-मेधावी छात्राओं के लिए तय 150 करोड़ में से सिर्फ 11,000 की निकाली गई रस्म अदायगी, वह भी विज्ञापन में उड़ाए
-गर्ल्स सैनिक स्कूल, स्पोर्ट्स स्कूल और फ्री स्कूटी के करीब 139 करोड़ पर लगा ताला, 6 माह में खर्च ‘शून्य’
-सरकारी फाइलों और ‘प्रशासनिक स्वीकृतियों’ के फेर में फंसा भविष्य, माध्यमिक शिक्षा विभाग की ऑडिट रिपोर्ट में महाखुलासा
जयपुर। वित्तीय वर्ष 2026-27 के छह महीने बीत चुके हैं, लेकिन माध्यमिक शिक्षा विभाग की जमीनी हकीकत सरकारी दावों की पोल खोल रही है। विभाग की अगस्त माह तक की आधिकारिक रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि करोड़ों रुपये का बजट पास होने के बावजूद योजनाएं धरातल पर उतरने का इंतजार ही कर रही हैं। सबसे सनसनीखेज आंकड़ा मेधावी छात्राओं और सैनिक व खेल विद्यालयों से जुड़ा है, जहाँ 289 करोड़ से अधिक के कुल स्वीकृत बजट में से विभाग छह महीनों में केवल ग्यारह हजार रुपये ही खर्च कर पाया है। हैरानी की बात यह है कि खर्च हुए ये महज 11,000 भी बेटियों की बेहतरी या उनके खाते में नहीं गए, बल्कि विज्ञापन की औपचारिकता पूरी करने में निकाल दिए गए।
यहां कागजों में अटका करोड़ों का फंड, खर्च हुआ ‘शून्य’:-
अगस्त तक की रिपोर्ट के अनुसार, बेटियों को पंख देने और खेलों व सैन्य प्रशिक्षण को बढ़ावा देने वाली कई प्रमुख योजनाओं में छह महीने बाद भी एक नया पैसा नहीं लगाया गया:
-मुफ्त स्कूटी वितरण योजना: बजट 34.87 करोड़ — खर्च शून्य
-जैसलमेर गर्ल्स सैनिक स्कूल: बजट 6.18 करोड़ — खर्च शून्य
-अजमेर गर्ल्स सैनिक स्कूल: बजट 10.00 करोड़ — खर्च शून्य
-भरतपुर गर्ल्स सैनिक स्कूल: बजट 10.00 करोड़ — खर्च शून्य
-सैनिक स्कूल, झुंझुनूं: बजट 47.84 करोड़ — खर्च शून्य
भरतपुर स्पोर्ट्स स्कूल: बजट 29.81 करोड़ — खर्च शून्य
मेधावी छात्रा प्रोत्साहन योजना: बजट 150.00 करोड़ — खर्च महज 11,000 (केवल विज्ञापन पर)
(तीनों गर्ल्स सैनिक स्कूलों के लिए कुल 36.18 करोड़ रुपये आवंटित थे, लेकिन खर्च के नाम पर खाता तक नहीं खुला। वहीं सीकर गर्ल्स सैनिक स्कूल के 11.39 करोड़ के बजट में से बमुश्किल 10% राशि ही खर्च हो सकी है।)
अड़ंगा कहां? फाइलों की टेबल-टू-टेबल सुस्त चाल:-
रिपोर्ट में जब शून्य या नाममात्र खर्च का कारण (रीजन ऑफ शॉर्टफॉल) तलाशा गया, तो सामने आया कि अफसरशाही कागजी औपचारिकता में उलझी हुई है। कई योजनाओं में प्रस्ताव भेजने की कार्रवाई प्रक्रियाधीन है, तो कहीं प्रस्ताव तैयार करने, सहमति लेने और प्रशासनिक मंजूरियों के नाम पर सिर्फ समय काटा जा रहा है। विभाग के कुल स्वीकृत बजट की बात करें तो अगस्त तक केवल करीब 35% राशि ही खर्च की जा सकी है।
तस्वीर का दूसरा पहलू: जहां तत्परता दिखी, वहां परिणाम भी आए:-
ऐसा नहीं है कि हर मद में सुस्ती है, विभाग ने कुछ नियमित योजनाओं में फंड का सही और तेज उपयोग भी किया है:
-निशुल्क पाठ्यपुस्तक योजना: 90 करोड़ में से 75.14 करोड़ (लगभग 83%) खर्च।
-कक्षा 6 से 8 ओबीसी पूर्व मैट्रिक छात्रवृत्ति: 26 करोड़ में से 23.71 करोड़ (लगभग 91%) खर्च।
-एसटी छात्रवृत्ति योजना: 20 करोड़ में से 16.68 करोड़ (लगभग 83%) खर्च।
-ग्रामीण बालिकाओं के लिए साइकिल वितरण: 165 करोड़ में से 87.62 करोड़ (करीब 53%) खर्च।
-लंप सम कैश अवार्ड: 60 लाख रुपये में से 44.10 लाख रुपये (करीब 74%) खर्च किए जा चुके हैं।
Expose Now का बड़ा सवाल:-
जब छात्रवृत्ति और किताबों के लिए फंड समय पर निकाला और बांटा जा सकता है, तो फिर बेटियों की स्कूटी, खेल अकादमियों और सैनिक स्कूलों के लिए मंजूर बजट पर कुंडली मारकर क्यों बैठा गया है?
छह महीने बीतने के बाद भी आधी वित्तीय अवधि सिर्फ ‘मंजूरियों’ की भेंट चढ़ जाना किसकी लापरवाही है? विज्ञापन जारी करने के लिए तो 11,000 की फुर्ती तुरंत दिखा दी गई, लेकिन जिन योजनाओं से जमीनी स्तर पर युवाओं की जिंदगी बदलनी थी, उनके लिए छह महीने में एक कदम तक नहीं बढ़ा। एक्सपोज नाउ अब इस सुस्त सिस्टम से जवाब मांगता है—आखिर इन ठंडी पड़ी फाइलों को रफ्तार कब मिलेगी, और करोड़ों के फंड पर कुंडली मारकर बैठे जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी?
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now