31 साल पुराना विवाद और जेडीए की लापरवाही; हाईकोर्ट ने जूथाराम को माना जमीन का असली मालिक, 12% ब्याज संग लौटानी होगी राशि

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) को तगड़ा झटका दिया है। अदालत ने जयपुर के पॉश इलाके वैशाली नगर (गांधी पथ, चित्रकूट एरिया) स्थित करीब 23 बीघा 8 बिस्वा बेशकीमती जमीन के 31 साल पुराने भूमि अधिग्रहण विवाद में जेडीए की अपील को सिरे से खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने समय रहते कब्जा न लेने के कारण इस पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया को कानूनन समाप्त (लैप्स) मान लिया है।

वर्तमान बाजार मूल्य के अनुसार, ‘रोशन फार्म’ से जुड़ी इस जमीन की कीमत 1,000 करोड़ रुपए से अधिक आंकी जा रही है। अदालत ने जूथाराम व अन्य को इस जमीन का वैध मालिक और वास्तविक कब्जाधारी माना है।

हाईकोर्ट का सख्त रुख और प्रमुख निर्देश

अदालत ने जेडीए की अपीलों को खारिज करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु सामने रखे हैं:

  1. अधिग्रहण प्रक्रिया हुई लैप्स: माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चूंकि जेडीए ने तय समय सीमा के भीतर जमीन का वास्तविक भौतिक कब्जा नहीं लिया और न ही उचित मुआवजा दिया, इसलिए भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई कानूनन समाप्त हो चुकी है।
  2. ULC की कार्रवाई समाप्त: शहरी भूमि सीलिंग कानून (अर्बन लैंड सीलिंग एक्ट – यूएलसी) के तहत की गई पूर्व की कार्रवाई को भी अदालत ने समाप्त माना है।
  3. जूथाराम का मालिकाना हक बरकरार: कोर्ट ने माना कि जूथाराम और अन्य ही इस भूमि के वास्तविक कब्जाधारी हैं और उन्हें इस पर बने रहने का पूरा अधिकार है।
  4. 12% ब्याज के साथ राशि लौटाने का आदेश: वर्ष 2002 में सेटलमेंट कमेटी के आदेश के तहत खातेदारों द्वारा नियमितीकरण (रेगुलराइजेशन) के लिए जमा कराई गई करीब 1.45 करोड़ रुपए की राशि को जेडीए अब 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ वापस लौटाएगा।

जेडीए की कार्यशैली पर खड़े हुए बड़े सवाल

इस पूरे प्रकरण में जेडीए की ढीली कार्यशैली और प्रशासनिक उदासीनता खुलकर उजागर हुई है। सूत्रों के मुताबिक, चित्रकूट योजना के लिए बताई जा रही इस जमीन पर जेडीए बरसों तक अपना दावा ठोकता रहा, लेकिन धरातल पर न तो कभी इसका वास्तविक कब्जा लिया गया और न ही मालिकों को मुआवजा बांटा गया।

लापरवाही का बड़ा उदाहरण: फरवरी 2015 में तत्कालीन जिला कलेक्टर ने जमीन का नामांतरण कथित लोगों के नाम से निरस्त कर जेडीए के नाम दर्ज भी कर दिया था। इसके बावजूद जेडीए ने इस 23 बीघा भूमि पर तत्काल कब्जा लेने की बजाय पड़ोस की 37 बीघा जमीन पर अपना ध्यान केंद्रित किया। जेडीए की इसी सुस्ती का फायदा उठाकर खातेदारों को कानूनी उपाय तलाशने का मौका मिल गया।

जेडीए से कहां हुई चूक?

  • स्वामित्व की अनिश्चितता: जेडीए कई सालों तक खुद जमीन के स्वामित्व को लेकर स्थिति साफ नहीं कर पाया।
  • सेटलमेंट के बाद भी ढिलाई: साल 2002 में सेटलमेंट कमेटी के जरिए राशि जमा होने के बाद भी मामले को जानबूझकर या लापरवाही वश लंबित रखा गया।
  • समय पर अपील न करना: अदालत में यूएलसी और अधिग्रहण की कार्रवाई से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों को जेडीए कानूनी समय-सीमा के भीतर चुनौती देने में नाकाम रहा।

फैसले के बाद अब क्या होगी स्थिति?

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद जमीन पूरी तरह से अवाप्ति (अधिग्रहण) से मुक्त हो जाएगी। हालांकि, इस पर आगे के घटनाक्रम निम्नलिखित नियमों के अधीन होंगे:

  • भू-रूपांतरण (Land Conversion): यदि खातेदार इस भूमि का गैर-कृषि या व्यावसायिक उपयोग करना चाहते हैं, तो उन्हें नियमानुसार लैंड कन्वर्जन कराना होगा।
  • अवैध निर्माण पर कार्रवाई का अधिकार: यदि इस जमीन पर कहीं बिना अनुमति के निर्माण, अतिक्रमण या बिना कन्वर्जन के व्यावसायिक गतिविधि हुई है, तो जेडीए को नियमों के तहत कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रहेगा।

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