EXPOSE NOW रिपोर्ट: जल जीवन मिशन महाघोटाला – क्या भाजपा सरकार वाकई ‘बड़े चेहरों’ तक पहुँचना चाहती है ?

-या फिर कुछ अधिकारी-इंजीनियर्स की गिरफ्तारी के साथ इतिश्री की है तैयारी
-JJM के घोटाले में अब तक की कार्रवाई ने खड़े कर दिए हैं कई गंभीर सवाल ?

राजस्थान के बहुचर्चित 20 हजार करोड़ रुपये के ‘जल जीवन मिशन’ (JJM) घोटाले में नई सरकार की कार्रवाई अब संदेह के घेरे में है। ‘Expose Now’ के पास मौजूद पुख्ता जानकारी यह संकेत दे रही है कि जांच की आंच केवल छोटे ‘प्यादों’ तक सीमित रखी जा रही है, जबकि नीतिगत स्तर पर घोटाले के असली सूत्रधार अभी भी जांच के रडार से दूर हैं। क्या अधिकारियों को जमानत दिलाने के लिए ‘रास्ता’ बनाया जा रहा है? आइए समझते हैं इस पूरे खेल की तह को इन 5 प्रमुख बिंदुओं में:-

  1. गिरफ्तारियों में ढिलाई: क्या जांच एजेंसियां पैर खींच रही हैं?

जांच की सुस्ती को देखकर यह प्रबल संभावना लग रही है कि गिरफ्तार अधिकारियों को निकट भविष्य में आसानी से जमानत मिल सकती है। इसके पीछे कई चौंकाने वाले कारण हैं:-

गोपाल सिंह और के.सी. कुमावत को संरक्षण: सरकार राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव के चलते तत्कालीन उपशासन सचिव गोपाल सिंह और तत्कालीन एफए एण्ड सीएओ (FA & CAO) के.सी. कुमावत को गिरफ्तार ही नहीं कर रही है। इन पर कार्रवाई न होने से पूरे JJM के घोटाले में अब तक की कार्रवाई पर कई गंभीर सवालने खड़े कर दिए हैं ?

जांच की सुस्त रफ्तार: न तो गिरफ्तार लोगों से कोई ठोस पूछताछ हो रही है और न ही मुख्य अभियंता आर.के.मीणा, एसीई पारितोश गुप्ता व एसई आर.सी.मीणा जैसे अधिकारियों की गिरफ्तारी के लिए हाईकोर्ट में विशेष अनुरोध किया जा रहा है जिन्हें पहले ही अग्रिम जमानत मिल चुकी है। फरार अधिकारियों को पकड़ने के प्रयास भी केवल कागजी नजर आ रहे हैं।

प्रशासनिक दबाव: गोपाल सिंह और वित्तीय सलाहकार कुमावत जैसे अधिकारियों की गिरफ्तारी न होना विभाग के भीतर नाराजगी पैदा कर रहा है, जिसे राजनीतिक दबाव का परिणाम माना जा रहा है।

  1. शर्तों का खेल: RTPP एक्ट की अवहेलना और ‘ऊपर’ के निर्देश:-

20 हजार करोड़ के टेंडर ‘पूल’ करने के लिए राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता (RTPP) अधिनियम की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं। टेंडरों में ‘प्राइस वैरिएशन’ की शर्त हटाना और ‘साइट विजिट’ की शर्त जोड़ना, ये वो दो बड़े बदलाव थे जिन्होंने भ्रष्टाचार का दरवाजा खोला। यह मानना तर्कहीन है कि मुख्य अभियंताओं ने इतने बड़े बदलाव अकेले कर लिए। सूत्रों के मुताबिक, इसके निर्देश उच्च स्तर (मंत्रालय और CMO) से प्राप्त हुए थे। दक्षिण भारत की एक कंपनी को फायदा पहुँचाने के लिए CMO में ही रणनीति तैयार की गई थी।

  1. ईमानदारी की सजा: नागौर मुख्य अभियंता का निलंबन:-

इस घोटाले की सबसे बड़ी कड़ी नागौर के तत्कालीन मुख्य अभियंता संदीप शर्मा का निलंबन है। जिनके द्वारा पूल के खेल में शामिल नहीं होकर नियमों की पालना करना उनका गुनाह बना दिया और इसी गुनाह के लिए उन्हें पहले एपीओ और फिर सस्पेंड करने की सजा दी गई थी। नागौर के अभियंता ने RTPP नियमों के तहत 180 करोड़ लागत की 2 निविदाएं निकालीं और रेट जस्टिफिकेशन 8-9% रखा, जबकि अन्य जगहों पर यह 30-40% अधिक था। जब उन्होंने शर्तों के साथ छेड़छाड़ और ऊंची दरों को मंजूरी देने से इनकार किया, तो उन्हें निलंबित कर दिया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री, तत्कालीन मंत्री महेश जोशी, तत्कालीन ACS सुबोध अग्रवाल और तत्कालीन प्रमुख सचिव(CM) कुलदीप रांका के लिखित या मौखिक निर्देश के बिना संभव ही नहीं था।

IT विभाग में बंद लिफाफे: कम दरों वाले टेंडर के लिफाफे आज भी IT विभाग में बंद पड़े हैं। ACB इन लिफाफों को खोलने के लिए कोर्ट क्यों नहीं जा रही? यह एक बड़ा सवाल है।

  1. CMO और CMR का कनेक्शन: पूछताछ से क्यों बच रही ACB?

जांच का असली रुख तभी स्पष्ट होगा जब तत्कालीन प्रभावशाली हस्तियों से आमने-सामने बिठाकर पूछताछ होगी। क्या एसीबी तत्कालीन पीएचईडी मंत्री महेश जोशी, तत्कालीन एसीएस पीएचईडी सुबोध अग्रवाल, तत्कालीन प्रमुख सचिव, मुख्यमंत्री कुलदीप रांका और तत्कालीन पीएचईडी मुख्य अभियंताओं को आमने-सामने बिठाकर पूछताछ करेगी? यदि एसीबी आमने-सामने बिठाकर पूछताछ करें तो राजस्थान में जेजेएम के सबसे बड़े घोटालों का पर्दाफाश हो जाएगा। कई अतिरिक्त मुख्य अभियंताओं ने मौखिक निर्देशों पर फाइलें पास कीं। यदि इन अधिकारियों से गहन पूछताछ हो, तो पूर्व मंत्री महेश जोशी और तत्कालीन उच्चाधिकारियों की भूमिका स्पष्ट हो सकती है।

  1. सुबोध अग्रवाल और वित्त समिति की भूमिका:-

इन पूल की गई ऊंची दरों को सुबोध अग्रवाल की अध्यक्षता वाली वित्त समिति ने अनुमोदित किया था। यदि केंद्र सरकार की शर्त नहीं होती कि BSR से ऊंची दरों का अनुमोदन मुख्य सचिव से कराना अनिवार्य है, तो यह घोटाला बिना किसी रोक-टोक के परवान चढ़ जाता।

  1. वित्त विभाग का ‘दोहरा खेल’ और मुख्य सचिव की आपत्ति:-

घोटाले की जड़ें तत्कालीन वित्त विभाग (जो स्वयं मुख्यमंत्री के पास था) तक भी जाती हैं। वित्त विभाग ने पहले तो उन ऊंची दरों पर सहमति दे दी थी। लेकिन जब तत्कालीन मुख्य सचिव ऊषा शर्मा ने मीडिया रिपोर्टों के बाद हस्ताक्षर करने से मना कर दिया, तो वित्त विभाग ने रास्ता बदलते हुए टेंडर विभाग को लौटा दिए। अंत में वित्त विभाग ने टेंडर यह कहकर लौटा दिए कि 10% ऊपर तक कार्य आदेश दे दें या दोबारा निविदा करें। सवाल यह है कि नियम विरुद्ध शर्तों वाले टेंडर को रद्द करने के बजाय 10% की रियायत देकर अनुमोदित करने का निर्देश ही क्यों दिया गया?

गिरफ्तार एक अधिकारी की पारिवारिक त्रासदी (पत्नी की मृत्यु) भी इस मामले में एक मोड़ हो सकती है। यदि उस अधिकारी को विश्वास में लेकर रिकॉर्ड पर पूछताछ की जाए, तो ‘शर्तों के खेल’ की पूरी सच्चाई सामने आ सकती है।

Expose Now पूछता है कि क्या भजनलाल सरकार इन कड़ियों को जोड़कर असली दोषियों को जेल भेजेगी, या फिर यह जांच भी समय के साथ फाइलों में दबकर रह जाएगी?

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