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“पुलिस जांचकर्ता है, जज नहीं”: राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला—शक के आधार पर पूरा बैंक खाता फ्रीज करना गैर-कानूनी, मजिस्ट्रेट का आदेश हुआ अनिवार्य

Expose Now Desk
Published: January 19, 2026
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जयपुर/जोधपुर। साइबर अपराधों (Cyber Crimes) की जांच के नाम पर पुलिस द्वारा मनमाने तरीके से बैंक खाते फ्रीज (Debit Freeze) करने और युवाओं को गिरफ्तार करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर राजस्थान हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक रोक लगा दी है। कोर्ट ने अपने एक विस्तृत फैसले में पुलिस को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि “पुलिस केवल जांच एजेंसी है, उसे जज (न्यायाधीश) की भूमिका निभाने का कोई अधिकार नहीं है।”

जस्टिस अशोक कुमार जैन की पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि अब पुलिस बिना न्यायिक मजिस्ट्रेट (Magistrate) के आदेश के किसी भी नागरिक का बैंक खाता फ्रीज नहीं कर सकती।

क्या था पूरा मामला? (Case Background)

यह फैसला दो अलग-अलग जमानत याचिकाओं—धर्मेंद्र चावड़ा बनाम राज्य और विक्रम सिंह बनाम राज्य—पर सुनवाई करते हुए आया।

  1. मामला 1: पुलिस ने एक युवक को केवल मोबाइल फोन की तलाशी के आधार पर साइबर अपराधी मान लिया और गिरफ्तार कर लिया।
  2. मामला 2: एक बैंक खाते का उपयोग कथित साइबर ठगी के लिए किया गया था, जिसके आधार पर खाते को फ्रीज किया गया।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इन दोनों ही मामलों में कोई भी असली पीड़ित (Victim) सामने नहीं आया था। न ही किसी ने ठगी की शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने अपनी मर्जी से (Suo-moto) कार्रवाई की थी।

हाईकोर्ट की 5 बड़ी और सख्त टिप्पणियां

फैसला सुनाते हुए जस्टिस अशोक कुमार जैन ने पुलिस की कार्यप्रणाली और नागरिकों के अधिकारों पर बेहद गंभीर टिप्पणियां कीं:

1. “पूरा खाता फ्रीज करना आजीविका छीनने जैसा” कोर्ट ने कहा कि अगर किसी खाते में 1 लाख रुपये हैं और विवादित (संदिग्ध) राशि केवल 5,000 रुपये है, तो पुलिस पूरे खाते को फ्रीज कर देती है। यह पूरी तरह “असंवैधानिक” है। यह संविधान के अनुच्छेद 19 (व्यापार करने का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन जीने का अधिकार) का उल्लंघन है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि केवल विवादित राशि पर ही ‘लियन’ (Lien/Hold) लगाया जाना चाहिए, बाकी खाते को चालू रखना होगा।

2. “हर डिजिटल लेन-देन अपराध नहीं” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डिजिटल युग में हर ट्रांजैक्शन को शक की निगाह से नहीं देखा जा सकता। पुलिस बिना ठोस सबूत के किसी भी व्यापारी या नागरिक को अपराधी नहीं मान सकती।

3. पुलिस के आंकड़ों पर सवाल: “80% केस पुलिस ने खुद बनाए” हाईकोर्ट ने आंकड़ों का हवाला देते हुए पुलिसिया कार्रवाई की पोल खोल दी। कोर्ट ने बताया कि वर्ष 2025 में साइबर अपराध से जुड़े 100 से अधिक मामले केवल जमानत के लिए उनके पास आए।

  • इनमें से 80% मामलों में एफआईआर पुलिस ने खुद दर्ज की थी, कोई शिकायतकर्ता नहीं था।
  • 90% आरोपी युवा थे (उम्र 18 से 30 वर्ष), जो पहली बार किसी अपराध में नामजद हुए।
  • ये युवा अधिकतर बेरोजगार या कम आय वाले परिवारों से थे, जिनका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था।

4. “न्याय के नाम पर प्रक्रिया का दुरुपयोग” अदालत ने पुलिस की इस कार्रवाई को “न्याय के नाम पर कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” (Abuse of process of law) करार दिया। कोर्ट ने कहा कि युवाओं को बिना ठोस आधार के जेल भेजना उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ है।

5. CrPC धारा 102 का उल्लंघन कोर्ट ने कहा कि कानून के मुताबिक, अगर पुलिस कोई संपत्ति (बैंक खाता) जब्त या फ्रीज करती है, तो उसे CrPC की धारा 102(3) के तहत तुरंत संबंधित मजिस्ट्रेट को सूचना देनी होती है। लेकिन पुलिस इसका पालन नहीं कर रही थी और खुद ही ‘जज’ बनकर खाते बंद कर रही थी।

अब पुलिस को मानने होंगे ये नए नियम (Guidelines)

राजस्थान हाईकोर्ट ने भविष्य के लिए सख्त गाइडलाइन जारी की है:

  • मजिस्ट्रेट की अनुमति अनिवार्य: खाता फ्रीज करने से पहले या तुरंत बाद पुलिस को मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट करना होगा और अनुमति लेनी होगी।
  • केवल विवादित राशि होल्ड होगी: पूरे खाते को फ्रीज नहीं किया जाएगा। केवल संदिग्ध राशि (Disputed Amount) को ही रोका जाएगा।
  • कारण बताना होगा: खाताधारक को बिना नोटिस या कारण बताए खाता फ्रीज करना अवैध होगा।
  • अंतिम उपाय: बैंक खाता फ्रीज करना पुलिस का पहला कदम नहीं, बल्कि ‘अंतिम उपाय’ (Last Resort) होना चाहिए।
  • पोर्टल प्रोटोकॉल: पुलिस को अनिवार्य रूप से NCRP (National Cyber Crime Reporting Portal) और CFCFRMS प्रणाली का पालन करना होगा।

अन्य हाईकोर्ट्स का दिया हवाला

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट, बॉम्बे हाईकोर्ट और केरल हाईकोर्ट के पुराने फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें यह कहा गया है कि “राज्य की शक्ति असीमित नहीं है” और इसे नागरिकों के मौलिक अधिकारों के साथ संतुलन बनाकर ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

यह फैसला प्रदेश के हजारों व्यापारियों, दुकानदारों और छात्रों के लिए बड़ी राहत है, जिनके खाते छोटी-मोटी संदिग्ध ट्रांजेक्शन की वजह से महीनों तक जाम रहते थे।


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