जयपुर। राजस्थान में ‘हर घर नल’ का सपना अब एक कड़वी हकीकत में बदलता नजर आ रहा है। केंद्र सरकार के बजट के नए फॉर्मूले और विभाग की सालों पुरानी कमीशनखोरी ने प्रदेश के जल जीवन मिशन को पूरी तरह वेंटिलेटर पर ला दिया है। जमीनी स्थिति यह है कि मार्च 2024 की तय डेडलाइन बीत चुकी है और प्रदेश के 40 लाख ग्रामीण परिवार आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं।
बजट का ‘डेथ’ वारंट और केंद्र का नया फॉर्मूला
जल जीवन मिशन के नियमों के मुताबिक, 10 प्रतिशत जनसहभागिता राशि आमजन से वसूली जानी थी। लेकिन पिछली कांग्रेस सरकार में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इस योजना में शामिल 10 प्रतिशत सहभागिता राशि जनता से वसूलने की बजाए राज्य सरकार द्वारा वहन करने की बड़ी घोषणा कर दी थी। इसका सीधा वित्तीय भार राज्य सरकार पर ही आ गया। नियम के अनुसार अब केंद्र द्वारा उस राशि को काटकर शेष राशि को केंद्र और राज्य के बीच 50-50 के अनुपात में बांटा जाना था। लेकिन केंद्र के नए नियम ने राजस्थान जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग की कमर तोड़ दी है। अब केंद्र ने ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस (O&M) राशि काटने के बाद शेष का 50 प्रतिशत देने का निर्णय लिया है। आंकड़ों पर गौर करें तो राजस्थान अब तक 18,000 करोड़ रुपये खर्च कर चुका है, जबकि केंद्र से सिर्फ 13,000 करोड़ ही मिले हैं। राजस्थान पीएचईडी को केंद्र से 5,000 करोड़ मिलने की उम्मीद थी, लेकिन इस नए फॉर्मूले के बाद केंद्र से अतिरिक्त बजट मिलने की उम्मीद लगभग शून्य हो गई है।
ठेकेदार बने कर्जदार, जेजेएम के 80 फीसदी काम ठप
प्रदेश के पीएचईडी ठेकेदारों की स्थिति आज बद से बदतर हो चुकी है। ठेकेदारों को जेजेएम योजनाओं का पूरा भुगतान नहीं मिलने के कारण उनकी आर्थिक हालत बहुत ज्यादा खराब हो गई है। पिछले दो साल के दौरान राज्य सरकार ने जेजेएम योजना में ठेकेदारों को जो थोड़ा-बहुत भुगतान किया है, वह ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ के समान है। लंबे समय से प्रदेश के पीएचईडी ठेकेदारों का करीब 4 हजार करोड़ रुपये का भारी भुगतान बकाया है। अपने ही किए गए काम के बजट के लिए पीएचईडी ठेकेदार 2 साल से जलदाय विभाग के कार्यालयों व अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें भुगतान की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है। इस लटके हुए भुगतान के कारण प्रदेश के 95 फीसदी ठेकेदार कर्ज के भारी बोझ तले दब चुके हैं और कई तो पूरी तरह दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गए हैं। ठेकेदारों के पास अब लेबर और निर्माण सामग्री का भुगतान करने के लिए भी पैसे नहीं हैं, जिसके चलते उन्हें बाजार में मुंह छुपाकर घूमना पड़ रहा है। बजट की इस भारी कमी के चलते प्रदेश में जेजेएम के 80 फीसदी कार्य बंद पड़े हैं, जिससे जेजेएम कार्यों की जमीनी प्रोग्रेस बिल्कुल शून्य हो गई है।
पहले भ्रष्टाचार की ‘गंगा’ बहाई, अब जेजेएम की नहीं हो रही सुनवाई
केंद्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना का काम धरातल पर अगर पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ हो जाता, तो आज पेयजल के क्षेत्र में राजस्थान की देशभर में एक अलग ही पहचान होती। लेकिन वास्तविकता यह है कि जल जीवन मिशन योजना को प्रदेश के राजनेताओं, ब्यूरोक्रेट्स, पीएचईडी के अधिकारियों-इंजीनियर्स और ठेकेदारों ने मिलकर सिर्फ अपना ‘जेब भरो मिशन’ बना लिया है, जिसका विनाशकारी नतीजा आज सबके सामने है। जेजेएम में टेंडरों की खुली सौदेबाजी, भारी भ्रष्टाचार, फर्जीवाड़ों और कमीशनखोरी के चलते योजनाओं को समय पर शुरू करवाकर पूरा कराने की तरफ किसी ने भी ध्यान ही नहीं दिया।
नेता, ब्यूरोक्रेट्स, इंजीनियर और ठेकेदारों की इस चौकड़ी ने मिलकर राजस्थान में जेजेएम में भ्रष्टाचार का जो नंगा तांडव मचाया है, उसी का सीधा परिणाम है कि राजस्थान पीएचईडी देशभर में भ्रष्टाचार को लेकर सबसे ज्यादा चर्चाओं और विवादों में बना हुआ है। इस योजना को पूरा करवाकर प्रदेश के 92 लाख से ज्यादा घरों को नलों से जोड़ने का निर्धारित लक्ष्य अब महज एक सपना बनकर रह गया है। भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुके जलदाय विभाग में ठेकेदारों व इंजीनियर्स ने मिलकर जो कांड किए हैं, उसी का परिणाम आज पूरी व्यवस्था भुगत रही है। जेजेएम की इस विफलता का सबसे बड़ा कारण सीधे तौर पर पीएचईडी अधिकारियों की मिलीभगत और भ्रष्टाचार है। फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र, फर्जी नेटवर्थ और झूठी बिडिंग कैपेसिटी के आधार पर जमकर चहेते ठेकेदारों को टेंडर बांटे गए। इतना ही नहीं, गुणवत्तापूर्ण महंगी DI पाइप की जगह घटिया और सस्ते HDPE पाइप डालकर करोड़ों रुपये का भुगतान उठा लिया गया। कई जगहों पर तो बिना पाइपलाइन डाले ही कागजों में करोड़ों के फर्जी बिल पास कर दिए गए। टेंडरों में इस भारी कमीशनखोरी और फिर जांच के नाम पर वसूली ने विभाग की बची-खुची साख को भी धूल में मिला दिया है।
40 लाख घरों का सपना… अब किसके भरोसे?
अगर प्रदेश में जल जीवन मिशन को केंद्र का सहयोग आगे भी नहीं मिला, तो यह पूरा मिशन आधे-अधूरे रूप में ही दम तोड़ देगा। राज्य सरकार की वर्तमान वित्तीय स्थिति बिल्कुल ऐसी नहीं है कि वह अकेले अपने दम पर 40,000 करोड़ रुपये के शेष बड़े प्रोजेक्ट्स को पूरा कर सके। यदि जल जीवन मिशन योजना को अधिकारी और इंजीनियर्स गंभीरता से लेते हुए पूरी ईमानदारी से काम करते, तो राजस्थान मार्च 2024 तक जेजेएम को 100 फीसदी पूरा कर सकता था। लेकिन भ्रष्टाचार की दीमक ने इस प्रोजेक्ट को स्पीड पकड़ने से पहले ही विकास की पटरी से उतार दिया। नतीजा यह रहा कि आज पूरे देश में राजस्थान जल जीवन मिशन योजना की प्रोग्रेस में सबसे फिसड्डी राज्य बन गया है।
वहीं, अगर समय पर जेजेएम के कार्य पूरे होते तो केंद्र सरकार से करीब 50 हजार करोड़ रुपये की बड़ी आर्थिक सहायता मिल सकती थी, लेकिन अब उस लापरवाही का पूरा वित्तीय भार भी राजस्थान की सरकार पर ही आ गया है। इस जेजेएम के बुरी तरह फेल हो जाने से प्रदेश के 40 लाख से ज्यादा घर आज भी इस योजना के लाभ से पूरी तरह वंचित हैं।
बड़ा सवाल: अब क्या होगा?
यदि अगले 24 से 48 घंटों में राज्य सरकार ने इस योजना के लिए बजट जारी नहीं किया, तो राजस्थान में जल जीवन मिशन का काम पूरी तरह से ठप्प हो जाएगा। क्या मौजूदा मुख्यमंत्री इस भ्रष्टाचार के गहरे दलदल को साफ कर पाएंगे? या फिर राजस्थान की जनता हमेशा की तरह प्यासी ही रहेगी? ‘
Expose Now’ इस पूरे प्रकरण पर नजर बनाए हुए है और आगे भी पीएचईडी के भ्रष्टाचार की हर एक फाइल खोलता रहेगा।
