-प्रदेश भर में 55% से अधिक सरकारी होटल और मिडवे पर लटके ताले, चार दशकों से सुध लेने वाला कोई नहीं
-अफसरों की नाकामी और अनदेखी के चलते अब ‘आउटसोर्सिंग’ की बैसाखी तलाश रहा पर्यटन महकमा
जयपुर। राजस्थान की पहचान दुनियाभर में पर्यटन के सिरमौर के रूप में होती है। रंग-रंगीले धोरे, ऐतिहासिक किले और अतिथि देवो भवः की परंपरा को भुनाकर निजी होटल समूह जहां हर साल अरबों का मुनाफा कूट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रदेश का राजस्थान पर्यटन विकास निगम (RTDC) घोर बदहाली, लापरवाही और भारी वित्तीय घाटे के दलदल में धंस चुका है। सरकारी तंत्र की लालफीताशाही और उदासीनता ने एक वक्त तक राजस्थान की शान रहे सरकारी होटलों, मिडवे और कैफेटेरिया को खंडहर में तब्दील कर दिया है। ‘Expose Now’ के हाथ लगे आधिकारिक दस्तावेजों से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि पर्यटन विभाग का यह निगम पिछले कुछ वर्षों में ही करीब 100 करोड़ से ज्यादा के शुद्ध घाटे में डूब चुका है। इतना ही नहीं, विभाग के पास मौजूद कुल 69 संपत्तियों में से आधे से ज्यादा यानी 38 संपत्तियां पूरी तरह बंद पड़ी हैं, जिन पर दशकों से ताले लटके हुए हैं।
69 में से सिर्फ 28 संपत्तियां अपने दम पर चालू, वो भी सभी घाटे में:-
विभाग के ताजा अंदरूनी दस्तावेजों की पड़ताल से सामने आया है कि आरटीडीसी के पास प्रदेश भर में कुल 69 होटल, मिडवे, कैफेटेरिया और यात्रिका इकाइयां मौजूद हैं। इनमें से:
-38 इकाइयां पूरी तरह बंद/असंचालित हैं।
-मात्र 28 इकाइयों का संचालन किसी तरह निगम खुद खींच रहा है, जिनसे हर साल औसतन 10-12 करोड़ का घाटा हो रहा है।
-3 कैफेटेरिया (सरोवर माउंट आबू, अपोलो माउंट आबू और गढ़ीसर जैसलमेर) को नाममात्र की सालाना फीस पर निजी फर्मों को ठेके (लाइसेंस) पर दिया गया है।
हैरानी की बात यह है कि बंद पड़ी 38 संपत्तियों में से कई तो 1980 और 1990 के दशक से बंद हैं। उदाहरण के तौर पर, चित्तौड़गढ़ का ‘जनता आवास गृह’ साल 1984 से, माउंट आबू का ‘पुर्जन निवास’ 1991 से और झुंझुनूं के कैफेटेरिया 1989 से वीरान पड़े हैं। इसके अलावा भीलवाड़ा, हनुमानगढ़, नागौर, बाड़मेर, चूरू, रामगढ़ (जयपुर) और बूंदी के होटल सालों से धूल फांक रहे हैं। मुख्य राजमार्गों पर करोड़ों की बेशकीमती जमीनों पर बने बहरोड़, शाहपुरा, दौसा, धौलपुर, बालोतरा और गोगुंदा जैसे प्रमुख मिडवे भी रख-रखाव और निगरानी के अभाव में बंद पड़े हैं।

लगातार घाटे का ‘रिकॉर्ड’, कुछ वर्षों में ही 100 करोड़ की चपत:-
सरकारी तंत्र के कुप्रबंधन का आलम यह है कि पर्यटन सीजन में पर्यटकों से गुलजार रहने वाले राजस्थान में आरटीडीसी एक भी साल मुनाफे का मुंह नहीं देख पाया। वित्तीय वर्ष 2019-20 से लेकर 2023-24 तक के ऑडिट आंकड़े निगम की बदहाली की खुली गवाही दे रहे हैं:
वित्तीय वर्ष कुल आय (लाख रु.) कुल व्यय (लाख रु.) शुद्ध घाटा (लाख रु.)
2019-20 9,049.59 13,266.58 -4,216.99 लाख
2020-21 5,942.20 8,382.61 -2,440.41 लाख
2021-22 6,191.00 7,626.37 -1,435.37 लाख
2022-23 10,904.60 11,636.89 -732.29 लाख
2023-24 12,205.50 13,359.75 -1,154.25 लाख
प्राइम लोकेशन की संपत्तियां भी नहीं संभाल पा रहा RTDC:-
हैरानी की बात यह है कि जिन शहरों में निजी होटल संचालक रूम नहीं मिलने का बोर्ड लगा देते हैं, वहां सरकारी होटल घाटे में चल रहे हैं। अजमेर, पुष्कर, बीकानेर, कोटा, भरतपुर, अलवर और नाथद्वारा जैसी प्रमुख धार्मिक व पर्यटन स्थलों की इकाइयों में रखरखाव और सुविधाओं का घोर अभाव है। कमरों की बुकिंग (Accommodation) और खान-पान (Catering) सेवाओं में निजी होटलों के मुकाबले आरटीडीसी की सेवाएं बेहद लचर साबित हो रही हैं। कई होटलों की हालत धर्मशालाओं से भी बदतर हो चुकी है, जिसके चलते देशी-विदेशी सैलानी सरकारी होटलों के नाम से भी कतराने लगे हैं।
अब आउटसोर्सिंग की आड़, जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की तैयारी:-
दशकों तक सरकारी संपत्तियों को बर्बाद होने देने के बाद अब पर्यटन विभाग अपनी नाकामी छुपाने के लिए इन बंद इकाइयों को ‘आउटसोर्स पद्धति’ (ठेकेदारी प्रथा) पर निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रहा है। विभाग की फाइलों में इन बंद इकाइयों को फिर से शुरू करने के नाम पर आउटसोर्सिंग की प्रक्रिया विचाराधीन बताकर पल्ला झाड़ा जा रहा है।
सवाल यह उठता है कि:
-जब निजी होटल संचालक राजस्थान में बंपर मुनाफा कमा रहे हैं, तो सरकारी निगम हर साल करोड़ों के घाटे में क्यों जा रहा है?
-करोड़ों-अरबों रुपये की सरकारी जमीन और संपत्तियों को 20-30 साल तक वीरान छोड़ खंडहर बनने देने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?
-क्या आउटसोर्सिंग के नाम पर प्राइम लोकेशन की बेशकीमती सरकारी जमीनों को कौड़ियों के भाव निजी घरानों को सौंपने का खेल रचा जा रहा है?
आखिर पर्यटन में इस घाटे के लिए कौन है जिम्मेदार:-
सरकारी तंत्र की यह बदहाली महज आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई की खुली बर्बादी का जीता-जागता सबूत है। जब एक ही राज्य में, उन्हीं पर्यटन स्थलों पर निजी होटल उद्योग रिकॉर्ड मुनाफा कमा रहा है, तब पर्यटन विकास निगम का साल-दर-साल घाटे के गर्त में गिरते जाना सीधे तौर पर प्रशासनिक मिलीभगत और नीतिगत पंगुता की ओर इशारा करता है। अरबों रुपये की सरकारी संपत्तियों को दशकों तक सुनियोजित तरीके से रखरखाव के अभाव में छोड़ना, उन्हें खंडहर में तब्दील होने देना और फिर अंततः ‘आउटसोर्सिंग’ के नाम पर निजी हाथों में सौंपने की बिसात बिछाना—यह एक ऐसा पैटर्न है जिसकी उच्चस्तरीय और निष्पक्ष वित्तीय जांच होना लाजिमी है।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now