राजस्थान: सरकारी अस्पतालों में बाहर की दवा लिखने पर डॉक्टरों की खैर नहीं, ‘नियम 17’ के तहत होगी सख्त कार्रवाई

जयपुर, राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों के लिए बड़ी राहत की खबर है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने आदेश जारी किए हैं कि अब राजकीय चिकित्सा संस्थानों में आने वाले रोगियों को डॉक्टर किसी भी स्थिति में बाहर की दवा (Prescription from private shops) नहीं लिखेंगे। विभाग ने साफ किया है कि इस आदेश का उल्लंघन करने वाले चिकित्सकों के खिलाफ राजस्थान सेवा नियम 1958 के नियम 17 के तहत कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

‘अन्नदाता से लेकर आमजन’ तक के लिए मुफ्त इलाज की प्रतिबद्धता

मुख्यमंत्री निःशुल्क निरोभी राजस्थान योजना के तहत प्रदेश के सभी निवासियों को राजकीय अस्पतालों में शत-प्रतिशत दवाइयां और जांचें निःशुल्क उपलब्ध कराने का प्रावधान है। इसके लिए विभाग ने एक विस्तृत आवश्यक दवा सूची (Essential Drug List – EDL) तैयार की है, जिसमें जीवनरक्षक दवाओं सहित सभी महत्वपूर्ण औषधियां शामिल हैं।

दवा उपलब्ध न होने पर ‘लोकल परचेज’ का नियम

अक्सर यह देखा गया है कि कुछ दवाओं के स्टॉक में न होने का बहाना बनाकर मरीजों को बाहर की महंगी दवाएं लिखी जाती हैं। सरकार ने इस समस्या का समाधान पहले ही कर रखा है:

  • यदि EDL में शामिल कोई दवा अस्पताल में उपलब्ध नहीं है, तो संस्थान को उसे लोकल परचेज (स्थानीय खरीद) के जरिए मंगवाकर मरीज को निःशुल्क देनी होगी।
  • मरीजों को अपनी जेब से दवा खरीदने के लिए मजबूर करना योजना के मूल उद्देश्यों के खिलाफ माना जाएगा।

क्यों सख्त हुआ प्रशासन?

चिकित्सा विभाग के संज्ञान में आया है कि कई संस्थानों में प्रावधान होने के बावजूद मरीजों को बाहर की दवाएं लिखकर दी जा रही हैं। यह न केवल गंभीर वित्तीय अनियमितता है, बल्कि राज्य सरकार की फ्लैगशिप योजना की छवि को भी धूमिल करता है। इसी को देखते हुए विभाग ने अब सीधे नियम 17 के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी है, जिसके तहत दोषी चिकित्सक की वेतन वृद्धि रोकना, निंदा या अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

क्या है मुख्यमंत्री निःशुल्क निरोगी राजस्थान योजना?

यह योजना राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ है। इसके तहत वर्तमान में मेडिकल कॉलेजों से लेकर उप-स्वास्थ्य केंद्रों तक हज़ारों प्रकार की दवाएं, सर्जिकल्स और सूचर्स निःशुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं। सरकार का लक्ष्य है कि किसी भी मरीज को इलाज के लिए ‘आउट ऑफ पॉकेट’ (जेब से) खर्च न करना पड़े।

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