बच्चों की परवरिश से जुड़ी एक बेहद संवेदनशील कहानी हरियाणा से सामने आई है, जहाँ एक 9 साल की गोद ली हुई (Adopted) बच्ची को उसके दोस्तों से अपनी सच्चाई पता चली। इस खुलासे के बाद बच्ची के मन में अपने ‘असली’ माता-पिता को लेकर ढेरों सवाल हैं, जिससे पेरेंट्स काफी तनाव में हैं।
जब दोस्तों से पता चले सच: क्या करें पेरेंट्स?
हरियाणा की एक माँ ने बताया कि उनकी 9 साल की बेटी को पड़ोस के बच्चों ने मजाक में कह दिया कि वह गोद ली हुई है। तब से वह बच्ची लगातार पूछ रही है कि वह उनके पास कैसे आई। मनोवैज्ञानिक डॉ. अमिता श्रृंगी का मानना है कि ऐसे में सवालों को टालने के बजाय शांति और संवेदनशीलता से सच बताना ही सबसे बेहतर रास्ता है।
सच बताना क्यों है जरूरी?
अक्सर माता-पिता को लगता है कि सच छिपाने से बच्चा सुरक्षित रहेगा, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है:
- विश्वास की रक्षा: अगर बच्चे को यह बात किसी बाहरी व्यक्ति से पता चलती है, तो उसे गहरा सदमा लग सकता है कि उसके माता-पिता ने उससे झूठ बोला।
- भ्रम और अविश्वास: सच्चाई छिपाने से बच्चे के मन में माता-पिता के प्रति अविश्वास पैदा हो सकता है।
- सही समय: 7 से 10 साल की उम्र रिश्तों को समझने की शुरुआत होती है। चूँकि बच्ची ने खुद सवाल पूछा है, इसका मतलब है कि वह अब सच जानने के लिए मानसिक रूप से तैयार है।
बच्चे को कैसे समझाएं? (तरीका और शब्द)
बच्चे से बात करते समय शब्दों का चुनाव बहुत सावधानी से करें:
- सरल भाषा: उसे बताएं कि परिवार बनने के कई तरीके होते हैं।
- दिल का चुनाव: उसे समझाएं कि “कुछ बच्चों का जन्म माता-पिता के घर होता है, जबकि कुछ बच्चों को उनके माता-पिता दिल से चुनकर अपने परिवार का हिस्सा बनाते हैं”।
प्रतिक्रिया और भावनात्मक सुरक्षा
सच जानने के बाद बच्चा भावनात्मक रूप से आहत हो सकता है और उसके मन में ‘रिजेक्शन’ (अस्वीकार किए जाने) की भावना आ सकती है।
- संभावित व्यवहार: बच्चा कुछ दिनों के लिए नाराज हो सकता है, बात करना कम कर सकता है या अकेला रहना पसंद कर सकता है।
- पेरेंट्स का धैर्य: माता-पिता को इस समय धैर्य बनाए रखना चाहिए और उसे बार-बार यह भरोसा दिलाना चाहिए कि वह उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- सुरक्षा का अहसास: बच्चे को समझाएं कि परिवार केवल जन्म से नहीं, बल्कि प्यार, देखभाल और सपोर्ट से बनता है। उसकी डेली रूटीन को सामान्य बनाए रखें ताकि उसका जुड़ाव बना रहे।
पेरेंट्स इन 7 गलतियों से जरूर बचें
बातचीत के दौरान इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
- सच छिपाने या बात को बार-बार टालने की कोशिश न करें।
- बच्चे के मासूम सवालों को नजरअंदाज न करें।
- बच्चे के सामने अपना डर या बहुत ज्यादा तनाव व्यक्त न करें।
- बच्चे की तुलना कभी भी किसी दूसरे बच्चे से न करें।
- एडॉप्शन (गोद लेने) को कभी भी ‘एहसान’ की तरह पेश न करें।
- बच्चे से तुरंत सब कुछ सामान्य करने या एडजस्ट होने की उम्मीद न रखें।
- बच्चे की भावनाओं को कभी ‘ओवररिएक्शन’ न कहें।
निष्कर्ष: डॉ. श्रृंगी के अनुसार, सच्चाई और भरोसे पर आधारित रिश्ता ही सबसे मजबूत होता है। यदि आपकी बेटी सवाल पूछ रही है, तो इसका अर्थ है कि उसे आप पर भरोसा है, और इसी भरोसे को प्यार और सुरक्षा के साथ बनाए रखना आपकी जिम्मेदारी है।
