नागौर। ‘मेरी लड़ाई अब भी जारी है…’ यह कहना है नागौर जिले के साडो़कन गांव के निवासी हरकाराम का, जो पिछले 18 वर्षों से अपने गांव की सरकारी जमीन (गोचर और अंगोर भूमि) को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए अकेले संघर्ष कर रहे हैं। सरकारी तंत्र की सुस्ती का आलम यह है कि राजस्थान हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद प्रशासन जमीन खाली कराने में नाकाम रहा है।
हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना
हरकाराम के अनुसार, वर्ष 2012 में राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर ने जिला प्रशासन को साडो़कन गांव से अतिक्रमण हटाने के स्पष्ट आदेश दिए थे। हालांकि, 14 साल बीत जाने के बाद भी हाईकोर्ट के आदेशों की पालना फाइलों में ही दबी हुई है। पीड़ित का कहना है कि वह अपनी जेब से किराया लगाकर सरकारी जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि सरकारी वेतन पाने वाले अधिकारी इस मामले में मूकदर्शक बने हुए हैं।
आश्वासनों का अंबार, समाधान शून्य
हरकाराम ने अपनी शिकायत लेकर तहसीलदार, उपखंड अधिकारी से लेकर जिला कलेक्टर तक कई बार गुहार लगाई है।
- 12 जुलाई, 2021: तत्कालीन कलेक्टर ने उन्हें आश्वासन दिया था कि पुलिस जाप्ता तैयार है और जल्द ही अतिक्रमण हटाया जाएगा।
- 19 अगस्त, 2021: जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो हरकाराम ने गांधीवादी तरीके से अपना विरोध दर्ज कराया।
- निरंतर जनसुनवाई: हरकाराम पिछले 13 सालों से हर महीने जिला स्तरीय जनसुनवाई में ज्ञापन दे रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें केवल नया आश्वासन ही मिलता है।
अतिक्रमण ने बदला गांव का नक्शा
हरकाराम का दर्द है कि 18 साल की इस लंबी लड़ाई के दौरान अतिक्रमण कम होने के बजाय और बढ़ गया है। जिस गोचर भूमि पर पशुओं को चरना चाहिए था, वहां अब:
- अवैध रूप से खेती शुरू हो गई है।
- पक्के नए मकान बन गए हैं।
- बड़ी-बड़ी चारदीवारियां खड़ी कर दी गई हैं।
इन्होंने करनी है कार्रवाई
इस मामले में मुख्य रूप से निम्नलिखित अधिकारियों के हस्तक्षेप और कार्रवाई की आवश्यकता है:
- वी. श्रीनिवास, मुख्य सचिव, राजस्थान
- शक्ति सिंह राठौड़, संभागीय आयुक्त, अजमेर
- चम्पालाल जीनगर, (कार्यवाहक) कलेक्टर
हरकाराम का सवाल सीधा है—”जब हाईकोर्ट के आदेशों की भी पालना नहीं हो रही, तो एक आम आदमी न्याय की उम्मीद किससे करे?” उनकी यह लड़ाई केवल जमीन का टुकड़ा बचाने की नहीं, बल्कि गांव की आने वाली पीढ़ियों और पशुओं के अधिकारों की रक्षा की है।
