जयपुर: हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को ‘पापमोचनी एकादशी’ कहा जाता है। उत्तर भारतीय पंचांग के अनुसार यह चैत्र मास में और दक्षिण भारतीय कैलेंडर के अनुसार फाल्गुन मास में आती है। यह विक्रम संवत वर्ष की अंतिम एकादशी होती है, जो युगादि (हिंदू नववर्ष) से ठीक पहले पड़ती है। वर्ष 2026 में पापमोचनी एकादशी का व्रत 14 मार्च (शनिवार) को रखा जाएगा।
पापमोचनी एकादशी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त (Table)
| विशेष विवरण | दिनांक और समय |
| एकादशी व्रत तिथि | 14 मार्च 2026 (शनिवार) |
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 13 मार्च 2026, रात्रि 09:27 बजे से |
| एकादशी तिथि समाप्त | 14 मार्च 2026, रात्रि 08:35 बजे तक |
| पारण (व्रत तोड़ने) का समय | 15 मार्च 2026, प्रातः 06:33 से 08:52 बजे तक |
| द्वादशी तिथि समाप्ति | 15 मार्च 2026, सायंकाल 06:12 बजे |
पारण के कड़े नियम: समय का रखें विशेष ध्यान
एकादशी व्रत की पूर्णता ‘पारण’ से होती है। शास्त्रों के अनुसार, पारण में की गई गलती व्रत के फल को कम कर सकती है:
- द्वादशी के भीतर पारण: पारण हमेशा द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना चाहिए। यदि द्वादशी के भीतर पारण न किया जाए, तो वह पाप के समान माना जाता है।
- हरि वासर का त्याग: द्वादशी तिथि की पहली एक-चौथाई अवधि ‘हरि वासर’ कहलाती है। इस दौरान व्रत नहीं खोलना चाहिए। भक्तों को हरि वासर समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
- प्रातःकाल है श्रेष्ठ: व्रत खोलने का सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। मध्याह्न (दोपहर) के समय पारण से बचना चाहिए।
स्मार्त बनाम वैष्णव एकादशी: कब रखें व्रत?
कभी-कभी एकादशी तिथि दो दिनों तक व्याप्त होती है। ऐसे में पंचांग भेद के अनुसार नियम बदल जाते हैं:
- स्मार्त (परिवारजन): इन्हें पहले दिन एकादशी का व्रत करना चाहिए।
- वैष्णव (सन्यासी/मोक्ष के इच्छुक): दूजी एकादशी या वैष्णव एकादशी के दिन व्रत रखना इनके लिए उपयुक्त माना गया है।
- भगवान विष्णु के परम भक्त: जो भक्त भगवान का विशेष स्नेह प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें दोनों दिन व्रत रखने की सलाह दी जाती है।
धार्मिक महत्व:
जैसा कि नाम से स्पष्ट है, ‘पापमोचनी’ का अर्थ है पापों का मोचन (नाश) करने वाली। यह एकादशी भक्तों को मानसिक शांति प्रदान करती है और नए हिंदू वर्ष की शुरुआत से पहले आत्म-शुद्धि का अवसर देती है।
