महाघोटाला Expose: रीको में 150 करोड़ की सरकारी जमीन ‘हड़पने’ की साजिश नाकाम, अफसरों के सिंडिकेट का पर्दाफाश!

भ्रष्टाचार का नया मॉडल, एमनेस्टी स्कीम की आड़ में खेल

जयपुर/भिवाड़ी। राजस्थान औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम (RIICO) में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका एक सनसनीखेज उदाहरण सामने आया है। भिवाड़ी के खुशखेड़ा में करीब 150 करोड़ रुपये की बेशकीमती औद्योगिक जमीन को एक डिफॉल्टर कंपनी को पिछले दरवाजे से लौटाने का बड़ा खेल रचा गया था। लेकिन ऐन वक्त पर शिकायत मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) और ACB तक पहुंचने के बाद हड़कंप मच गया और रीको प्रबंधन को अपने कदम पीछे खींचने पड़े।

जमीन की कीमत बढ़ी तो शुरू हुआ खेल:-

-जमीन का सौदा: 69,130 वर्गमीटर का विशाल प्लॉट (SP-E2/2, खुशखेड़ा)

-पुरानी रेवड़ी: 1993 में महज 20 प्रति वर्गमीटर की दर पर आवंटन

-30 साल का सन्नाटा: तीन दशक तक जमीन पर एक ईंट नहीं लगी, न उद्योग लगा न रोजगार मिला

-मास्टर स्ट्रोक: नियमों को ताक पर रखकर ‘एमनेस्टी स्कीम’ के जरिए 150 करोड़ रुपये की जमीन वापस उसी कंपनी को सौंपने की तैयारी

-अंतिम परिणाम: भारी दबाव के बाद रीको चेयरमैन ने 4 मई 2026 को आवंटन बहाली की अपील खारिज की

नियमों की बलि, कैसे रचा गया 150 करोड़ का चक्रव्यूह?

  1. 30 साल तक ‘लैंड बैंकिंग’ का खेल:-

थापर कॉन्कास्ट लिमिटेड को यह जमीन 1993 में औद्योगिक विकास के लिए दी गई थी। कंपनी ने उद्योग लगाने के बजाय इसे ‘लैंड बैंक’ की तरह इस्तेमाल किया। जब जमीन की कीमत कौड़ियों से बढ़कर 150 करोड़ रुपये हो गई, तो इसे बचाने के लिए कानूनी दांव-पेंच का सहारा लिया गया।

  1. अफसरों का ‘प्रशासनिक संरक्षण’:-

हैरानी की बात यह है कि जो प्लॉट शर्त पूरी न होने पर सालों पहले रद्द हो जाना चाहिए था, उसे रीको के अधिकारियों ने फाइलों में जिंदा रखा। मई 2023 में आवंटन रद्द होने के बावजूद, भीतरखाने ऐसे रास्ते बनाए गए जिससे कंपनी को ‘चेयरमैन स्तर’ पर दोबारा सुनवाई का मौका मिल सके।

  1. एमनेस्टी स्कीम का गलत इस्तेमाल:-

भ्रष्ट तंत्र ने डिफॉल्टर कंपनी को “एमनेस्टी स्कीम-2023” का लाभ दिलाने की पूरी सेटिंग कर ली थी। मकसद साफ था—करोड़ों की जमीन को मामूली शुल्क लेकर दोबारा उसी कंपनी को सौंप देना जिसने 30 साल तक सरकार को धोखा दिया।

‘Expose Now’ का बड़ा खुलासा, रातों-रात बदले गए आदेश:-

जैसे ही इस घोटाले की गुप्त फाइलें और सबूत सार्वजनिक हुए और जांच की आंच बड़े अधिकारियों तक पहुंचने लगी, रीको मुख्यालय में हड़कंप मच गया। मामला ACB और मुख्यमंत्री के संज्ञान में आते ही अधिकारियों ने खुद को बचाने के लिए यू-टर्न ले लिया। रीको चेयरमैन ने अपने ताजा आदेश में स्पष्ट कर दिया कि कंपनी ने 30 साल तक केवल समय बर्बाद किया है और मुकदमेबाजी की आड़ में जमीन दबाए रखना अवैध है। यह आदेश साबित करता है कि अगर मामला तूल नहीं पकड़ता, तो मिलीभगत से यह जमीन कंपनी की झोली में जा चुकी होती।

तीखे सवाल: जवाबदेही किसकी?

-कठघरे में अफसर: उन अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी जिन्होंने निरस्त प्लॉट को दोबारा बहाल करने की फाइलें तैयार कीं?

-लैंड माफिया कनेक्शन: रीको में ऐसे और कितने प्लॉट हैं जो उद्योग के नाम पर आवंटित हुए लेकिन आज वहां केवल प्रॉपर्टी डीलिंग का खेल चल रहा है?

संपादकीय टिप्पणी:
यह मामला केवल एक भूखंड का नहीं, बल्कि सरकारी संपत्तियों की लूट के उस मॉडल का है जो ‘अफसरशाही और रसूखदारों’ के मेलजोल से चलता है। 150 करोड़ रुपये की इस जमीन का बचना उन ईमानदार उद्यमियों की जीत है जो जमीन के लिए सालों इंतजार करते हैं, जबकि डिफॉल्टरों को रेड कारपेट बिछाकर बुलाया जाता है।

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