- रंगदारी, अवैध खनन और वर्चस्व की लड़ाई, शेखावाटी से मारवाड़ तक फैला गैंगस्टर-सिंडिकेट का जाल
- हार्डकोर अपराधियों पर शिकंजा कसने के दावों के बीच अदालती फाइलों में उलझीं केस डायरियां, कई मुकदमों में जांच लंबित
जयपुर। “पधारो म्हारे देश…” — ये महज़ चार शब्द नहीं, बल्कि राजस्थान की उस ऐतिहासिक पहचान की रूह हैं, जिसने सदियों से दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर खींचा है। मेहमाननवाज़ी, रजवाड़ी शान, लोक संगीत की मधुर तान और ‘अतिथि देवो भव:’ का संस्कार। लेकिन, क्या आपको अहसास है कि इसी मरुधरा की रंगीन फ़िज़ाओं में अब बारूद की बू घुलने लगी है? जिस धरती को कभी शांति, आतिथ्य और संस्कृति की मिसाल माना जाता था, वहां अब सड़कों पर दिन-दहाड़े गोलियों की गूंज सुनाई देने लगी है।
उत्तर प्रदेश और बिहार के उन दौरों की कहानियां तो सबने सुनी हैं, जहां सड़कों पर वर्चस्व की जंग लड़ा करती थी। लेकिन ‘Expose Now’ की इस विशेष पड़ताल और सरकारी दस्तावेजों से मिले चौंकाने वाले तथ्यों पर नज़र डालें, तो एक खौफ़नाक सच सामने आता है—राजस्थान में गैंगवार और संगठित अपराध (Organized Crime) बेहद तेज़ी से अपनी जड़ें जमा रहा है।
कागज़ों में दर्ज 36 महीनों का खौफ़नाक ब्योरा:-
सरकारी रिकॉर्ड और आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 1 जनवरी 2023 से 30 जनवरी 2026 के बीच प्रदेश में गैंगवार की कुल 12 बड़ी घटनाएं घटित हुईं, जिनमें 7 लोगों की जान चली गई। यह आंकड़ा सिर्फ कागज़ी दर्ज मामलों का है, लेकिन इसके पीछे छिपा खौफ़ पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था की पोल खोलता है:
-झुंझुनूं और सीकर बेल्ट (अपराध का नया हॉटस्पॉट): झुंझुनूं के कोतवाली और गोठड़ा थानों में गैंगवार की ऐसी वारदातें सामने आईं जहाँ दर्जनों राउंड फायरिंग हुई। गोठड़ा क्षेत्र में 2025 में हुई ताबड़तोड़ फायरिंग और हत्या की वारदातों ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी, जिसमें सुनील कुमार और कृष्णकांत को अपनी जान गंवानी पड़ी।
-फलोदी (लोहावट में वर्चस्व की जंग): फलोदी के लोहावट थाना क्षेत्र में ही गैंगवार के 4 अलग-अलग मुकदमे दर्ज हुए। यहां बिश्नोई और स्थानीय गिरोहों के बीच गोलियों का दौर चला, जहाँ कई नामजद अपराधी वारदात के बाद फरार हो गए और उन पर इनाम घोषित करना पड़ा।
-हाई-प्रोफाइल मर्डर: जयपुर के श्याम नगर में राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के अध्यक्ष सुखदेव सिंह गोगामेड़ी की दिन-दहाड़े गोली मारकर हत्या किए जाने की घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। इस हत्याकांड में हरियाणा, दिल्ली और स्थानीय शूटरों के गठजोड़ का पर्दाफाश हुआ
शांतिप्रिय मरुधरा में कैसे पनपा ‘गैंगस्टर कल्चर’?
आखिर ऐसा क्या हुआ कि हवेलियों और किलों के इस प्रदेश में ‘रंगदारी’, ‘कॉन्ट्रैक्ट किलिंग’ और ‘सुपारी किलिंग’ जैसे शब्द आम बोलचाल का हिस्सा बन गए? जानकारों की मानें तो राजस्थान की भौगोलिक स्थिति और पड़ोसी राज्यों (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और गुजरात) से लगती सीमाएं अपराधियों के लिए सबसे मुफीद सेफ़-हाउस साबित हो रही हैं। बाहरी राज्यों के खूंखार गैंग्स ने अब राजस्थान को अपना नया अड्डा बना लिया है। एलीट क्राइम सिंडिकेट्स ने यहां के स्थानीय युवाओं को रातों-रात अमीर बनने और सोशल मीडिया पर ‘भौकाल’ जमाने का झांसा देकर अपने जाल में फंसाया है। डिजिटल युग में अब गोलियाँ सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं चलतीं, बल्कि उनकी धमक सोशल मीडिया रील और लाइव स्ट्रीमिंग में सुनाई देती है। वारदात के बाद जिम्मेदारी लेने का यह नया ‘ब्रांडिंग ट्रेंड’ युवाओं के भीतर अपराध का ग्लैमर घोल रहा है।
95 से ज़्यादा आरोपी और 24 फरार ‘सुपारी किलर’:-
आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, इन 12 गैंगवार घटनाओं में शामिल कुल 95 आरोपियों को पुलिस गिरफ्तार कर चालान पेश कर चुकी है, जबकि 24 से अधिक नामजद आरोपी अभी भी फरार चल रहे हैं या जांच लंबित है। जांच में यह भी सामने आया है कि अब वारदातों का तरीका बदल चुका है। देशी कट्टों की जगह विदेशी ऑटोमैटिक हथियारों ने ले ली है। हरियाणा के यमुनानगर, हिसार और यूपी के सहारनपुर जैसे इलाकों से शार्पशूटर्स किराए पर लाए जाते हैं, जो घटना को अंजाम देकर स्थानीय नेटवर्क की मदद से अंडरग्राउंड हो जाते हैं।
क्या बेबस है कानून-व्यवस्था?
जब सड़कों पर गश्त लगाती गाड़ियों के हूटर की आवाज़ गोलियों की तड़तड़ाहट के आगे धीमी पड़ने लगे, तो सवाल प्रशासन की नीयत और नीति दोनों पर उठते हैं। हालांकि, स्थिति से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर कुछ कदम उठाने के दावे किए जा रहे हैं:
-एंटी-गैंगस्टर टास्क फोर्स (AGTF): संगठित गिरोहों का खात्मा करने के लिए 79 विशेष पदों के सृजन के साथ AGTF का गठन किया गया।
-जिला विशेष टीम (DST): हर जिले में संगठित अपराधियों और भू-माफिया, बजरी माफिया, ड्रग्स माफिया पर लगाम लगाने के लिए DST टीमों को तैनात किया गया है।
-केस ऑफिसर स्कीम: गैंगवार के गंभीर मामलों को केस ऑफिसर स्कीम में लेकर विशेष पैरवी के ज़रिए जल्द से जल्द कठोर सजा दिलाने का प्रयास किया जा रहा है।
लेकिन इसके बावजूद, ज़मीनी हकीकत यह है कि जब तक इन गैंग्स के आर्थिक नेटवर्क और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंस को नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक यह दीमक फैलती रहेगी।
चुनौती सिर्फ़ कानून की नहीं, साख की भी है:-
यह सिर्फ़ एक लॉ एंड ऑर्डर की समस्या नहीं है। यह मुद्दा राजस्थान के उस ‘विश्वास’ का है, जो उसने सदियों में कमाया है। अगर ‘पधारो म्हारे देश’ की छवि पर बारूद का धुआँ हावी होने लगा, तो इसका सीधा असर राज्य के पर्यटन, निवेश और आम जनजीवन के सुकून पर पड़ेगा। समय रहते अगर इस नासूर का इलाज नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी कि एक दौर था जब यह राज्य अपनी आवभगत के लिए जाना जाता था, न कि सड़कों पर बहते खून और गोलियों के शोर के लिए।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now
