DNA तस्करी का महाघोटाला: AIIMS के डेटा से चीन ने लिया पेटेंट, 18 राज्यों के आदिवासियों का जेनेटिक ब्लूप्रिंट चोरी

जयपुर | देश में एकेडमिक रिसर्च के नाम पर डीएनए तस्करी का एक बड़ा और संगीन मामला सामने आया है। एक विशेष पड़ताल में खुलासा हुआ है कि राजस्थान समेत 18 राज्यों के भूलने की बीमारी (डिमेंशिया) से पीड़ित आदिवासी-बुजुर्गों के ब्लड की ‘होल जीनोम सिक्वेंसिंग’ कर इसका डेटा अमेरिका के सर्वर पर ‘ओपन एक्सेस’ में डाल दिया गया। इसका सीधा फायदा चीन ने उठाया और ‘अल्जाइमर जांच किट’ बनाकर उसका कमर्शियल पेटेंट भी ले लिया है।

तस्करी के सूत्रधार और प्रोजेक्ट का सच

इस पूरे प्रकरण के मुख्य सूत्रधार दिल्ली एम्स के जेरियाट्रिक मेडिसिन डिपार्टमेंट के पूर्व हेड प्रो. एबी डे हैं। उन्होंने स्वास्थ्य मंत्रालय के ‘लॉन्गिट्यूडिनल एजिंग स्टडी इन इंडिया- डायग्नोस्टिक असेसमेंट ऑफ डिमेंशिया’ (लासी-डैड) प्रोजेक्ट के तहत 2017 से 2019 के बीच सैंपल लिए।

  • मकसद: भारत में डिमेंशिया की स्थिति समझना।
  • हकीकत: रिसर्च की आड़ में 2,762 लोगों के ब्लड की पूरी जीनोम सिक्वेंसिंग (WGS) की गई।
  • फंडिंग: इस प्रोजेक्ट को अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन एजिंग और कई अन्य विदेशी एजेंसियों ने फंड किया था।

चीन ने कैसे उठाया फायदा?

प्रो. एबी डे और उनके साथियों का रिसर्च पेपर 20 अगस्त 2020 को ‘जर्नल ऑफ द अमेरिकन जेरियाट्रिक्स सोसाइटी’ में छपा, जिसमें 2,762 भारतीयों का पूरा जेनेटिक ब्लूप्रिंट था। चूंकि एक्सेस ओपन था, चीन की सरकारी संस्था ‘चाइनीज एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज’ ने इस डेटा को मुफ्त में डाउनलोड किया और मात्र 9 माह में अल्जाइमर जांच किट तैयार कर ली।

  • पेटेंट: चीन ने 28 मई 2021 को पेटेंट फाइल किया, जो 27 जून 2025 को ग्रांट हो चुका है (पेटेंट नंबर: CN115404272A)। चीन अब इसका व्यावसायिक उत्पादन कर रहा है।

सहमति के बिना एडवांस रिसर्च का खतरा

आईसीएमआर (ICMR) गाइडलाइन के अनुसार आदिवासियों के सैंपल से पहले ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है, जो नहीं ली गई। 65% लोग अनपढ़ थे, जिनके अंगूठे लगवाए गए। अब इस डेटा का इस्तेमाल दूसरे फील्ड में हो रहा है:

  • कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी: जून 2025 में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, इन भारतीयों के डेटा में 50 हजार साल पुराने आदिमानवों के सर्वाधिक जेनेटिक अंश मिले हैं।
  • नेचर कम्युनिकेशंस: जून 2023 के रिसर्च के अनुसार, भारत में सजातीय विवाहों से दुर्लभ जेनेटिक बीमारियों का खतरा 100 गुना बढ़ा है।

जिम्मेदारों का पल्ला झाड़ना: कौन है असली नोडल एजेंसी?

संस्थानपक्ष/जवाब
ICMR (महानिदेशक डॉ. राजीव बहल)लासी-डैड का हमसे संबंध नहीं है। यह आईआईपीएस (IIPS) का प्रोजेक्ट है।
IIPS (डायरेक्टर डॉ. देवराम ए. नागदेवे)यह हमारा प्रोजेक्ट नहीं है। यह एम्स का प्रोजेक्ट है, मंजूरी उन्होंने ही ली होगी।
प्रो. एबी डे (प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर)हमारा रिसर्च पूरी तरह एकेडमिक है। चीन के पेटेंट से हमारा कोई लिंक नहीं है।
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