इंदिरा गांधी नहर परियोजना में करोड़ों की धांधली: सस्ता टेंडर रद्द कर महंगे में दिया, सरकार को लगा 33.95 करोड़ का चूना

बीकानेर: राजस्थान की लाइफलाइन कही जाने वाली इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) में करोड़ों रुपये के ‘अंधेरगर्दी’ का मामला सामने आया है। महालेखाकार कार्यालय की हालिया ऑडिट रिपोर्ट ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘Expose Now’ की पड़ताल और ऑडिट के निष्कर्ष बताते हैं कि कैसे नियमों को मरोड़कर चहेती कंपनियों को फायदा पहुँचाया गया और सरकारी खजाने को करोड़ों का घाटा दिया गया।

यह ऑडिट अप्रैल 2022 से मार्च 2025 के बीच हुए कार्यों पर आधारित है, जिसकी कमान सहायक लेखा परीक्षा अधिकारी रमेशचंद्र महावर, प्रवीण तंवर और बसंत बल्लभ पंडा की कमेटी के पास थी।

खेल टेंडरों का: सस्ते को नकारा, महंगे को अपनाया

परियोजना के तहत 216.60 करोड़ के बजट के साथ डिग्गियों (तालाब) के निर्माण का काम शुरू हुआ था।

  • सस्ता टेंडर रद्द: मैसर्स एलसी इंफ्रा ने 9.63% कम दर पर करीब 193.75 करोड़ में काम का जिम्मा लिया था और 136 डिग्गियां बना भी ली थीं।
  • बहाना ‘बजट की कमी’ का: मई 2022 में विभाग ने बजट की कमी का हवाला देकर शेष काम का टेंडर रद्द कर दिया।
  • असली सच: ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, कोलायत खंड में उस समय 790 करोड़ से अधिक का बजट उपलब्ध था, जिसमें से खर्च के बाद भी 403 करोड़ शेष थे।
  • 33.95 करोड़ का चूना: महज 9 महीने बाद वही काम मैसर्स गोपी कृष्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को ऊँची दरों पर दे दिया गया, जिससे सरकार को सीधा 33.95 करोड़ का अतिरिक्त भार सहना पड़ा।

धांधली नंबर- 1 : सस्ते को नकारा, महंगे को अपनाया, 33.95 करोड़ का नुकसान हुआ

  • इंदिरा गांधी नहर परियोजना के लिए 216.60 करोड़ रुपए का बजट स्वीकृत हुआ था।
  • इसके बाद टेंडर के जरिए 214.40 करोड़ रुपए का वर्क ऑर्डर जारी हुआ था।
  • मैसर्स एलसी इंफ्रा कंपनी ने 9.63% कम दर पर करीब 193.75 करोड़ में यह टेंडर किया।
  • कंपनी को 48 हजार 133 हेक्टेयर क्षेत्र में कुल 249 डिग्गियों (तालाब) का निर्माण करना था।
  • कंपनी 136 डिग्गियां बना चुकी थी। तभी 4 मई 2022 में ‘बजट की कमी’ बताकर शेष काम का टेंडर रद्द कर दिया गया।
  • इसके 9 महीने बाद उसी काम का ठेका दूसरी कंपनी मैसर्स गोपी कृष्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को अधिक दर पर दे दिया गया। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, इससे सरकार पर 33.95 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ा।

चीफ इंजीनियर का तर्क- केंद्र ने पैसा रोका: “इस योजना में केंद्र और राज्य सरकार की 50-50 पार्टनरशिप थी। वर्क ऑर्डर के कुछ समय बाद ही केंद्र ने CADWM को बंद कर दिया था। इसके बाद एक भी पैसा योजना में नहीं दिया। इसलिए स्टेट ने आधे पैसे होते ही काम को रुकवा दिया था। बाद में राज्य सरकार ने फैसला लिया कि बचा आधा काम भी करवाया जाएगा। अब आधे काम के लिए नया टेंडर करना था, उसमें तो ज्यादा रेट आनी ही थी।” — विवेक गोयल, चीफ इंजीनियर

विवेक गोयल, चीफ इंजीनियर IGNP

Expose Now पड़ताल- विभाग के पास पड़े थे 700 करोड़ से ज्यादा: विभाग ने बजट की कमी का हवाला दिया, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार सैकड़ों करोड़ रुपए उपलब्ध थे। महालेखाकार ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट में साफ टिप्पणी की है कि कोलायत खंड अभियंता के पास वर्ष 2020-21 में 790 करोड़ 73 लाख 35 हजार रुपए का बजट उपलब्ध था। वर्ष 2021-22 में खर्च के बाद भी 403 करोड़ 51 लाख 79 हजार रुपए शेष बचे थे। इसके बावजूद टेंडर रद्द किया गया। अगर बजट की कोई कमी थी तो इस संबंध में केंद्र से कोई पत्राचार तक नहीं किया गया।


धांधली नंबर- 2 : नियमों की ‘बलि’ और 8.32 करोड़ का एक्स्ट्रा तोहफा

  • मैसर्स एलसी इंफ्रा कंपनी को 214.40 करोड़ का ठेका 9.63% कम दर पर दिया गया था। नियमानुसार उसे भुगतान करते समय उतनी कटौती होनी थी।
  • शुरुआती 14 बिल तक तो नियम लागू रहा।
  • बाद के 20 बिलों में कटौती घटाकर 0.891% कर दी गई।
  • इस बदलाव से ठेकेदार को 8.32 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भुगतान किया गया।

चीफ इंजीनियर का तर्क- आइटम महंगे हो गए थे: अतिरिक्त भुगतान के सवाल पर चीफ इंजीनियर विवेक गोयल ने तर्क दिया कि यह टेंडर आइटम रेट के आधार पर मांगा गया था। निर्माण के दौरान कुछ आइटम महंगे हो गए थे, ऐसे में समझौता वार्ता के दौरान ठेकेदार को रियायत दी गई। यही जवाब ऑडिट टीम को भी भेजा गया था, लेकिन जवाब से संतुष्ट नहीं होने पर सितंबर 2025 में ही अतिरिक्त राशि की वसूली के निर्देश दिए गए।


धांधली नंबर- 3 : कागजों पर बिजली, जमीन पर अंधेरा

  • परियोजना के तहत डिग्गियों से ड्रिप सिस्टम के जरिए सिंचाई के लिए बिजली कनेक्शन जरूरी थे। ये सारा काम 2019 तक पूरा होना था।
  • 2022 में डिस्कॉम को 25.78 करोड़ रुपए जमा कराए गए।
  • सितंबर 2025 तक कई डिग्गियों पर बिजली कनेक्शन नहीं पहुँचे। भास्कर ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि कागजों में प्रोजेक्ट पूरा, लेकिन जमीनी स्तर पर अधूरा था। कई जगह बिजली के केवल पोल लगे थे, तार गायब थे।

ग्राउंड रिपोर्ट (रणधीसर गांव): बिजली के कई पोल झुके हुए थे। डिग्गियों पर लगी मोटर और पंप खराब हालत में थे। पानी की सप्लाई के लिए निर्मित खाल टूटे हुए थे।

चीफ इंजीनियर का जवाब: सवाल किया गया कि डिग्गियों पर बिजली अभी तक नहीं पहुँची और विभाग ने 2019 में ही डिस्कॉम को 25 करोड़ दे दिए, किसानों को फायदा नहीं मिला? जवाब मिला— “डिस्कॉम ने सभी जगह लाइनें बिछा दी हैं और कनेक्शन भी दे रहे हैं। वह अपना काम कर रही है।”


धांधली नंबर- 4 : किसानों की जमीन पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

  • ठेका कंपनी को सर्वे के अनुसार चिह्नित जगहों पर ही डिग्गियों का निर्माण करना था, लेकिन मनमाने ढंग से डिग्गियां किसानों की उपजाऊ जमीन में उनकी बिना अनुमति के ही बना दी गईं।
  • केस 1: (गोपाल सिंह सोलंकी): सर्वे खसरा नंबर 3/6 पर था, लेकिन ठेकेदार ने पैसा बचाने के चक्कर में खसरा नंबर 6/7 में गोपाल सिंह के खेत में डिग्गी बना दी। इससे उनकी 8 बीघा उपजाऊ जमीन बर्बाद हो गई।
  • केस 2: रणधीसर माइनर के सत्यनारायण ने बताया कि सर्वे के अनुसार डिग्गी खसरा नंबर 49/9 पर बननी थी, लेकिन ठेकेदार ने खसरा नंबर 49/8 में मेरे खेत में बना दी। इससे करीब 8 बीघा जमीन खराब हो गई।

धांधली नंबर- 5 : काम अधूरा, फिर भी 3.60 करोड़ का मेंटेनेंस भुगतान

  • जिस प्रोजेक्ट का काम पूरा ही नहीं हुआ, उसकी मेंटेनेंस के लिए ठेकेदार फर्म मैसर्स लक्ष्मी को 3.60 करोड़ रुपए का एडवांस भुगतान भी कर दिया गया।
  • भास्कर टीम ने खेतों में पड़ताल की तो पाइप लाइन और हौदियां पूरी तरह से टूटी हुई मिलीं। कई जगह बिजली के पोल थे, लेकिन वहां तार गायब थे।

विभाग का तर्क और ऑडिट कमेटी का सवाल: विभाग ने तर्क दिया कि बिजली की सप्लाई नहीं होने के कारण ऑपरेशन संभव नहीं था और भुगतान लंबित था, इसलिए शर्त हटाकर भुगतान किया गया। ऑडिट कमेटी ने सवाल उठाया कि जब टेंडर इंदिरा गांधी नहर बोर्ड की एंपावर्ड कमेटी में उप सचिव की अनुमति से जारी हुआ था, तो निचले स्तर के अधिकारियों ने किस आधार पर शर्त में बदलाव किए?


किसान संघ का आक्रोश: “अधिकारियों और ठेकेदारों के नेक्सस ने घटिया निर्माण किया है। 2019 तक जो बिजली पहुँचनी थी, वह आज तक गायब है और डिग्गियां इस्तेमाल से पहले ही टूट रही हैं।” — शंभू सिंह, अध्यक्ष, किसान संघ बीकानेर

शंभू सिंह, अध्यक्ष, किसान संघ बीकानेर

ऑडिट रिपोर्ट विवरण

कोलायत लिफ्ट खंड, इंदिरा गांधी नहर परियोजना बीकानेर की ऑडिट 18 अगस्त 2025 से 9 सितंबर 2025 तक की गई थी। यह ऑडिट सहायक लेखा परीक्षा अधिकारी रमेशचंद्र महावर, प्रवीण तंवर और सहायक पर्यवेक्षक बसंत बल्लभ पंडा की कमेटी ने तैयार की थी।


एक्सपोज नाउ की नजर: करोड़ों का बजट उपलब्ध होने के बाद भी ‘बजट की कमी’ का बहाना बनाकर सस्ते टेंडर रद्द करना और महंगे में दोबारा ठेका देना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। किसानों की उपजाऊ जमीन की बर्बादी और बिना काम पूरा हुए मेंटेनेंस का भुगतान करना सरकारी खजाने की खुली लूट है।

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