जयपुर सर्राफा बाजार में हड़कंप: 5.5 किलो सोने के विवाद में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, तीन नामी व्यापारियों की अग्रिम जमानत रद्द

जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट, जयपुर ने सोने के कारोबारी लेन-देन से जुड़े करीब 5.5 किलोग्राम सोने के विवाद में एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा आदेश पारित किया है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए नामी सर्राफा व्यापारियों—देवप्रकाश खंडाका, सतीश कुमार खंडाका और मुकेश खंडाका—को निचली अदालत से मिली अग्रिम जमानत को रद्द कर दिया है। हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद अब आरोपियों की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं।

क्या है पूरा मामला?

यह पूरा प्रकरण जयपुर के कोतवाली थाना क्षेत्र में दर्ज एफआईआर संख्या 284/2024 से जुड़ा है। शिकायतकर्ता राकेश कुमार अरोड़ा और खंडाका परिवार के बीच वर्ष 2006 से 2018 तक सोने के लेन-देन का लंबा कारोबारी संबंध रहा है। शिकायतकर्ता के अनुसार, वह सोने के जेवरात देकर बदले में शुद्ध सोना प्राप्त करता था।

आरोप है कि इस लंबे व्यापारिक लेन-देन के दौरान लगभग 5.490 किलोग्राम सोना वापस करना बाकी रह गया, जिसे हड़पने के लिए हिसाब-किताब में हेराफेरी की गई।

फर्जी पर्चियों और दस्तावेजों का आरोप

जांच के दौरान शिकायतकर्ता द्वारा पुलिस को कई रसीदें और पर्चियां सौंपी गईं। शिकायतकर्ता का मुख्य आरोप था कि इनमें से चार पर्चियां (दिनांक 30 दिसंबर 2007, 25 जून 2009, 20 जून 2013 और 23 मार्च 2008) पूरी तरह से फर्जी हैं। इन फर्जी पर्चियों के जरिए 3261.200 ग्राम सोना लौटाया जाना झूठे तरीके से दर्शाया गया था। पुलिस जांच में भी करीब 4928.530 ग्राम फाइन गोल्ड बकाया सामने आया था।

निचली अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में दी गई थी चुनौती

इससे पहले जयपुर महानगर-द्वितीय की सत्र अदालत ने 20 फरवरी 2025 को तीनों आरोपियों को अग्रिम जमानत दे दी थी। इस आदेश के खिलाफ शिकायतकर्ता राकेश कुमार अरोड़ा ने हाई कोर्ट में जमानत निरस्तीकरण याचिका (S.B. Criminal Bail Cancellation Application No.63/2025) दायर की।

तर्क दिया गया कि अग्रिम जमानत मिलने के कारण कथित फर्जी मूल पर्चियों की बरामदगी और निष्पक्ष जांच प्रभावित हो रही है।

हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

मामلا जस्टिस चंद्र प्रकाश श्रीमाली की बेंच में विचाराधीन था। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि निचली अदालत ने आरोपियों को जमानत देते समय अपराध की प्रकृति, आरोपों की गंभीरता और जांच पर पड़ने वाले उसके प्रभाव जैसे अहम पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया।

न्यायालय ने माना कि केवल यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि आरोपी जांच में सहयोग करेंगे, बल्कि न्यायिक सिद्धांतों के तहत गंभीर आर्थिक और धोखाधड़ी के मामलों में जमानत के मानकों को परखा जाना चाहिए। इसी के साथ, हाई कोर्ट ने तीनों आरोपियों की अग्रिम जमानत को निरस्त कर दिया है।


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