राजस्थान में ‘खेल या खिलवाड़’? राज्य क्रीड़ा परिषद खुद संकट में, 500 पार्ट-टाइम कोचों के भरोसे मेडल जीतने का सपना

राजस्थान सरकार खिलाड़ियों को पदक जीतने पर करोड़ों के पुरस्कार और सरकारी नौकरियां देकर सम्मानित करती है, लेकिन उन खिलाड़ियों को ग्रास रूट (जमीनी स्तर) से तैयार करने वाली ‘राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद’ खुद आईसीयू में है। प्रदेश में खेल प्रतिभाओं को तराशने वाली यह सबसे बड़ी संस्था भारी स्टाफ कमी, सिस्टम की लापरवाही और पार्ट-टाइम व्यवस्था के भरोसे चल रही है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि बिना स्थायी कोच और अधिकारियों के राजस्थान के खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मैदानों पर कैसे परचम लहराएंगे?

पूरे प्रदेश में मात्र 2 खेल अधिकारी, मुख्यालय खाली खेल परिषद में अधिकारियों की भारी कमी ने पूरे तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पूरे राजस्थान में वर्तमान में मात्र दो खेल अधिकारी हैं:

  1. लिंबाराम (अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज): जो लंबे समय से गंभीर रूप से बीमार हैं और कार्यालय नहीं आ पा रहे हैं।
  2. धनेश्वर मईड़ा: जो वर्तमान में बांसवाड़ा में कार्यरत हैं।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि राज्य क्रीड़ा परिषद के मुख्यालय ‘जयपुर’ में एक भी खेल अधिकारी नियुक्त नहीं है। प्रदेश में कई जगह स्थिति यह है कि एक ही व्यक्ति कई कार्यालय संभाल रहा है या फिर शिक्षा विभाग के पीटीआई (PTI) परिषद का काम चला रहे हैं।

स्थायी कोच सिर्फ 61, 500 पार्ट-टाइम कोचों के भरोसे सिस्टम राज्य के 41 जिलों में क्रीड़ा परिषद के कार्यालय हैं, लेकिन खिलाड़ियों को तकनीकी रूप से मजबूत करने वाले स्थायी कोचों की संख्या राज्य में केवल 61 है। इस भारी कमी को छिपाने के लिए सरकार ने करीब 500 पार्ट-टाइम कोच नियुक्त कर दिए हैं। हालांकि इनमें कई नेशनल मेडलिस्ट और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी शामिल हैं, लेकिन कम वेतन और कोचिंग के लिए मिलने वाले सीमित समय के कारण ट्रेनिंग की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

आंकड़ों में राजस्थान स्पोर्ट्स काउंसिल की हकीकत:

  • राज्य में संचालित खेल अकादमियां: 22
  • कुल खेल अधिकारी: 02 (एक बीमार)
  • स्थायी कोच: 61
  • अल्पकालीन (पार्ट-टाइम) कोच: 500
  • खेलो इंडिया केंद्र: 50
  • खेलो इंडिया केंद्रों पर पार्ट-टाइम कोच: 50
  • खेल सुविधा वाले जिले: 41

एक्सपर्ट व्यू: स्थायी कोच ही ग्रास रूट से तैयार करते हैं खिलाड़ी द्रोणाचार्य अवॉर्डी कोच महावीर सैनी ने इस ‘पार्ट-टाइम’ व्यवस्था पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार, “सिर्फ मैदान में खिलाने से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी तैयार नहीं होते। एक खिलाड़ी को तैयार करने के लिए ग्रास रूट लेवल से दिन-रात मेहनत करनी पड़ती है। स्थायी कोच को खिलाड़ी के बारे में एक-एक जानकारी होती है—खिलाड़ी में कितनी जान है, वह कितना स्ट्रेस ले सकता है और उसे इंजरी से कैसे बचाना है। खिलाड़ी की जरा-सी गलती उसका करियर खराब कर सकती है, इसलिए उस पर हर पल नजर रखना जरूरी है, जो केवल एक स्थायी कोच ही कर सकता है।”

इस पूरी अव्यवस्था और बदहाली को लेकर जब क्रीड़ा परिषद की सचिव नीतू बारूपाल से बात करनी चाही, तो उनसे संपर्क नहीं हो सका। लेकिन ज़मीनी हकीकत यही है कि जब तक खेल ढांचे को ‘स्थायी’ रूप से मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक राजस्थान से ओलंपिक मेडल की उम्मीद करना बेमानी है

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