राजधानी के रेनवाल मांजी क्षेत्र में स्थित रोहिणी नगर योजना सरकारी उदासीनता और बुनियादी सुविधाओं के अभाव का जीता-जागता उदाहरण बन गई है। साल 2003 में करीब 1594 बीघा जमीन पर विकसित की गई इस कॉलोनी में 20 साल बीत जाने के बाद भी सन्नाटा पसरा हुआ है। स्थिति यह है कि यहाँ 3887 भूखंड आवंटित किए गए थे, लेकिन आज तक एक भी परिवार यहाँ रहने नहीं आया।
करोड़ों डकारने के बाद भी सुविधाएं शून्य
आरोप है कि संबंधित विभाग ने भूखंड आवंटन के नाम पर लोगों से करोड़ों रुपये की राशि वसूली, लेकिन बदले में जो वादे किए गए थे, वे आज तक अधूरे हैं।
- सड़कों का बुरा हाल: कॉलोनी में बनाई गई अधिकांश सड़कें उखड़ चुकी हैं। कई जगहों पर तो डामर का नामोनिशान तक नहीं बचा है।
- बिजली व्यवस्था ठप: यहाँ बिजली के करीब 300 खंभे लगाए गए थे, लेकिन देखरेख के अभाव में चोरों ने करीब 5 लाख रुपये की केबल पार कर दी। इतना ही नहीं, कई जगहों से तो ट्रांसफार्मर भी गायब हो चुके हैं।
- पानी की समस्या: कॉलोनी में पानी की पाइपलाइन तो है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ का पानी अत्यधिक फ्लोराइड युक्त है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
तीन चरणों में बंटी कॉलोनी, पर विकास कहीं नहीं
रोहिणी नगर को प्रथम, द्वितीय और तृतीय चरणों में विकसित किया गया था। उम्मीद थी कि जयपुर-भीलवाड़ा मेगा हाईवे के पास होने के कारण यहाँ तेजी से बसावट होगी। लेकिन सीवर लाइन, पक्की सड़क और सुरक्षित बिजली व्यवस्था न होने के कारण किसी भी आवंटी ने यहाँ मकान बनाने की हिम्मत नहीं जुटाई।
पर्यावरण को भी पहुंचा नुकसान
ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, कॉलोनी के विकास के समय यहाँ करीब दो हजार पेड़ लगाए गए थे। लेकिन रखरखाव न होने और अवैध कटाई के कारण आज वह क्षेत्र पूरी तरह वीरान नजर आता है। खाली पड़े भूखंडों से मिट्टी की चोरी भी धड़ल्ले से हो रही है।
आवंटियों में भारी रोष
भूखंड मालिकों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन भर की कमाई इस उम्मीद में निवेश की थी कि शहर के पास उनका अपना घर होगा। लेकिन 20 साल बाद भी वे ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच समन्वय की कमी का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।
