-कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज की पोल खुली, 18 में से 11 विषयों में सन्नाटा, कृषि में 1104 की जगह सिर्फ 49 पास, क्या सिर्फ कागजी डिग्री बांट रहे हैं उच्च शिक्षण संस्थान?
-आने वाली पीढ़ी का भविष्य कैसे संवरेगा? जो खुद न्यूनतम 40% लाने में नाकाम हैं, वे स्कूलों में बच्चों को क्या पढ़ाएंगे, कोचिंग और रट्टा मार प्रणाली पर बड़ा तमाचा!
जयपुर। राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की स्कूल व्याख्याता भर्ती परीक्षा के ताजा आंकड़ों ने न केवल भर्ती प्रणाली, बल्कि पूरे प्रदेश के उच्च शिक्षा तंत्र के खोखलेपन को बेनकाब कर दिया है। सवाल यह नहीं है कि 40% की बाध्यता क्यों रखी गई, बल्कि सबसे बड़ा और कड़वा सवाल यह है कि मास्टर डिग्री (PG) और बीएड जैसी उच्चतम योग्यता हासिल करने के बाद भी हमारे युवा अपने ही विषय में महज 40% अंक क्यों नहीं ला पा रहे हैं? यह परिणाम केवल एक परीक्षा का फेलियर नहीं है, बल्कि उस पूरी यूनिवर्सिटी प्रणाली, प्राइवेट डिग्री कॉलेजों और कोचिंग माफिया के मुंह पर तमाचा है जो हर साल लाखों की तादाद में डिग्रीधारी तो तैयार कर रहे हैं, लेकिन बुनियादी समझ और गुणवत्ता देने में पूरी तरह नाकाम हैं।
आंकड़ों ने खोली शिक्षा के स्तर की पोल:
-कृषि (Agriculture): 552 पदों पर 1104 अभ्यर्थी पास होने थे, लेकिन पीजी पास अभ्यर्थियों में से मात्र 49 युवा ही 40% का न्यूनतम स्तर छू पाए। 503 पद खाली रह गए।
-भौतिक विज्ञान (Physics): 136 पदों के मुकाबले सिर्फ 24 अभ्यर्थी न्यूनतम पात्रता पा सके।
-कॉमर्स व अन्य विषय: 600 पदों पर मात्र 323 पास हुए, जबकि अर्थशास्त्र में 47 पदों पर 8 और समाजशास्त्र में 34 पर सिर्फ 6 अभ्यर्थी ही 40% अंक ला सके।
शिक्षा तंत्र से सीधे और तीखे सवाल:-
क्या यूनिवर्सिटीज सिर्फ डिग्री बांटने की फैक्ट्री बन चुकी हैं? जिस अभ्यर्थी ने अपने विषय में 3 साल ग्रेजुएशन और 2 साल पोस्ट ग्रेजुएशन की हो, वह अपने ही विषय के बेसिक कॉम्पिटिटिव पेपर में 40% अंक क्यों नहीं ला पा रहा? क्या कॉलेजों में पढ़ाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हो रही है?
रट्टा मार पढ़ाई और ‘वन वीक सीरीज’ का दुष्परिणाम:-
कॉलेजों में वन-वीक सीरीज पढ़कर 60-70% अंक हासिल करने वाले युवा जब कॉम्पिटिशन के स्तरीय पेपर के सामने बैठते हैं, तो उनकी असलियत सामने आ जाती है। यह साबित करता है कि बुनियादी कॉन्सेप्ट पूरी तरह गायब हैं।
सरकारी स्कूलों के बच्चों के भविष्य का क्या?
यदि 40% से भी कम अंक लाने वालों को केवल पद भरने के नाम पर शिक्षक बना दिया जाए, तो वे सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब और ग्रामीण बच्चों को क्या पढ़ाएंगे? क्या शिक्षक बनने के लिए 40% की न्यूनतम समझ भी ज्यादा है?
जरूरत है उच्च शिक्षा में बड़े सुधार की:-
यह परिणाम प्रदेश के शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के लिए एक वेक-अप कॉल है। परीक्षा के नियमों को दोष देने से पहले इस बात पर आत्ममंथन करना होगा कि हमारी यूनिवर्सिटीज और डिग्री कॉलेज किस गुणवत्ता के युवा तैयार कर रहे हैं। जब तक उच्च शिक्षा में गुणवत्ता, प्रैक्टिकल ज्ञान और शोध पर जोर नहीं दिया जाएगा, तब तक ऐसे ही डिग्रियों के ढेर लगेंगे और काबिलियत के नाम पर सीटें खाली रहेंगी।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now