जयपुर, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) के दौरान ‘विभाजन की कथाएं’ (Sagas of Separation) विषय पर आयोजित एक विशेष सत्र में विभाजन के अनकहे दर्द और यादों को साझा किया गया। इस सत्र में प्रसिद्ध लेखिका भावना सोमाया, किश्वर देसाई और ताबिना अंजूम ने हिस्सा लिया। चर्चा के दौरान लेखिकाओं ने बताया कि कैसे सरहद पार की मिट्टी आज भी पुरानी पीढ़ी की यादों और नई पीढ़ी की लेखनी में जीवित है।
यश चोपड़ा बिना पाकिस्तान जाए ‘वीर-जारा’ बना सकते हैं, तो मैं लिख क्यों नहीं सकती?
फिल्म समीक्षक और लेखिका भावना सोमाया ने अपने परिवार के कराची से भारत आने के सफर को याद करते हुए कहा, “मेरा परिवार कराची से आया था। घर में हमेशा कराची की बातें होती थीं। मेरे लिए कराची कोई पड़ोसी देश नहीं, बल्कि उस भाई की तरह है जिसे मैंने कभी देखा नहीं।”
भावना ने साझा किया कि वह लंबे समय से कराची पर लिखना चाहती थीं, लेकिन उनकी शर्त थी कि वह वहां की हवा और मिट्टी को महसूस करने के बाद ही लिखेंगी। हालांकि, मौजूदा हालातों में वहां जाना संभव नहीं हो पाया। उन्होंने कहा, “तब मुझे लगा कि जब यश चोपड़ा बिना पाकिस्तान जाए ‘वीर-जारा’ जैसी कालजयी फिल्म बना सकते हैं, तो मैं भी वहां जाए बिना अपनी जड़ों के बारे में लिख सकती हूं।”
पार्टीशन म्यूजियम: यादों और सामान से बुनी गई दास्तान
लेखिका किश्वर देसाई ने दिल्ली और अमृतसर में बने ‘पार्टीशन म्यूजियम’ की नींव के पीछे की भावुक कहानी बताई। उन्होंने कहा कि उनके पिता 90 वर्ष की उम्र में भी अनारकली बाजार (लाहौर) की गलियों और चिलगोजों की यादों में खोए रहते थे।
किश्वर देसाई ने बताया:
- यादों का संग्रह: म्यूजियम में वह सामान रखा गया है जो लोग विभाजन के समय अपने साथ लाए थे।
- गैलरी ऑफ होप: म्यूजियम की 14वीं गैलरी को ‘गैलरी ऑफ होप’ कहा जाता है, जो यह संदेश देती है कि भविष्य में फिर कभी ऐसा मानवीय संकट न आए।
- ऐतिहासिक डेटा: म्यूजियम तैयार करने के लिए नेशनल आर्काइव और व्यक्तिगत फोटोग्राफ्स का सहारा लिया गया है।
सत्र के अंत में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि विभाजन केवल जमीन का बंटवारा नहीं था, बल्कि यह उन करोड़ों दिलों का बंटवारा था जो आज भी अपनी जड़ों को ढूंढ रहे हैं।
