रष्टाचारी बाइज्जत बरी, 61.8% फाइलों पर कुंडली मार कर बैठी एजेंसी

-तीन साल के फैसलों में भ्रष्टाचारियों का पलड़ा भारी: 938 में से 626 आरोपी छूटे बेदाग, केवल 33.26% मामलों में सजा करा पाई राजस्थान ACB

-‘रंगे हाथ’ दबोचने के बाद जांच में लचीलापन और लेटलतीफी: 977 मुकदमों में से 604 की जांच आज भी अधूरी, कछुआ चाल का सीधा फायदा उठा रहे घूसखोर

-अभियोजन स्वीकृति, कमजोर पैरवी और मिलीभगत के सिंडिकेट से न्याय की बलि: रंगे हाथों रिश्वत लेने वाले आरोपी अदालत में सबूतों के अभाव में क्यों हो रहे बरी?

-ट्रैप का शोर, इंसाफ में सन्नाटा: क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ ACB की जंग सिर्फ सुर्खियां बटोरने तक सीमित है?

जयपुर। राजस्थान में भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ का सरकारी दावा प्रशासनिक गलियारों और अखबारों के विज्ञापनों में जितना बुलंद सुनाई देता है, जमीन पर उसकी हकीकत उतनी ही खोखली साबित हो रही है। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) जब किसी सरकारी दफ्तर में दबिश देकर घूसखोर अधिकारी या कर्मचारी को रंगीन नोटों के साथ ‘रंगे हाथ’ दबोचती है, तो कैमरों की चमक और प्रेस रिलीज में ऐसा माहौल बनता है मानो प्रदेश से भ्रष्टाचार का समूल नाश हो चुका हो। नोटों के बंडल, केमिकल से लाल हुए हाथ और लॉकअप में बंद अफसरों की तस्वीरें जनता को यह भरोसा दिलाती हैं कि कानून के हाथ बहुत लंबे हैं।

लेकिन इस पूरे तमाशे के पीछे का कड़वा सच क्या है? जब ACB के इन तथाकथित ‘हाई-प्रोफाइल ऑपरेशनों’ की कानूनी परिणति अदालत की चौखट पर पहुंचती है, तो एजेंसी का पूरा ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। ‘Expose Now’ की विशेष पड़ताल यह चौंकाने वाला सच उजागर करती है कि पिछले तीन वर्षों में प्रदेश की शीर्ष जांच एजेंसी अदालतों में महज ‘पासिंग मार्क’ लेकर चल रही है। जिन मामलों में घूसखोरों को रंगे हाथ पकड़ने का ढिंढोरा पीटा गया था, उनमें से दो-तिहाई आरोपी मुकदमों से बेदाग छूट गए। एजेंसी की सुस्त जांच, लचर चार्जशीट, अभियोजन स्वीकृति का अंतहीन इंतजार और कथित तौर पर भीतरखाने चलने वाली ‘सांठगांठ’ ने राजस्थान को ऐसे मुहाने पर ला खड़ा किया है, जहां भ्रष्टाचारियों के मन से एसीबी और कानून का खौफ अब खत्म होता जा रहा है।

‘Expose Now’ डेटा एनालिसिस: 33.26% की ‘पासिंग मार्क’ पर ACB, 66.74% मामलों में छूटे भ्रष्टाचारी:-

अदालतों में मुकदमों के अंतिम फैसलों का लेखा-जोखा किसी भी जांच एजेंसी की दक्षता, निष्पक्षता और पेशेवर क्षमता का अंतिम पैमाना होता है। ‘Expose Now’ के विस्तृत डेटा विश्लेषण से जो हकीकत सामने आई है, वह प्रदेश के पूरे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी है:

पिछले 3 वर्षों में न्यायिक फैसलों का गणित:-

कुल निर्णीत प्रकरण (Total Decided Cases) : 938

सजा (Conviction / दोषसिद्धि) : 312

बरी (Acquittal / दोषमुक्त) : 626

दोषसिद्धि दर (Conviction Rate) : 33.26%

दोषमुक्ति दर (Acquittal Rate) : 66.74%

इन आंकड़ों का सीधा और निर्मम विश्लेषण यह है कि अदालत में निस्तारित हुए हर 100 मुकदमों में से लगभग 67 मामलों में आरोपी अदालत से मुस्कुराते हुए बरी हो गए। ACB केवल 33.26 फीसदी मामलों में ही आरोप सिद्ध करने में सफल रही। किसी स्कूली परीक्षा में 33 फीसदी अंक को महज ‘बॉर्डर लाइन पास’ कहा जाता है, राजस्थान की सबसे ताकतवर एंटी-करप्शन एजेंसी भी अपने न्यायिक प्रदर्शन में ठीक उसी 33.%(पासिंग मार्क) पर खड़ी नजर आ रही है।

सवाल उठता है कि जब ACB खुद दावा करती है कि उसने आरोपी को मौके पर घूस की रकम स्वीकारते पकड़ा, फिनॉल्फथलीन पाउडर का टेस्ट पॉजिटिव आया और रिश्वत के नोट बरामद हुए, तो फिर अदालत में 626 मामलों में यह दलीलें टिक क्यों नहीं पाईं? कानून के जानकारों का स्पष्ट कहना है कि यदि रेड-हैंड ट्रैप के बावजूद दोषमुक्ति की दर 66.74% पहुंच जाए, तो यह जांच की गुणवत्ता और अभियोजन की ईमानदारी पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है।

फाइलों में कैद इंसाफ, 977 में से 604 मामलों में अनुसंधान अटका:-

ACB की कार्यप्रणाली का दूसरा सबसे गंभीर और चिंताजनक पहलू है—मुकदमा दर्ज करने के बाद जांच को ठंडे बस्ते में डाल देना। ‘Expose Now’ की रिसर्च बताती है कि पिछले तीन सालों में प्रदेशभर में कुल 977 भ्रष्टाचार के प्रकरण दर्ज किए गए। इनमें ट्रैप, रिश्वत मांग, आय से अधिक संपत्ति और पद के दुरुपयोग से जुड़े संगीन अपराध शामिल हैं।

वर्षवार दर्ज किए गए प्रकरणों का ब्योरा इस प्रकार है:

-वर्ष 2023 : 316 प्रकरण

-वर्ष 2024 : 318 प्रकरण

-वर्ष 2025 : 343 प्रकरण

-कुल दर्ज मामले : 977 प्रकरण

अब इन 977 मामलों की वर्तमान स्थिति का कच्चा-चिट्ठा देखिए, जो एजेंसी की सुस्ती को बेनकाब करता है:

श्रेणी (Category) मुकदमों की संख्या कुल दर्ज मामलों का प्रतिशत

चालान पेश (Challan Presented) 342 35 %

अंतिम प्रतिवेदन (Final Report – FR) 31 3.17%

अनुसंधान में लंबित (Pending Investigation) 604 61.82%

कुल दर्ज मामले 977 100.00%

इन 977 मामलों में से एजेंसी केवल 342 मामलों में न्यायालय में चालान पेश कर सकी है। 31 मामलों में अंतिम प्रतिवेदन (एफआर) लगाकर फाइल बंद कर दी गई। सबसे सनसनीखेज तथ्य यह है कि 604 प्रकरण (लगभग 61.82%) आज भी अनुसंधान के अलग-अलग चरणों में धूल फांक रहे हैं।

यानी दर्ज किए गए 10 मामलों में से 6 से ज्यादा मामलों में एसीबी समय पर जांच पूरी करने में पूरी तरह नाकाम रही है। वर्ष 2023 के शुरुआती महीनों में दर्ज हुए मामलों में भी आज तक कई आरोपियों के खिलाफ चालान पेश नहीं हो पाया है। जब जांच ही दो से तीन साल तक खिंचती रहेगी, तो सबूत नष्ट होंगे, गवाहों पर दबाव बनेगा और केस की मेरिट पूरी तरह कमजोर पड़ जाएगी।

रेड-हैंड ट्रैप का खेल, कैमरों के सामने ‘रंगे हाथ’, कोर्ट की दहलीज पर ‘बेदाग’ कैसे:-

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत ट्रैप की कार्रवाई को सबसे पुख्ता साक्ष्य माना जाता है। इसमें परिवादी की शिकायत का गोपनीय सत्यापन होता है, डिजिटल वॉयस रिकॉर्डर पर घूस की मांग रिकॉर्ड की जाती है, नोटों पर केमिकल लगाया जाता है और स्वतंत्र गवाहों (मोटबीर गवाहों) की मौजूदगी में आरोपी को पकड़ा जाता है। जब पूरी प्रक्रिया इतनी वैज्ञानिक और तयशुदा है, तो फिर 626 मामलों में अदालत ने आरोपियों को दोषमुक्त क्यों कर दिया?

‘Expose Now’ की पड़ताल में सामने आई जांच की पांच प्रमुख कमजोरियां:

-सत्यापन में लीपापोती (Flawed Demand Verification): सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं कि केवल रिश्वत की रकम की बरामदगी अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है, रिश्वत की ‘मांग’ (Demand) और ‘स्वीकृति’ (Acceptance) का प्राथमिक साक्ष्य अटूट होना चाहिए। ACB के अधिकारी अक्सर त्वरित पब्लिसिटी के चक्कर में रिश्वत की मांग के सत्यापन की प्रक्रिया में तकनीकी खामियां छोड़ देते हैं। ‘वॉयस’ रिकॉर्डिंग की फॉरेंसिक विश्वसनीयता और सर्टिफिकेशन (धारा 65B भारतीय साक्ष्य अधिनियम) की कमी का लाभ आरोपियों को मिलता है।

-स्वतंत्र गवाहों की भूमिका पर संदेह (Hostile Independent Witnesses): ट्रैप के दौरान बनाए जाने वाले सरकारी पंच गवाह (मोटबीर) अदालतों में जिरह के दौरान अक्सर अपने बयानों से मुकर जाते हैं। ACB का यह दायित्व है कि वह निष्पक्ष और दबावमुक्त गवाह चुने, लेकिन कई बार कागजी औपचारिकता पूरी करने के लिए ऐसे गवाह तैयार किए जाते हैं जो अदालत में बचाव पक्ष के वकीलों के सवालों के सामने टिक नहीं पाते।

-जब्ती मेमो और फॉरेंसिक चेन ऑफ कस्टडी का टूटना: नोटों की बरामदगी के बाद तैयार किया जाने वाला फर्द जब्ती मेमो (Seizure Memo) कानूनी रूप से बेहद संवेदनशील होता है। रासायनिक परीक्षण के नमूनों को सील करने और उन्हें तय समय सीमा के भीतर विधि विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) भेजने में की जाने वाली लापरवाही का सीधा फायदा बचाव पक्ष उठाता है।

-अनुसंधान अधिकारियों का बार-बार बदलना: ACB में जांच अधिकारियों (आईओ) के तबादले और कार्यभार में बदलाव का सिलसिला इतना तेज रहता है कि एक मामले को दो से तीन अलग-अलग अधिकारी संभालते हैं। इससे निरंतरता टूटती है और अदालत में गवाही के वक्त जांच अधिकारी महत्वपूर्ण कड़ियों को जोड़ नहीं पाते।

-चार्जशीट में तकनीकी खामियां: जब कई वर्षों की देरी के बाद चार्जशीट अदालत में दाखिल की जाती है, तो उसमें कई प्रक्रियात्मक खामियां (Procedural Lapses) जानबूझकर या लापरवाही से छोड़ दी जाती हैं, जिससे आरोपी को ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) मिल जाता है।

जांच में ढिलाई या मिलीभगत का सिंडिकेट? कटघरे में ACB की भूमिका:

-क्या यह महज प्रशासनिक अक्षमता है या फिर इसके पीछे एक सुविचारित मिलीभगत काम कर रही है? ‘Expose Now’ के पास मौजूद तथ्य ACB के अंदरूनी कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

-ट्रैप की कार्रवाई के तुरंत बाद शुरुआती 48 से 72 घंटों में एजेंसी बेहद आक्रामक रुख दिखाती है—आरोपी के घर, फॉर्महाउस और ठिकानों पर छापे मारे जाते हैं, जेवरात और नकदी की बरामदगी की खबरें मीडिया में तैरती हैं। लेकिन जैसे ही मामला जनस्मृति से धुंधला पड़ता है, जांच की रफ्तार अचानक सुस्त पड़ जाती है।

-आरोपियों को जमानत की खुली छूट: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 167(2) के तहत तय समयसीमा (60 या 90 दिन) में यदि चालान पेश न किया जाए, तो आरोपी को डिफॉल्ट जमानत का कानूनी अधिकार मिल जाता है। जब 604 मामलों में जांच वर्षों तक लंबित रखी जाती है, तो भ्रष्ट अधिकारी आसानी से जमानत पर बाहर आ जाते हैं। बाहर आने के बाद वे अपने रसूख और आर्थिक ताकत का इस्तेमाल करके परिवादियों को धमकाते हैं और गवाहों को तोड़ते हैं।

-समझौते और नरमी का खेल: विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि अनुसंधान को जानबूझकर लंबा खींचना कई बार एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा होता है। समय बीतने के साथ-साथ परिवादी थक जाता है, गवाह सेवानिवृत्त हो जाते हैं या बदल जाते हैं, और अंततः केस अदालत में दम तोड़ देता है। क्या यह लचीलापन और लेटलतीफी किसी गोपनीय ‘डील’ का नतीजा है? यह सवाल आज प्रदेश का हर जागरूक नागरिक पूछ रहा है।

अभियोजन स्वीकृति का चक्रव्यूह, दागी अफसरों को बचाने वाली सरकारी ढाल:-

ACB के अनुसंधान में सबसे बड़ा रोड़ा ‘अभियोजन स्वीकृति’ (Prosecution Sanction) का खेल है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए और 19 के तहत किसी भी लोकसेवक के खिलाफ अदालत में चालान पेश करने से पहले संबंधित प्रशासनिक विभाग और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति लेना अनिवार्य होता है।

‘Expose Now’ के विश्लेषण में पाया गया कि दर्जनों मामलों में ACB की जांच पूरी होने के बावजूद फाइलें सचिवालय के विभिन्न विभागों में सालों तक अटकी रहती हैं। जब किसी राजपत्रित अधिकारी (आईएएस, आरएएस, पुलिस अफसर, चीफ इंजीनियर) को ट्रैप किया जाता है, तो उसके विभाग के उच्चाधिकारी महीनों तक अभियोजन स्वीकृति की फाइल पर फैसला नहीं लेते। प्रशासनिक विभाग बार-बार ACB से अतिरिक्त स्पष्टीकरण मांगकर मामले को उलझाए रखते हैं। विडंबना यह है कि कई भ्रष्ट अधिकारी निलंबन की अवधि समाप्त होते ही बहाल हो जाते हैं और दोबारा मलाईदार पदों पर तैनात होकर उसी सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं, जिसकी जांच ACB कर रही होती है। जब सरकार का ही प्रशासनिक ढांचा अपने दागी सहयोगियों को बचाने के लिए ढाल बनकर खड़ा हो जाए, तो फिर एसीबी की कार्रवाई केवल जनता की आंखों में धूल झोंकने का माध्यम बनकर रह जाती है।

विभागवार भ्रष्टाचार का जाल, जहां आम आदमी से लेकर प्रदेश का बजट तक लूटा जा रहा:-

‘Expose Now’ के संकलित आंकड़ों से साफ झलकता है कि भ्रष्टाचार केवल एक या दो महकमों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शासन के हर अंग में कैंसर की तरह फैल चुका है:

-राजस्व विभाग (Revenue): पटवारी, गिरदावर और तहसीलदार से लेकर एसडीएम स्तर तक नामांतरण खोलने, पैमाइश करने और भूमि आवंटन के नाम पर खुलेआम रिश्वतखोरी जारी है। आम किसान अपनी ही जमीन के दस्तावेजों के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है।

-पुलिस विभाग (Police): एफआईआर दर्ज करने, निष्पक्ष अनुसंधान करने, आरोपियों के नाम निकालने या सामान्य मुकदमों में जमानत में मदद करने के नाम पर कांस्टेबल से लेकर डिप्टी एसपी रैंक तक के अधिकारी रिश्वत लेते पकड़े गए हैं। जिस महकमे पर कानून लागू कराने की जिम्मेदारी है, वही सबसे ज्यादा दागदार है।

-नगरीय विकास व स्वायत्त शासन (UDH & Municipal Bodies): पट्टे जारी करने, निर्माण स्वीकृति देने, टेंडर पास करने और सफाई ठेकों के भुगतान में करोड़ों का वारा-न्यारा होता है।

-पंचायती राज (Panchayati Raj): सरपंचों, ग्राम विकास अधिकारियों (VDO) और कनिष्ठ अभियंताओं द्वारा ग्रामीण विकास योजनाओं, मनरेगा और पक्के निर्माण कार्यों के बिल पास करने की एवज में कमीशनखोरी एक स्थापित परंपरा बन चुकी है।

-ऊर्जा व जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी (Discoms & PHED): नए बिजली कनेक्शन जारी करने, ट्रांसफार्मर बदलने और पानी की पाइपलाइनों के टेंडरों में कमीशन के बिना एक भी फाइल आगे नहीं सरकती।

आम नागरिक जब अपने जायज हकों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता है, तो उसे हर मेज पर चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है। जब वह हिम्मत जुटाकर एसीबी के हेल्पलाइन नंबर 1064 पर शिकायत करता है, ट्रैप करवाता है, और वर्षों बाद देखता है कि वही रिश्वतखोर अफसर अदालत से बेदाग बरी होकर फिर से शान से उसी कुर्सी पर बैठ गया है, तो कानून और न्याय व्यवस्था पर से आम आदमी का भरोसा पूरी तरह उठ जाता है।

क्या ACB के अफसरों की भी होगी जवाबदेही तय?:

-जब किसी मामले में अदालत आरोपी को बरी करती है, तो फैसले में अक्सर यह दर्ज होता है कि जांच में गंभीर लापरवाही बरती गई या अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपराध साबित नहीं कर सका। लेकिन क्या कभी उन जांच अधिकारियों (IOs) के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई जिन्होंने जानबूझकर केस को कमजोर किया?

-अदालतों में बरी होने वाले 626 मामलों की क्या कभी स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा कराई गई?

-क्या उन जांच अधिकारियों को चिन्हित किया गया जिनकी लचर जांच की वजह से रंगे हाथ पकड़ा गया घूसखोर छूट गया?

-ACB में तीन-तीन साल तक 604 मामलों को पेंडिंग रखने वाले अधिकारियों से क्या कभी जवाब तलब किया गया?

जब तक जांच में लापरवाही बरतने वाले ACB अधिकारियों पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक यह चक्रव्यूह ऐसे ही चलता रहेगा। एसीबी ट्रैप का आंकड़ा दिखाकर वाहवाही लूटती रहेगी, घूसखोर जमानत लेकर चैन की नींद सोते रहेंगे और आम जनता पिसती रहेगी।

फाइलों का मकड़जाल और खोखला तंत्र:-

राजस्थान में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहां दावों और हकीकत के बीच एक चौड़ी खाई बन चुकी है। तीन सालों में 977 मामलों का दर्ज होना यह तो साबित करता है कि प्रदेश में रिश्वतखोरी का मर्ज गहरा और सर्वव्यापी है, लेकिन 604 मामलों का जांच में लटके रहना और अदालतों में केवल 33.26% कनविक्शन रेट हासिल होना यह चीख-चीख कर कह रहा है कि ACB की बंदूक में सिर्फ बारूद का धुआं है, गोली नहीं। यदि 938 फैसलों में से 626 आरोपी बरी हो जाते हैं, तो यह केवल सांख्यिकीय विफलता नहीं है, यह उस परिवादी के भरोसे की हत्या है जिसने सिस्टम के खिलाफ जाकर आवाज उठाई थी। यह उस ईमानदार नागरिक की हार है जो रिश्वत दिए बिना जीना चाहता है। जब तक ACB अपने आंतरिक अनुशासन, अनुसंधान की गुणवत्ता, फॉरेंसिक साक्ष्यों के संकलन और अभियोजन की पैरवी को पेशेवर और पारदर्शी नहीं बनाएगी, तब तक ‘एंटी करप्शन ब्यूरो’ केवल एक ऐसा मंच बना रहेगा जहां ‘ड्रामेबाजी’ तो भरपूर होती है, लेकिन इंसाफ का पर्दा कभी नहीं उठता। प्रदेश को सिर्फ ‘पासिंग मार्क’ लाने वाली एजेंसी नहीं, बल्कि भ्रष्टाचारियों की रीढ़ तोड़ने वाली निष्पक्ष और कठोर कानूनी मशीनरी की जरूरत है।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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