PHED में ‘फाइल-फाइल’ का खेल: जोधपुर नॉर्थ का 159 करोड़ का अमृत- 2.0 प्रोजेक्ट डूबा, सवा साल तक ठेकेदार से मोलभाव का नाटक करते रहे इंजीनियर, अंत में ठेकेदार ने ही जोड़े हाथ, टेंडर निरस्त!

-तारीखों के जाल में फंसा जनता का पानी: फरवरी 2025 में खुली बिड को फरवरी 2026 तक घसीटते रहे अफसर, कभी रेट कम कराने का दिखावा तो कभी री-असेसमेंट का खेल, थक-हारकर L-1 फर्म ने कहा-‘हमारा पैसा वापस करो, हमें नहीं करना काम’

-सस्ती दर पर काम की सहमति के बाद भी अटकाया: जब ठेकेदार 160.35 करोड़ की काउंटर रेट पर राजी हो गया, तो WPI का नया पेंच फंसाकर फिर घटा दी रेट, क्या किसी चहेती फर्म को एंट्री न मिलने पर जानबूझकर लेट की गई प्रक्रिया?

-RTPP नियमों का सरेआम मजाक: वित्त समिति की लगातार बैठकों में पास होता रहा ‘लापरवाही का कन्डोन डिले’ (Delay Condonation), दूसरी कंपनियों ने पहले ही वापस खींचे कदम, अब नए टेंडर के नाम पर फिर मलाई बटोरने की तैयारी!

जोधपुर/जयपुर। जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) के इंजीनियरों की अंतहीन बैठकों, फाइलों की अंतहीन परिक्रमा और टेंडरों को कछुआ चाल से चलाने के शातिर खेल ने जोधपुर की जनता को एक बड़े संकट में डाल दिया है। केंद्र सरकार की अति-महत्वपूर्ण योजना ‘अमृत- 2.0’ के तहत जोधपुर नॉर्थ शहरी जलप्रदाय योजना के सुदृढ़ीकरण का 15,918.37 लाख रुपये (करीब 159 करोड़ रुपये) का प्रोजेक्ट पीएचईडी के ‘फाइल-फाइल’ खेलने की आदत के कारण निरस्त हो गया है।

वित्त समिति की 916वीं बैठक में जो खुलासा हुआ है, वह यह बताने के लिए काफी है कि विभाग के इंजीनियर किसी प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए नहीं, बल्कि उसे उलझाकर रखने के लिए तनख्वाह पा रहे हैं। सवा साल से अधिक समय तक निविदा की समय-सीमा (Bid Validity) को खींचने के बाद अंततः दोनों कंपनियों ने अपने हाथ खड़े कर लिए, जिसके बाद टेंडर को निरस्त करना पड़ा।

टाइमलाइन की क्रोनोलॉजी, कैसे मारा गया 159 करोड़ का प्रोजेक्ट:-

इस पूरे मामले में अफसरों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठते हैं। जरा इस टाइमलाइन पर नजर डालिए कि किस तरह एक लाइव टेंडर की हत्या की गई:

-फरवरी 2025: जोधपुर नॉर्थ के इस प्रोजेक्ट के लिए एनआईटी नंबर 13/2024-25 जारी हुई। 25 फरवरी 2025 को इसकी तकनीकी बिड खुली, जिसमें केवल 2 कंपनियों ने भाग लिया।

-अप्रैल 2025: करीब दो महीने बाद 21 अप्रैल 2025 को इसकी प्राइस बिड खोली गई। नियमों के मुताबिक इस टेंडर की वैलिडिटी 25 मई 2025 तक ही थी।

-मई 2025 (पहला मोलभाव): L-1 फर्म ‘मैसर्स विष्णु प्रकाश आर पुंगलिया लिमिटेड’ की रेट मूल लागत से 6.73% अधिक थी। स्टैंडिंग नेगोशिएशन कमेटी (SNC) ने मोलभाव कर इसे 6.23% (169.10 करोड़) पर लाया, जो कि विभाग की री-असेस रेट से 5.46% ज्यादा थी।

-जून 2025 (ठेकेदार की सहमति): विभाग ने फर्म को 160.35 करोड़ रुपये का काउंटर ऑफर दिया। 17 जून 2025 को फर्म ने लिखित में इस रेट पर काम करने की मंजूरी दे दी। यहीं पर टेंडर फाइनल हो सकता था और जोधपुर की जनता को पानी मिलना शुरू हो जाता, लेकिन खेल तो इसके बाद शुरू हुआ।

जब ठेकेदार मान गया, तो इंजीनियरों ने चला नया ‘पासा’:-

जैसे ही L-1 ठेकेदार विभाग की बताई काउंटर रेट पर काम करने को तैयार हुआ, PHED के इंजीनियरों के पेट में दर्द शुरू हो गया। जुलाई 2025 में वित्त समिति की बैठक में एक नया फरमान जारी कर दिया गया कि थोक मूल्य सूचकांक (WPI) और बाजार दरों के आधार पर इस 160.35 करोड़ की स्वीकृत रेट का फिर से री-असेसमेंट (पुनर्मूल्यांकन) किया जाए। इस नए खेल के तहत अगस्त 2025 में विभाग ने नई रेट निकालकर खड़ी कर दी 156.14 करोड़ रुपये (जो मूल एनआईटी लागत से भी 1.91% कम थी)। सितंबर 2025 में ठेकेदार को फिर से वार्ता के लिए बुलाया गया। ठेकेदार ने साफ कह दिया कि वह पूर्व में स्वीकृत 160.35 करोड़ से कम पर काम नहीं कर सकता। इसके बाद विभाग ने मामले को सुलझाने के बजाय नवंबर 2025 में एजेंडे को ही ‘डेफर’ (स्थगित) कर दिया। यानी फाइल को फिर से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

थक-हारकर ठेकेदार ने जोड़े हाथ, बोले- ‘हमारा पैसा लौटाओ’:-

इंजीनियरों के इस अंतहीन मोलभाव और रोज-रोज बदलते नियमों से तंग आकर अंततः ठेकेदारों का धैर्य जवाब दे गया। इस टेंडर में शामिल दूसरी कंपनी (मैसर्स जीसीकेसी प्रोजेक्ट्स) ने सितंबर 2025 में ही अपनी बिड वैलिडिटी बढ़ाने से इनकार कर दिया था। वहीं, मुख्य एल-1 फर्म (मैसर्स विष्णु प्रकाश आर पुंगलिया लिमिटेड) ने 14 फरवरी 2026 को विभाग को एक कड़ा पत्र लिखा। फर्म ने साफ कह दिया कि वह अब अपनी बिड की वैलिडिटी आगे नहीं बढ़ाएगी और विभाग उनकी जमा सुरक्षा राशि (Bid Security) को तुरंत रिहा करे। चूंकि दोनों ही कंपनियों की बिड वैलिडिटी खत्म हो गई, इसलिए विभाग के पास इस टेंडर को निरस्त (Annul) करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।

क्या ‘बीडिंग कैपेसिटी’ की आड़ में खेला जा रहा था कोई खेल?

हैरानी की बात यह है कि बैठक के दौरान मुख्य अभियंता (शहरी एवं एनआरडब्ल्यू) ने खुद स्वीकार किया कि एल-1 फर्म के पास काम करने की पूरी क्षमता (Bidding Capacity) थी और तकनीकी या वित्तीय योग्यता में कोई कमी नहीं थी। तो फिर किसके इशारे पर एक स्वीकृत हो चुके टेंडर को डब्ल्यूपीआई और री-असेसमेंट के चक्रव्यूह में फंसाकर सवा साल तक लटकाया गया? क्या यह जानबूझकर पैदा की गई देरी थी ताकि टेंडर निरस्त हो और नए सिरे से चहेते ठेकेदारों के लिए स्थितियां अनुकूल बनाई जा सकें?

‘कन्डोन डिले’ की आड़ में छुपती अफसरों की नाकामी:-

PHED में यह आम बात हो चुकी है कि नियमों की धज्जियां उड़ाकर महीनों की देरी की जाती है और फिर आरटीपीपी एक्ट के नियम 40(2) के तहत ‘कन्डोन डिले’ (देरी को माफ करना) का प्रस्ताव पास करवाकर अफसर अपनी चमड़ी बचा लेते हैं। जोधपुर नॉर्थ की जनता आज भी अमृत जल योजना के इंतजार में सूखी पाइपलाइनों को देख रही है, जबकि इंजीनियर फ्रेश टेंडर जारी कर फिर से करोड़ों के बजट की बंदरबांट की बिसात बिछाने में लग गए हैं। आखिर इस ‘फाइल-फाइल’ के खेल से सरकार के राजस्व और जनता के समय को जो नुकसान हुआ है, उसका हिसाब कौन देगा?

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now

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