JJM घोटाला: महेश जोशी को हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, लेकिन ACB और विशेष जज को लगी कड़ी फटकार!

जयपुर | राजस्थान के बहुचर्चित और करोड़ों रुपये के जल जीवन मिशन (JJM) घोटाले में पूर्व मंत्री महेश जोशी की गिरफ्तारी को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट का एक अहम और विस्तृत आदेश सामने आया है। कोर्ट ने महेश जोशी की गिरफ्तारी को अवैध बताते हुए उनके बेटे रोहित जोशी द्वारा दायर की गई ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका’ (Habeas Corpus) को तो खारिज कर दिया है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) और विशेष न्यायाधीश की कार्यशैली की कड़ी आलोचना की है।

जस्टिस उमाशंकर व्यास और जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने 12 जून को यह याचिका खारिज की थी, जिसका विस्तृत आदेश बुधवार को अपलोड किया गया। कोर्ट ने साफ तौर पर माना है कि इस हाई-प्रोफाइल मामले में गिरफ्तारी के नियमों का पालन नहीं हुआ और दोनों स्तरों (ACB व जज) पर गंभीर चूक हुई है।

ACB की फजीहत: ‘आधार’ और ‘कारण’ का अंतर ही नहीं समझ पाई पुलिस

हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में ACB की जांच प्रक्रिया की धज्जियां उड़ाते हुए कई बड़ी कमियां गिनाई हैं:

  • लिखित आधार की अनिवार्यता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के ‘आधार’ (Grounds) लिखित रूप में बताना एक संवैधानिक जरूरत है। लेकिन, ACB पूरे रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं कर पाई जिससे साबित हो कि महेश जोशी को गिरफ्तारी के वास्तविक आधार लिखित में बताए गए थे।
  • मूलभूत अवधारणा की कमी: ACB ने केवल अपराध की धाराएं बताकर पल्ला झाड़ लिया। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के ‘आधार’ (Ground of Arrest) और ‘कारण’ (Reason of Arrest) दो अलग-अलग चीजें हैं। ACB इस मूलभूत अवधारणा को ही नहीं समझ पाई।

ACB के बयानों में विरोधाभास और तथ्यों में हेरफेर की आशंका

खंडपीठ ने ACB के जवाबों में भारी विरोधाभास पकड़ा है।

  • शुरुआत में ACB ने अपने जवाब में कहा कि महेश जोशी को गिरफ्तारी के आधार बताए गए थे।
  • बाद में पुलिस ने अपना बयान पलटते हुए कहा कि आधार उनके ‘परिवार’ को बताए गए थे।
  • कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि बाद में दाखिल किए गए जवाब में कई नए तथ्य जोड़े गए हैं, जो प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होते हैं जैसे तथ्यों में ‘हेरफेर’ किया गया हो।

विशेष न्यायाधीश की कार्यप्रणाली पर भी उठे गंभीर सवाल

बेंच ने केवल ACB को ही नहीं, बल्कि ACB मामलों की विशेष अदालत के जज को भी आड़े हाथों लिया।

  • कोर्ट ने बताया कि 7 मई को रिमांड के समय ही महेश जोशी की ओर से गिरफ्तारी की वैधता को लेकर आपत्ति उठा दी गई थी।
  • ऐसे में विशेष न्यायाधीश का यह दायित्व बनता था कि वे उसी समय गिरफ्तारी की वैधता की जांच करते।
  • इसके उलट, जज ने उस महत्वपूर्ण आवेदन को लंबित रखा और लगभग 31 दिन बाद उसे खारिज किया, जो कि एक गंभीर चूक है।

हाईकोर्ट का कड़ा निर्देश: पुलिस-जजों को दें ट्रेनिंग बेंच ने स्पष्ट कहा है कि प्रदेश की पुलिस और न्यायिक अफसरों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के संबंध में ‘ट्रेनिंग’ दिए जाने की सख्त जरूरत है, ताकि शुरुआती स्तर पर ही संविधान के अनुच्छेद 22(1) का सही ढंग से पालन हो सके। आदेश की कॉपी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी गई है ताकि इसे मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जा सके। साथ ही, निर्देशों की पालना के लिए आदेश की प्रति ‘एसीएस होम’ (ACS Home) को भी भिजवाने के निर्देश दिए गए हैं।

Rajasthan HighCourt

याचिका क्यों हुई खारिज और रोहित जोशी का क्या था तर्क?

याचिका खारिज होने का कानूनी कारण: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जब कोई व्यक्ति पहले से ही ‘न्यायिक आदेशों’ के तहत हिरासत में हो, तब हैबियस कॉर्पस याचिका के जरिए उसकी गिरफ्तारी को अवैध घोषित नहीं किया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता के लिए यह विकल्प खुला रखा है कि वह विशेष न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश को कानून के अनुसार चुनौती दे सकता है।

क्या था परिजनों का तर्क? पूर्व मंत्री के बेटे रोहित जोशी ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि 7 मई को जब उनके पिता को गिरफ्तार कर कोर्ट में 5 दिन के पुलिस रिमांड के लिए पेश किया गया, तब नियमों की जमकर अनदेखी हुई। सुप्रीम कोर्ट के अनिवार्य दिशा-निर्देशों के तहत गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना और उसकी ‘रिसीप्ट’ (रसीद) रिमांड मांगने से पहले परिजनों या उनके वकील को नहीं दी गई। रोहित जोशी का तर्क था कि इस लिखित सूचना के अभाव में यह गिरफ्तारी पूरी तरह से गैर-कानूनी और असंवैधानिक है, इसलिए उनके पिता को तुरंत रिहा किया जाना चाहिए।

इन्फोग्राफिक एनालिसिस: आखिर क्या है JJM का पूरा मामला?

Share This Article
Leave a Comment