अरावली पर्वतमाला पर न्यायिक पहरा, राजस्थान को ₹75 हजार करोड़ के नुकसान की आशंका

जयपुर। राजस्थान के खनन क्षेत्र के सामने एक बड़ा संकट खड़ा होता दिखाई दे रहा है। प्रदेश के कुल खनिज राजस्व का लगभग 74 प्रतिशत हिस्सा देने वाले अरावली पर्वतमाला क्षेत्र में नई खदानों की मंजूरी पर रोक लगने से सरकार, उद्योग और निवेशकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो राज्य को करीब ₹75 हजार करोड़ से अधिक के आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

अरावली क्षेत्र राजस्थान के खनिज उत्पादन का प्रमुख केंद्र है। यहां जस्ता, सीसा, तांबा, संगमरमर, ग्रेनाइट, फेल्सपार, क्वार्ट्ज, डोलोमाइट और अन्य बहुमूल्य खनिजों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। प्रदेश के खनन राजस्व और निर्यात में इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है।

हाईपावर कमेटी की रिपोर्ट के बाद बढ़ी सख्ती

जानकारी के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में गठित हाईपावर कमेटी ने अरावली क्षेत्र में पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। रिपोर्ट में लगभग 9,244 खानों को संवेदनशील श्रेणी में बताया गया है। इसके बाद नई खदानों की स्वीकृति प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ा है और कई प्रस्ताव लंबित हो गए हैं।

खनन क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण आवश्यक है, लेकिन खनन गतिविधियों पर व्यापक रोक का सीधा असर राज्य की अर्थव्यवस्था और रोजगार पर पड़ सकता है।

1,175 से अधिक खदानें प्रभावित

उद्योग जगत के आंकड़ों के अनुसार, न्यायिक और प्रशासनिक प्रतिबंधों से 1,175 से अधिक खदानें प्रभावित हो सकती हैं। इनमें 120 प्रमुख खनिज पट्टे और 1,055 से अधिक गौण खनिज खदानें शामिल बताई जा रही हैं।

इन खदानों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हजारों श्रमिक कार्यरत हैं। खनन गतिविधियां धीमी पड़ने से रोजगार, परिवहन, पत्थर प्रसंस्करण, मशीनरी और संबंधित उद्योगों पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

राजस्थान के खनिज राजस्व की रीढ़ है अरावली

वित्तीय वर्ष 2024-25 में राजस्थान को खनिज क्षेत्र से लगभग ₹6,830 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ। इसमें बड़ा योगदान अरावली क्षेत्र से आया। राज्य के कुल खनिज उत्पादन में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 42 प्रतिशत और कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में हिस्सेदारी लगभग 36 प्रतिशत बताई जाती है।

प्रदेश में हर वर्ष करीब 200 मिलियन टन खनिजों का उत्पादन होता है, जिसमें अरावली क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है। यही कारण है कि नई खदानों की मंजूरी रुकने को उद्योग जगत आर्थिक गतिविधियों के लिए बड़ा झटका मान रहा है।

20 जिलों में फैला है प्रभाव

अरावली पर्वतमाला का विस्तार उदयपुर, राजसमंद, भीलवाड़ा, अजमेर, सीकर, झुंझुनूं, अलवर, जयपुर, सिरोही, पाली, नागौर और कोटपुतली-बहरोड़ सहित करीब 20 जिलों तक फैला हुआ है। इन जिलों की स्थानीय अर्थव्यवस्था में खनन उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका है।

पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन की चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली देश की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक है और पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। भूजल संरक्षण, जैव विविधता और जलवायु संतुलन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए खनन गतिविधियों के नियमन की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।

हालांकि उद्योग संगठनों का कहना है कि आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक खनन और सख्त पर्यावरणीय निगरानी के साथ विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है। उनका तर्क है कि पूर्ण प्रतिबंध की बजाय नियंत्रित और टिकाऊ खनन नीति अपनाने की जरूरत है।

राज्य सरकार और उद्योग जगत की निगाहें अब न्यायालय और संबंधित समितियों की आगामी कार्यवाही पर टिकी हैं, क्योंकि इसका सीधा असर राजस्थान के राजस्व, निवेश और रोजगार पर पड़ने वाला है।

Share This Article
Leave a Comment